अनुज श्रीवास्तव की कविता ःः तुम कभी तो बैठते होगे , अकेले कभी तो विचार करते होगे

अनुज श्रीवास्तव 

तुम कभी तो बैठते होगे अकेले
कभी तो विचार करते होगे
अपने काम, अपनी जिम्मेदारियों पर

एक पत्रकार होते हुए तुम सच से आंखे कैसे फेर लेते हो
शीशे में अपना चहरा देखते हो तो 
मुह से बाहर निकली, लार टपकाती ज़बान
तुम्हारे इंसान होने पर सवाल तो उठाती होगी

मुकाबिल में
दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति ही क्यों न हो
तुम्हारा ईमान
अपनी कलम पर 
उसका दबाव कैसे स्वीकार कर लेता है

सच जानकर झूठ लिख देने के बाद
घर के जिस कमरे में माँ बैठी है
वहां घुसते हुए पैर तो कांपते होंगे

जब देते हो परिचय कहीं
के पत्रकार हूं…
शर्म तो आती होगी

कहीं से आता होगा जब
कोई ऑफऱ
मोटा लिफ़ाफ़ा
वज़नी डिब्बा

दवात की शीशी मुह की शक्ल में निब की जीभ से 
तुम्हारे चहरे पर कालिख थूकती तो होगी

ससत्ताधीश की जूती 
जब चढ़ती है सिर पर तुम्हारे
गले में कुछ पट्टा सा कसता तो होगा

एक पत्रकार होते हुए तुम…
भला कैसे…

अनुज श्रीवास्तव , रंगकर्मी और कवि 

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