कविता .. अहिंसा का छद्म   ःः संजीव खुदशाह

तुम मुख से निकले हो ,
या फिर तुम होगे चित के पावन।
तुम शाकाहार के झंडाबरदार भी हो सकते हो।
अहिंसा तुम्हारे धर्म का मुख्य एजेंडा है।
पंडित तो तुम पैदाइशी हो।

 मैंने देख लिया है उन *तलवारों को जिसे तुमने अहिंसा के नाम पर सजा* रखा है।
मैंने देख लिया है खून पीती बंदूक की गोलियों को,
जिसे तुमने अभी अभी गांधी के सीने में धसाया है।

 तुम्हारे, मुख से निकलने, चित्तपावन होने और शाकाहार की पोल खुल गई है।

जब तुम अपने को श्रेष्ठ कहते हो तब तुमसे बड़ा हिंसक कोई नहीं होता ,
क्योंकि हिंसा का व्याकरण ही लोगों को अपने अधीन देखना है

 पोल खुल जाती है तुम्हारी पंडिताई और अहिंसक होने की,
*जब तुम किसी की हत्या का जश्न मनाते हो और उसे वैध ठहराते हो।*

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