जन-वन अधिकार पर जन-घोषणा पत्र जन- वनाधिकार सम्मेलन, 28-29 अक्टूबर 2018, रायपुर में पारित .

 

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जन-वन अधिकार पर जन-घोषणा पत्र
जन- वनाधिकार सम्मेलन, 28-29 अक्टूबर 2018, रायपुर में पारित .

 

.रायपुर ’30/10/18

वनाधिकार जन घोषणा-पत्र का केन्द्रीय विषय-
छत्तीसगढ़ में ‘अनुसूचित जनजाति व अन्य परंपरागत वन-निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006’ (वनाधिकार संशोधित नियम 2012 सहपठित) और ‘पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम 1996’ सहित ‘भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम 2013’ का अविलम्ब, न्यायपूर्ण व उत्तरदायी तरीके से क्रियान्वयन.

सन्दर्भ

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छत्तीसगढ़ प्रदेश में संपन्न होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव में विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा भाग लेने के लिए मतदाताओं से अपने-अपने पक्ष में वोट देने की अपील की जाती है. सभी प्रत्याशी वोट प्राप्त करने के लिए स्वयं व अपनी पार्टी को जनता के मुद्दों को हल करने एवं बेहतर शासन देने के लिए योग्य बताते है. प्रदेश के आदिवासी एवं वन-निर्भर अन्य समुदायों के लिए वन-अधिकार, ग्राम सभाओं की स्वायतत्ता एवं प्राकृतिक संसाधनों पर सामुदायिक नियंत्रण, बेहद अहम् विषय है, जिससे उनकी आजीविका, पहचान एवं गरिमा जुडी हुई है. ऐसे में, हम, 29 अक्टूबर 2018 को रायपुर में जन-वनाधिकार सम्मेलन के अवसर पर वनाधिकार एवं स्वशासन से जुड़े मुद्दों पर एकमत विभिन्न संगठन एवं समूह द्वारा तैयार “जन- वन अधिकार का जन-घोषणा पत्र’ राजनैतिक दलों एवं उनके प्रतिनिधियों के विचारार्थ जारी करते हैं.

🔶 छतीसगढ के 13 जिले पूर्ण व 6 जिले आंशिक रूप से भारतीय संविधान की 5वी अनुसूची के अंतर्गत अधिसूचित एवं आदिवासी-जन व वन-क्षेत्र बहुल है. परन्तु, इस क्षेत्र के निवासी अपने मौलिक हकों व सम्मानपूर्ण जीवन से अब तक वंचित है, विशेषकर, बस्तर संभाग में राज्य-नक्सल टकराव के चलते हिंसा झेलने के साथ-साथ अपने सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक, राजनैतिक अधिकारों से बेदखल हो रहे है.

इन समुदायों पर पिछले 150 वर्षों में हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने एवं वन क्षेत्रों में व्यापक भूमि-सुधार और लोकतान्त्रिक शासन पद्धति लागू करने के उद्देश्य से ‘अनुसूचित जनजाति व अन्य परंपरागत वन-निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006’ बनाया गया. प्रदेश में वर्ष 2008 से लागू इस कानून ने सदियों से वंचित आदिवासियों व वन-निर्भर समुदायों पर पीढ़ियों से चले आ रहे अन्याय से मुक्ति मिलने की उम्मीद जगाई. परन्तु, इस कानून के लागू होने के एक दशक बाद भी लंबित पड़े अधिकारों का न मिलना और वनाधिकार मान्य होने के बावजूद गैर-क़ानूनी ढंग से छीन लेने से पूरे समाज और सामाजिक आंदोलनों में रोष व्याप्त है.

🔶 प्रदेश में ‘पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम 1996’ (पेसा) का उसकी भावना-अनुरूप क्रियान्वयन नहीं किया गया है, जिससे आदिवासी क्षेत्रों में ग्रामसभाओ को अपने संसाधनों पर नियंत्रण एवं प्रबंधन का अधिकार प्राप्त नहीं हो पाया है, और अब भी ग्राम सभाएं, शासकीय प्रशासनिक तंत्र की गिरफ्त में है. समुदाय के तमाम संघर्षों के बावजूद भी, ग्राम सभाओ को स्व-शासन की ईकाई नहीं बनने दिया गया है.

