छत्तीसगढ हमेशा ही एक ओर संघर्ष, और दूसरी ओर दमन और लूट, का गढ़ रहा है। राज्य के गठन से ही यहाॅ की सामन्ती व जातिवादी समाजिक ढाॅचे पर टिका है राजकीय दमन और खनिज सम्पदा का कारपोरेट घरानों द्वारा लूट। इसके विपरीत यहाॅ विभिन्न राजनैतिक आन्दोलनों व संघर्षों का एक इतिहास भी रहा है – चाहे वो किसान और आदिवासी समुदायोेें द्वारा लड़ी जा रही जल-जंगल-ज़मीन की ज़ोरदार संघर्ष का हो या फिर मज़बूत मज़दूर आन्दोलन का .वर्तमान में दलित और आदिवासी आन्दोलन में एक नई उर्जा और तीव्रता भी नज़र आ रही है – लोेग अपने संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा केलिए और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के खिलाफ जगह जगह अपनी आवाज बुलंद कर रहे है ।

जहाॅ संघर्ष तेेज होता है वहाॅ दमन भी उतना ही खतरनाक होता है। बस्तर जैसे इलाकों में नक्सल-विरोधी अभियान के नाम से फर्ज़ी मुठभेड़ और यौनिक हिंसा किया जा रहा है। उत्तरी छत्तीसगढ़ में गैर कानूनी भूमि अधिग्रहण और पेसा जैसे कानून के उल्लंघन पर आवाज़ उठाने वालों पर फर्ज़ी मुकदमें लगातार डाले जाते हैं; पत्थलगढ़ी जैसे आन्दोलन में लोगों को सरासर गिरफतार करना; किसान आन्दोलन सजुड़े लोगों पर निरन्तर दमन, उनकी बेवजह गिरफतारी; शिक्षा और स्वास्थ करमचारी, और यहाॅ तक के पुलिस कर्मियों के हड़तलों पर भयावय दबाव डालकर उनके आवाज़ और मांगों को दबाना – जगह जगह लोगों के विरोध को पुलिस-प्रशासन के आतंक से कुचला जा रहा है। स्थिति ऐसी है कि लोकतंत्र में रहने के बावजूद इस राज्य में एक रैली निकालने की अनुमति तक नहीं मिलती हैं और मांगने हमें उच्च न्यायालय तक जाना पड़ता है, और वहाॅ भी संख्या का सीमा 15 पर रखकर अनुमति दी जाती है

 

जातिगत हिंसा पर आवाज़ उठाने वाले न जाने कितने आदिवासी और दलित समाजिक कार्यकर्ताओं पर मुकदमें दर्ज़ किये गए हैं, जो महीनों से बिना जमानत मिले जेल में बंद हैं। गौ-हत्या और धर्म परिवर्तन के नाम पर जगह जगह लोगों को गिरफतार किया गया है – धार्मिक अल्पसंख्यकों और आदिवासियों पर हिन्दुत्ववादि ताकतों द्वारा हमले जगह जगह बढ़ते गई हैं – राजसत्ता के मदद से इनकी दण्डमुक्ति दिन-ब-दिन बढ़ रही है। स्थिति इतनी बिगड़ गई है कि मुख्यधारा के विपक्षी दलों के सामान्य    गतिविधियों पर रोक लगाई जा रही है!

इस बड़ते दमन के चलते छत्तीसगढ़ के भीतर और देश भर के जन आन्दोलन एक ही मंच पर इकट्ठा हो रहे हैं – सरकार के जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाने केलिए। इस विरोध को दिशा और आवाज़ देने में देशभर के कुछ पत्रकार, वकील और सामाजिक कार्यकर्ताओं का महत्वपूर्ण भूमिका रहा है।

भीमा-कोरेगाॅव का केस एक रूप से राजकीय दमन का एक नया पड़ाव को दर्शाता है। दलितों के एक ऐतिहासिक विजय के जश्न मनाने का एक कार्यक्रम को जबरदस्ती माओवादियों से सम्बंध बताकर कार्यक्रम के वैघता पर सवाल उठाना दमन का एक नया और खतरनाक चहरा का प्रतीक है।

 

इसी दमन के तहत विभिन्न राज्यों में पूणे पुलिस द्वारा 10 सामाजिक कार्यकर्ता, वकील, कवि, लेखक व पत्रकारों की गिरफतारियाॅ हुई और 10 और केे घरों पर छापा मारा गया। एक लोकतंत्र में होकर भी मानवधिकार कार्यकर्ताओं के कानूनी कार्याें को गैरकानूनी घोषित करना, यह बहुत ही भयावय लक्ष्य है। मीडिया द्वारा झूठे प्रचार करवाकरे, ‘राज्य सुरक्षा‘ के नाम पर लोकतांत्रिक विरोध की गुंजाइश को खत्म करना बहुत ही खतरनाक है।

 

हाल में हुई घटनाओं से स्पष्ट नज़र आता है कि ऐसे क्रूर और गैर-लोकतांत्रिक हमले में छत्तीसगढ़ सबसे आगे है। संविधान को दबाने के ऐसे कदम पर रोक लगाने केलिए और लोकतंत्र को बचाने केलिए हमें ऐसे समय में एक व्यापक और मज़बूत आन्दोलन की आवश्यकता है।

हमें पुलिस द्वारा कानून और सत्ता के दुरूपयोग के उपर न्यायालय के ध्यान को आकर्शित करना होगा। साथ ही हमें यू.ए.पी.ए जैसे काले और गैर-लोकतांत्रिक कानूनों को रद्द करने की मांग रखनी होगी। हमें साथ मिलकर, साझे मकसद के साथ अपने संघर्षाें में एकता लानी होगी। लोकतंत्र पर किये जा रहे हमलों पर रोक लगाने केलिए हमें एक आन्दोलन का निर्माण करना होगा।

आईए साथ में आवाज़ उठाकर कहें – हम अपने अधिकारों को लेकर ही रहेंगे! विरोध करने, हिफाज़त करने और संगठित होने के अधिकार के लिए लडेंगे!
देशभर के लोकतांत्रिक और प्रगतिशील ताकतों को 31 अक्टूबर को राजकीय दमन के खिलाफ कंवेंशन में शामिल होने का आव्हान करते हैं –
आईए साथ में विरोध करने, हिफाज़त करने और संगठित होने के अधिकार केलिए संघर्ष को आगे बढ़़ाएं!

आदर सहित :

आयोजन समिति की ओर से .

डा. लाखन सिंह ,रिन चिन ,राजेंद्र सायल ,तुहिन देव ,श्रेया ,डा.गोल्डी जाँर्ज ,कलादास डेहरिया एपी जोसी ,नंद कश्यप, लखन सुबोध आलोक शुक्ला अखिलेश एडगर और अन्य .

संपर्क :

रिन चिन : rinchin@gmail.com, 9516664520

डा. लाखन सिंह : Bhagatsingh788@gmail.com-7773060946
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