तेल_के_खेल_में_हुआ_देश_का_बेड़ागर्क!! : संजय पराते 

06.10.2018

◆ पेट्रोल की कीमत में ढाई रुपये की कटौती करके फिर इस ‘जुमलेबाज’ सरकार ने दिखा दिया है कि आम जनता के प्रति उसकी कथित चिंता केवल चुनावों से ही प्रेरित है. वरना पेट्रोल की कीमत में 25 रुपयों की बढ़ोतरी करके ढाई रुपयों की कटौती का ‘नाटक’ वह नहीं करती.

◆ निश्चित ही, पेट्रोल-डीजल-गैस की कीमतों का कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों के साथ कुछ संबंध होता है. लेकिन हमारे देश में ये संबंध पूरी तरह नदारद हैं. यदि सितम्बर 2013 में कच्चे तेल की कीमत को आधार बनाया जाए, तो यह पूरी तरह से स्पष्ट होता है. तब संप्रग-2 की कांग्रेस सरकार थी, कच्चे तेल की कीमत सबसे ज्यादा 110.53 डॉलर प्रति बैरल थी और देश में पेट्रोल की कीमत भी सबसे ज्यादा 83.63 रूपये प्रति लीटर थी. यही वह समय था, जब कांग्रेस के तमाम तर्कों को नकारते हुए भाजपा सड़कों पर उग्र आंदोलन कर रही थी और “बहुत हुई महंगाई की मार – अबकी बार भाजपा सरकार” का नारा लगा रही थी. भाजपा की जुमलेबाजी में फंसने से तब जनता ने भी इंकार नहीं किया था.

◆ मई 2014 के अंत में तेल की कीमत में कुछ गिरावट आई थी और वह 104.35 डॉलर हो गया था. तब देश में भी पेट्रोल की कीमत समानुपातिक ढंग से कम होकर 80.11रूपये हो गई थी. लेकिन इस समय मोदी-शाह के नेतृत्व में राजग की भाजपा सरकार आ चुकी थी.

◆ “देश को नसीब वाला प्रधानमंत्री चाहिए कि बदनसीब प्रधानमंत्री?” — यह ओछा व्यंग्य था मोदी का, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमत गिरने पर. लेकिन इन व्यंग्य में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के बारे में उनके ‘अज्ञान’ का भी प्रदर्शन था, जो बाद में जाहिर भी हो गया. जनवरी 2016 में कच्चे तेल की कीमत गिरकर 29.42 डॉलर ही रह गई थी. लेकिन देश के हिस्से में बदनसीबी ही आई थी. सितम्बर 2013 या अप्रैल 2014 की कीमतों के आधार पर तब पेट्रोल की कीमत 22-23 रूपये होनी चाहिए थी, लेकिन अप्रैल 2016 में पेट्रोल की कीमत घटाकर 59.68 रूपये लीटर ही की गई. यह अपेक्षा से ढाई-तीन गुना तब भी ज्यादा था. ऐसा ‘लुटेरा चौकीदार’ ही इस देश के नसीब में बदा था!!

◆ सितम्बर 2018 के अंतिम सप्ताह में कच्चे तेल का अंतर्राष्ट्रीय मूल्य 73.25 डॉलर हो गया. संघी गिरोह के पास इसका कोई जवाब नहीं है कि इस देश का प्रधानमंत्री इतना ‘बदनसीब’ कैसे हो गया? लेकिन आज 4 अक्टूबर को पेट्रोल 90 रूपये को पार कर गया. लेकिन 2013 की कीमतों के आधार पर पेट्रोल की कीमत 55-56 रूपये से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. अब भी यह आधार मूल्य से डेढ़-पौने दो गुनी ऊंची कीमत पर बेचीं जा रही है. इसे ही कहते हैं #जनता_का_तेल_निकालना.

◆ कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमत में उतार-चढ़ाव की झलक हमारे देश में पेट्रोल-फैसल-गैस की कीमतों में नहीं दिखती, तो इसके दो मुख्य कारण हैं :

1. जब भी कीमतें गिरी हैं, भाजपा सरकार ने घरेलू टैक्स बढ़ाकर इनकी कीमतों को ऊंचा ही बनाये रखा और आम जनता को राहत देने के बजाये सरकारी तिजोरी और ज्यादा भरने पर जोर दिया है, ताकि बजट-घाटे को कम किया जा सके. ऐसा काम वह अमीरों/कॉरपोरेटों द्वारा हड़पे जा रहे टैक्स को वसूल करके भी कर सकती थी.

2. पेट्रोलियम की कीमतों को कथित रूप से सरकारी नियंत्रण से बाहर कर दिया गया और इसकी कीमतों को लाभजनक स्थिति में निर्धारित करने का अधिकार कंपनियों को सौंप दिया गया. ये कंपनियां आम जनता की तकलीफों की कीमत पर हजारों करोड़ रुपयों का मुनाफा पीट रही है, लेकिन इस लाभ को जनता के साथ शेयर करने से इंकार कर रही हैं.

◆ इस साल 2018 में पिछले 9 महीनों में पेट्रोल की कीमत में 20% से ज्यादा की वृद्धि हुई है. पेट्रोल की कीमत बढ़ने की यही रफ्तार रही, तो मई 2019 के अंत में पेट्रोल की कीमत 110 रूपये प्रति लीटर होगी. क्या देश की जनता इस कीमत पर पेट्रोल खरीदने के लिए तैयार है?

◆ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमत गिरने के कोई संकेत नहीं है. यदि यह कीमत 2013-14 के अपने उच्चतम स्तर 110.53 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचती है और मोदी राज कायम रहता है, तो तब इस देश की जनता को पेट्रोल 130 रूपये और डीज़ल 115 रूपये प्रति लीटर खरीदना होगा. गैस सिलिंडर की कीमत भी तब 1500 रूपये से कम नहीं होगी. तब क्या 83 रूपये की जगह 130 रूपये में पेट्रोल, 48 रूपये की जगह 115 रूपये में डीजल और 400 रूपये की जगह 1500 रुपयों में गैस सिलिंडर ख़रीदने के लिए जनता तैयार होगी? इस देश के ‘चोर चौकीदार’ की नीतियों ने इस देश को ‘बदनसीब’ बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

◆ इसीलिए अब इस देश की जनता को यही तय करना है,
#बहुत_हुई_महंगाई_की_मार_नहीं_चाहिए_चोरों_की_सरकार!

संजय पराते, माकपा छतीसगढ के राज्य सचिव 

Leave a Reply

You may have missed