🔶 इस दरमियान, लोग बहुत से आवेदन, ग्राम सभा के प्रस्ताव, और सरकारी विभागों के चक्कर लगा कर विवश हो चुके है. अतः, इस जन वनाधिकार सम्मेलन में तैयार जन-घोषणा पत्र के माध्यम से हमारे न्यायपूर्ण मुद्दों पर तुरंत समुचित कारवाई करने का संकल्प व्यक्त करें.

🔶 जन-वनाधिकार घोषणा-पत्र की प्रमुख मांगे.

प्रदेश में वन-क्षेत्र व वन-संसाधनों पर ग्रामसभा को नियंत्रण देकर सामुदायिक वनाधिकारों की मान्यता दी जाये.

🔶 वनाधिकार कानून की धारा 3(1)(झ) में उल्लेखित सामुदायिक प्रबंधन और संरक्षण का अधिकार मान्य करते हुए, ग्राम सभा को वन-क्षेत्र व संसाधन के प्रबंधन के लिए नियम 4(1) (ङ) के तहत सक्षम बनाया जाये.

🔶 प्रदेश में ग्राम सभा के सिवाय किसी और निकाय- जैसे संयुक्त वन प्रबंधन समिति, वन सुरक्षा समिति, सरपंच आदि के नाम पर जारी किये गए अधिकार-पत्र को तुरंत ख़ारिज कर, ग्रामसभा के नाम पर किये जाये.

🔶 नियम 3(2) के अनुसार ग्राम वनाधिकार समिति अपना सचिव स्वयं चुनेगी, अतः ग्रामपंचायत के सचिव को वनाधिकार समिति से हटाया जाये.

🔶 सामुदायिक वनाधिकार मान्य वनक्षेत्र को आरक्षित (RF) या संरक्षित (PF) वन से ‘सामुदायिक वनाधिकार वन-क्षेत्र’ नामक अलग श्रेणी के वन घोषित किया जाये, जिसमें वन-विभाग की मनमानी न चले.

🔶 यह सुनिश्चित किया जाये, कि वन-विभाग सिर्फ ग्रामसभा की लिखित, दबाव-मुक्त, अग्रिम व संसूचित (informed) सहमति से ही कार्य कर सके तथा अपनी कार्ययोजना (वर्किंग प्लान), ग्रामसभा की योजना के अनुरूप बनाये.

🔶 सामुदायिक अधिकारों के तहत आने वाले सभी अधिकारों- जैसे निस्तार, चराई नियमन, प्रबंधन का अधिकार, वनोपज पर स्वामित्व, जल-क्षेत्र के उपयोग का अधिकार, जैव विविधता, बौद्धिक संपदा और पारम्परिक ज्ञान संजोने का अधिकार और वनों के पारंपरिक उपयोग का अधिकार, जिसमें आदिवासी समाज की वन आधारित उपासना पद्धति भी शामिल है, आदि का वनाधिकार-पत्रक में स्पष्ट उल्लेख तथा कुल क्षेत्र का वर्णन और स्पष्ट सीमारेखा सहित मानचित्र, ग्रामसभाओं को तुरंत प्रदान किये जाये.

🔶 प्रदेश के वनग्रामों को राजस्व ग्राम बनाते समय वन विभाग द्वारा की गयी गैर-क़ानूनी प्रक्रिया को सुधार करवाने का वादा करे.

🔶 आदिवासी इलाकों में जल-क्षेत्र के ठेके निरस्त कर सम्बंधित ग्रामसभाओं को नियंत्रण का अधिकार सौंपा जाये. उसी तरह, वनक्षेत्र में पड़ने वाले जल-क्षेत्रों को वन-विभाग के नियंत्रण से मुक्त कर ग्रामसभाओ को सौंपा जाये.

🔶 प्रदेश के अति पिछड़े व कमज़ोर आदिवासियों (PVTGs) की पहचान कायम रखते हुए, उनके पर्यावास (हैबिटैट) अधिकार की मान्यता समयबद्ध तरीके से दिलाएं.

🔶 प्रदेश के सभी अति पिछड़े व कमजोर आदिवासी समूहों (पहाड़ी कोरवा, बिरहोर, बैगा, पंडो, भुंजिया, अबूझमडिया और कमार) को एक समयबद्ध अभियान चला कर काबिज वनभूमि पर अधिकार सौंपे जाये. दावा भरने, दस्तावेज एकत्रित करने और नक्शा बनाने का कार्य, आदिवासी विकास विभाग के विशेष कार्य-दल बनाकर, शिविर लगाकर 3 माह के भीतर किया जाये, ताकि, सबसे वंचित वन-निर्भर समुदायों की आजीविका एवं पहचान सुरक्षित रह पाए.

🔶 वनाधिकार कानून में वर्णित ईलाकाई/पर्यावास (हैबिटैट) अधिकारों को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर इन समुदायों के आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक अंतर्संबंधों पर निर्भर वनक्षेत्र, जैसे-अबूझमाड़, बारो पहाड़, बिंद्रा-नवागढ़ पर अधिकार मान्य किये जाएँ.
जहाँ भी, इन समुदाय द्वारा बेवर/झूम खेती की जा रही है, उसे सामुदायिक वनाधिकार की मान्यता दे कर, उन्हें सौंप दिया जाये.

🔶 समाज व वन-निर्भर समुदायों पर हुए ऐतिहासिक अन्याय के खात्मे का वचन दे.
सबसे पहले, विधानसभा में शपथ-ग्रहण के समय, प्रदेश में रह रहे वन-निर्भर आदिवासी व अन्य समुदायों के प्रति हुए ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार करे, उसके लिए खेद व्यक्त कर, समय रहते उसे पूर्णतः ख़त्म करने का वचन दे.
आदिवासियों व वन-निर्भर समुदायों पर वर्ष 2015 से पूर्व दर्ज वन-अपराधों को तुरंत ख़त्म कर, क्षतिपूर्ति देने का वादा करें.

🔶छतीसगढ़ के वन-क्षेत्रों से अब तक हुए विस्थापन का ब्यौरा देने का वादा करें. वर्ष 2006 से पूर्व वन-क्षेत्र से जितने लोगों को जिस भी कारण से हटाया गया है, उन्हें पुनर्स्थापित करे या उचित मुआवजा दें.

🔶13 दिसंबर 2005 से पूर्व किसी भी किस्म की वनभूमि (चाहे, वह जिस नाम से दर्ज हो) पर काबिज आदिवासी परिवारों को, बगैर देरी किये वनाधिकार मान्य किये जाये. ग्रामसभा की अनुशंसा पर वनाधिकार समिति के समक्ष दर्ज साक्ष्यों को माना जाये और शासकीय दस्तावेजी साक्ष्य के लिए दबाव न बनाया जाये.

🔶 वनाधिकार पत्रों में वास्तविक रकबा से कम दर्ज जमीन को सुधार करने के लिए विशेष कार्यदल गठित किया जाये. इसमें जोतने वाली जमीन के अतिरिक्त आवास और खेती सम्बंधित कार्यों के लिए उपयोग की जाने वाली जमीन भी शामिल है, जैसे खलिहान, मवेशी बाँधने की जगह, आदि.

🔶 SDLC व DLC वनाधिकार नियम 12(क)6 के तहत ग्रामसभा के अपूर्ण दावों या प्रस्तावों में सुधार की गुंजाइश होने पर और सरकारी रिकार्ड के भरोसे खारिज किये गए दावों को ग्रामसभा को पुनर्विचार के लिए वापस भेजें न कि ख़ारिज करें.

🔶 ग्रामसभाओं को सशक्त, सक्षम व स्वशासी बनाने के लिए प्रतिबद्धता जताएं.
अनुसूचित क्षेत्रों की त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में ग्रामसभा को पेसा कानून की धारा 4(क), (घ), (ढ) की भावना के अनुरूप सर्वोच्च, सक्षम एवं स्वशासी निकाय बनाने के लिए, छह माह के भीतर, पेसा के राज्य नियम लोगों से सुझाव लेकर अलग से बनाये.

🔶 धारा 129(ग) व (घ) को प्रभावी बनाने के लिए प्रस्तावित ‘पेसा नियमों’ में प्रावधान किया जाये.
पेसा अधिनियम 1996 की धारा 4(ख) और वनाधिकार (मान्यता) कानून 2006 की धारा 2(1)(छ) और नियम 2(क)(क) के तहत संकल्पित की गयी ग्रामसभा को स्थापित किया जाना अनिवार्य एवं समयबद्ध किया जाये.
सभी ग्रामसभा को अपनी जरुरत के आधार पर बैठक करने और कार्रवाई करने हेतु सक्षम बनाया जाये.

🔶 ग्राम सभाओं को एक निकाय के रूप में मान्य करना होगा.

🔶 ग्रामसभा की अपनी अलग पंजी, मुहर और रिकार्ड रखने का अधिकार दिया जाये. ग्रामसभा के कानूनसम्मत निर्णयों और प्रस्तावों का सम्मान किया जाये. इस हेतु ग्राम सभाओं की क्षमता वृद्धि कर, उन्हें संस्थानिक दर्जा दिया जाये और दैनिक कार्यालयीन व्यय हेतु राशि सीधे खाते में जमा कराया जाये.

🔶 महाराष्ट्र राज्य की तर्ज पर प्रत्येक ग्रामसभा बैठक से पूर्व महिला बैठक अनिवार्य करने के लिए नियम बनाये.

🔶 पेसा कानून, 1996 धारा 4(ण) के तहत प्रदेश के अनुसूचित क्षेत्र में स्वशासी ज़िला परिषद बनाने का कानून बनायेगे.

🔶 आदिवासी समाज के मुखियों के साथ व्यापक चर्चा के उपरांत पेसा कानून के धारा 4(घ) के तहत परंपरा-रूढ़ियों की संहिता बनाई जाए.

🔶 वनाधिकार में महिला अधिकारों का सम्मान और ग्रामसभा में महिलाओं की अग्रणी भूमिका रखने नियमों/नीतियों में बदलाव लाये

⚫ अब तक प्रदान किये गए ऐसे व्यक्तिगत वन अधिकार-पत्रों और वन-अधिकार पुस्तिका में सुधार किया जाये जिनमें दावेदार के पत्नी का नाम न लिखा हो. कृषि, वनोपज व अन्य सहकारी समितियों के खाते तथा स्थानीय बैंक खातों में भी महिला का नाम जोड़ा जाये.

⚫अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम पंचायतों को गैरकानूनी रूप से नगरीय पंचायतों में बदलने कि प्रक्रिया तत्काल बंद कराने का भरोसा दिलाये.

⚫अनुसूचित क्षेत्र की नगरीय इलाके के लिए भूरिया समिति के दूसरी रिपोर्ट पर आधारित मेसा- म्युनिसिपलिटी (एक्सटेंशन टू शेड्यूल एरियाज़) बिल 2001 को संसद में पारित करने के लिए मुहिम छेड़ी जाए.

⚫ वर्ष 1997 से प्रदेश के अनुसूचित क्षेत्रों के नगरीय इलाकों में गैर संविधानिक (अनुच्छेद 243ZC) के विरूद्ध संपन्न कार्यों को पूर्ण रूप से खारिज करे और नगरीय निकायों के वार्डों को ग्राम सभा के रूप में स्थापित करे.

उक्त असंवैधानिक कार्यों के परिणामस्वरूप हुए भू-हस्तांतरण एवं अधिग्रहण को भूतलक्षी प्रभाव से वापस किया जाने का प्रयास करें.

प्रदेश में वन-भूमि सहित व्यापक भूमि-सुधार का प्लान/खाका पेश करें

⚫ प्रदेश के वन-क्षेत्र का ‘फारेस्ट लैंड यूज़ प्लान’ बनाया जाये और उसी आधार पर कोई भी विकासमूलक कार्य ग्रामसभा की सहमति से क्रियान्वित हो.

⚫अनुसूचित क्षेत्रों में 5वी अनुसूची की धारा 5(2) के तहत भू-हस्तांतरण और भू-अधिग्रहण को पूर्णतः रोका जाये.

⚫ अनुसूचित क्षेत्र में समता-जजमेंट 1997 के आधार पर आदिवासी भूमि बचाने का कानूनी प्रावधान करते समय आन्ध्र-प्रदेश की भू-राजस्व संहिता (अनुसूचित क्षेत्र का 1/70) के तर्ज पर छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 165 का संशोधन हो.

⚫ राज्य सरकार द्वारा बनाई गई आपसी सहमति से भूमि क्रय नीति 2016 तथा लैंड-बैंक नीति निरस्त की जाये, तथा भू-अर्जन कानून 2013 में अर्जित की गयी भूमि जिसका 5 वर्षों से उपयोग नहीं हुआ है, उसे भू-स्वामी व ग्रामसभा को तत्काल वापस किया जाए.

⚫ औद्योगिक/विकास योजनाओं के नाम पर अनुसूचित क्षेत्रों में जमीन अदला-बदली की गैरकानूनी प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाई जाये.

⚫भू -अर्जन कानून 2013 की चौथी अनुसूची में वर्णित केन्द्रीय कानूनों, जैसे कोल बेयरिंग एक्ट, इत्यादि, को अनुसूचित क्षेत्रों की ग्राम सभा सहमति को बाध्यकारी बनाते हुए, भू-अर्जन कानून के सम्पूर्ण दायरे में लाया जाये.

छत्तीसगढ़ में मानव-वन्य जीव द्वन्द ख़त्म करने का वादा करे

⚫वन क्षेत्र में हाथी के पर्यावास (हैबिटैट) को चिन्हित कर, प्राकृतिक जंगल को उनके आहार-अनुकूल बनाये रखा जाये, और उसे खनन-उद्योगों और गैर-वानिकी कार्यों के लिए ‘नो-गो’ (प्रतिबंधित) क्षेत्र घोषित किया जाये.
हाथी प्रभावित क्षेत्रों में जान-माल की सुरक्षा-बीमा कर ग्रामसभा की सहमति से हाथी द्वारा नुकसान का आंकलन कर क्षतिपूर्ति अविलम्ब रूप से प्रदाय किया जाये.

⚫ हाथी द्वारा इन्सान की मौत होने पर जिम्मेदार वन-अधिकारी पर आपराधिक लापरवाही का मामला दर्ज कर मुकदमा चलाया जाये.

प्रदेश के ‘टाइगर रिज़र्व’ सहित अन्य वन्यप्राणी अभ्यारण्य व राष्ट्रीय उद्यानों से शून्य विस्थापन प्रतिबद्ध करे.

⚫ प्रदेश में ‘टाइगर रिज़र्व’, अभ्यारण्य/राष्ट्रीय उद्यान में निवासरत समुदाय के वनाधिकार मान्य कर अधिकार-पत्र सौंपे जाये, तथा जन-वन्यजीव सह-अस्तित्व की आरण्यक संस्कृति के आधार पर अभ्यारण्यों/ राष्ट्रीय उद्यानों को ग्रामसभाओं के जरिये प्रबंधित किया जाये.

⚫ वन-विभाग के कर्मचारी, जो बगैर किसी लिखित आदेश के स्थानीय लोगों को डराते, धमकाते है, या विस्थापन के लिए दबाव डालते हैं या मारते-पीटते हैं, तो, उन पर अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 2016 की धारा 3(f), (g), (t ) के तहत तत्काल कारवाई कर दण्डित किया जाये.
जिन अभ्यारण्यों और उद्यानों से गैर-वाजिब तरीके से लोगो को उजाड़ा है, उन्हें वापस लाया जाये.

⚫ वनोपज का बेहतर मूल्य दिलाने सहित, वन-आश्रित समुदायों की वनोपज-आधारित आजीविका को मजबूत करने का भरोसा दिलाये.

⚫वनाधिकर मान्यता कानून की धारा 3(1) ग में वर्णित वनोपज के स्वामित्व के अधिकार के तहत ग्राम सभाओं को महाराष्ट्र की तर्ज पर वनोपज अभिवहन अनुज्ञा (टी.पी.) जारी करने का अधिकार दिया जाये.

⚫ ग्राम सभाओं को उनके क्षेत्र में प्रचुर वनोपज, जैसे-तेंदू पत्ता, बांस, महुआ फूल आदि की नीलामी के लिए सक्षम बनाया जाये, और सम्पूर्ण रायल्टी संकलन का अधिकार प्रदान किया जाये.

⚫वनोपज सहकारी समितियां अपने कार्यक्षेत्र की ग्रामसभाओं के प्रति जवाबदेह हो, और वन-विभाग के नियंत्रण से मुक्त की जाये.
वनोपज के लिए लाभकारी दर सुनिश्चित करते हुए, संशोधित न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करे, और उससे कम मूल्य से खरीदी गैर-क़ानूनी मानी जाये.

⚫ ट्राईफेड, नाबार्ड जैसे प्राधिकरण सीधे ग्रामसभाओं को मूल्य-संवर्धन के लिए तकनीकी एवं सरल-ब्याज (डी.आर.आई.) रूपी आर्थिक सहयोग प्रदान करे

⚫वनों के निजीकरण को बढ़ावा देने वाले नीति-नियमों का समर्थन नहीं करने की प्रतिबद्धता दिखाएँ.

‘ ⚫ राष्ट्रीय वन नीति’ मसौदा, क्षतिपूर्ति वनीकरण निधि कानून 2016 व नियम 2018, ‘ग्रीन इंडिया मिशन’ कार्यक्रम, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के लिनिअर-प्रोजेक्ट (रेलवे, नहर, सड़क, विद्युत् ग्रिड आदि) के लिए ग्रामसभा की सहमति से छूट (exemption) का आदेश से वन-अधिकार विरोधी प्रावधानों को रद्द कराने का प्रण करे.

खनिज संपदा पर ग्रामसभा के अधिकार का सम्मान दे

⚫ खनिज दोहन की नीति’ स्वीकारे व सामुदायिक वन-क्षेत्र में खनिज दोहन के लिए डायवर्शन ‘अपवाद’ स्वरूप हो, इसका वादा करे.

⚫ अनुसूचित क्षेत्रों में गौण खनिजों (रेत, गिट्टी, मुरुम आदि) का प्राकृतिक-संतुलन बरकरार रखते हुए उत्खनन हो, और सम्पूर्ण रायल्टी सीधे ग्राम सभाओं को हस्तांतरित करने का वादा करे. यदि, ग्रामसभा, अपने गौण खनिजों का विधिपूर्ण तरीके से बोली/निविदा जारी करना चाहे तो, उन्हें मदद की जाये.

⚫ खान एवं खनिज (विकास एवं विनियम) अधिनियम, 2015 के तहत, प्रदेश के जिलों में गठित जिला खनिज न्यास (DMF) को ग्रामसभाओं के प्रति जवाबदेह बनाया जाये. DMF की गतिविधियों का संचालन सम्बंधित ग्राम सभाओं के अनुमोदन से हो, खनन प्रभावित लोगों की सूची भी ग्रामसभा से अनुमोदित करवाई जाये. न्यास में जमा किये जा रहे खनन रायल्टी का बड़ा हिस्सा, प्रभावित ग्रामसभाओं के प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा, जंगल आधारित टिकाऊ आजीविका के विकास और जंगल और जल के प्रबंधन व संवर्धन के लिए दिया जाये.

अनुसूचित क्षेत्रों में विकास-असंतुलन दूर करने का वादा करें.

⚫ अनुसूचित क्षेत्रों में विकास-असंतुलन एवं असमानता दूर करने हेतु राज्य-बजट का निश्चित अंश व्यय करने का वादा करें. परन्तु किसी भी विकास कार्यो के लिए ग्रामसभा की लिखित, दबाव-मुक्त, अग्रिम, संसूचित सहमति लेना अनिवार्य किये जाने का आश्वासन दो.
अनुसूचित क्षेत्रों में शांति एवं सुशासन के लिए आदिवासी सलाहकार परिषद् के अनुशंसा अनुरूप कार्ययोजना बनायीं जाये. परिषद् के उत्तरदायी संचालन के लिए, समाज के बुद्धिजीवी व आदिवासी विषयों के जानकार व्यक्तियो को शामिल कर, मुख्यमंत्री के सभापतित्व के बजाय, सदस्यों के द्वारा बहुमत से नामनिर्देशित किये जाये.

⚫ आदिवासी उप-योजना की राशि को संविधान के अनुच्छेद 275 परन्तुक के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य, शुद्ध पेयजल, जल संधारण, कुपोषण एवं रोजगार पर खर्च से डाइवर्ट न होने दे, व लेप्स न होने देने का वादा करे.

⚫ सरगुजा व उत्तर क्षेत्र विकास प्राधिकरण, और बस्तर व दक्षिण क्षेत्र विकास प्राधिकरणों को भंग किया जाये और उनके जरिये व्यय की जाने वाली आदिवासी उप-योजना (TSP) की निधि, क्षेत्र की ग्रामसभाओं के माध्यम से खर्च की जाये.

⚫ अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासियों के ऊपर कोई भी क़र्ज़ वसूली पर ग्राम सभा की अनुशंसा से तुरंत कारवाई करने की प्रशासनिक व्यवस्था की जाये और छत्तीसगढ़ अनुसूचित क्षेत्र दायित्व निर्धारण नियम 1979 को तुरंत लागू किया जाये. साथ ही, 5वी अनुसूची का पैरा 5(2)(ग), पेसा कानून, 1996 की धारा [4ड(v)], संविधान की अनुच्छेद 275 परन्तुक और माननीय उच्चतम न्यायालय का जयंत वर्मा बनाम भारत सरकार (WP (c) 134/2013) के फरवरी 2018 के फैसले का अनुपालन सुनिश्चित किया जाये.

उक्त मांगों को समयबद्ध तरीके से कार्यन्वयन करने के लिए संसाधन व स्वशासन पर लोक-आयोग गठित की जाये.

⚫उपरोक्त वर्णित सभी मुद्दों के समयबद्ध व उचित हल के लिए प्रदेश में एक संसाधन-स्वशासन लोक आयोग गठित की जाये, जिसमें, दो अनुसूचित जनजाति के सांसद/विधायक , राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष, आदिवासी विकास विभाग के प्रधान सचिव, एवं प्रदेश के आदिवासी अधिकारों पर कार्यरत संगठनों के 4 प्रतिनिधि शामिल हो. यह समिति माह में एक बार उक्त मुद्दों के निवारण के लिए मुख्य सचिव, छत्तीसगढ़ शासन को उचित परामर्श दे सके. संसाधन-स्वशासन लोक आयोग अपने परामर्श पर शासन द्वारा की गयी कारवाई की समीक्षा करे.

⚫ प्रत्येक जिले में एक जिला स्तरीय संसाधन-स्वशासन लोक कार्यदल गठित कर उक्त मांगों का निराकरण संसाधन-स्वशासन लोक आयोग के निर्देशन में कार्य करे. जिले में गठित लोक कार्यदल में एक स्थानीय विधायक, जिला पंचायत प्रतिनिधि, कम से कम 3 ग्रामसभा से नामित सदस्य, एवं आदिवासी अधिकारों पर कार्यरत संगठनों के 3 प्रतिनिधि शामिल हो. यह लोक कार्यदल की बैठक प्रत्येक माह में आयोजित हो, जो उक्त मुद्दों के निवारण के लिए जिला कलेक्टर को उचित परामर्श दे सके, और कारवाई की समीक्षा करे.

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विजय भाई द्वारा तैयार घोषणा पत्र 

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