यू. एन. विशेषज्ञों का बयान :  भारत में आतंकवादी आरोपों की आड़ में मानव अधिकार रक्षकों को खामोश करने का इरादा .

तजेनेवा: 5 अक्टूबर 2018

दस मानव अधिकार रक्षकों के खिलाफ आतंकवाद के आरोपों के मढ़े जाने पर यूनाइटेड नेशंस (संयुक्त राष्ट्र) के विशेषज्ञों (समयाभाव में इनके नाम अंग्रेज़ी में नीचे दिए गए हैं) ने चिंता व्यक्त की है. यह मानव अधिकार रक्षक भारत में अत्यंत गरीब और हाशिये पर पड़े समुदायों के बीच सक्रिय हैं, जिनमें दलित शामिल हैं. इन विशेषज्ञों ने अधिकारीयों से गुज़ारिश की है कि उनके प्रकरणों की तत्काल सुनवाई अंतर्राष्ट्रीय कानून के मापदंडों के अनुसार सुनिश्चित की जाए.

इन सभी को एक सार्वजनिक सभा से सम्बंधित जांच के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था, जो भीमा-कोरेगांव की जंग की 200 व्ही वर्षगाँठ मनाने के एक दिन पहले आयोजित की गयी थी. यह एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पर्व है जो दलितों के सशक्तिकरण का प्रतीक है. पुलिस ने बाद में दावा किया कि यह मानव अधिकार रक्षकों का “गैर-कानूनी संगठनों” से सम्बन्ध था.

यूनाइटेड नेशंस के विशेषज्ञों ने कहा है कि :

“हमारे लिए यह एक चिंता का विषय है कि भीमा-कोरेगांव के स्मारक समारोह से जोड़ कर आतंकवाद के आरोपों का इस्तमाल महज़ इन मानव अधिकार रक्षकों को खामोश करने के लिए किया जा रहा है, जो भारत के दलितों, देशज, और आदिवासी समुदाय के अधिकारों की सुरक्षा और बढ़ावा देने के लिए समर्पित हैं”.

श्री सुरेन्द्र गद्लिंग, श्री रोना विल्सन, सुश्री शोमा सेन, श्री सुधीर धावले और श्री महेश राउत को 6 जून को पुणे नगर ले जाया गया, जहाँ वे यरवदा जेल में अभी तक कैद हैं, क्योंकि उनकी हिरासत की अविधि बार-बार बढाई जा रही है. सुश्री सुधा भारद्वाज, श्री ब्वेर्नों गोंसाल्वेस, श्री अरुण फर्रेइरा, श्री वरावर राव अपने घरों में नज़रबंद हैं. यूनाइटेड नेशंस के विशषज्ञों ने श्री गौतम नवलखा की 1 अक्टूबर 2017 को घर में नज़रबंदी से रिहाई का स्वागत किया, लेकिन बाद में महाराष्ट्र सरकार द्वारा उनकी रिहाई के अदालातींन फैसले के खिलाफ अपील से विस्मित है.

यूनाइटेड नेशंस के विशेषज्ञों ने कहा है कि :

“हम मानव अधिकार रक्षकों के खिलाफ लगाये गए आरोपों से काफी चिंतित हैं, और उन सभी 9 जनों को लगातार हिरासत में रखे जाने से भी “यह सभी-के-सभी शांतिपूर्ण तरीके से मानव अधिकारों की सुरक्षा के लिए सक्रिय रहे हैं, जिनमें हाशिये पर पड़े लोग और अल्पसंख्यक समुदाय, राजनितिक बंदी, और महिला, शामिल हैं; और यह स्पष्ट नज़र आता है कि उनकी गिरफ्तारियां उनके मानव अधिकारों के लिए काम से ही जुडी हैं.”

यूनाइटेड नेशंस के विशेषज्ञों ने कहा है कि :

“हम भारतीय अधिकारीयों से अपील करते हैं कि सभी हिरासत में रखे गए मानव अधिकार रक्षकों को उचित कानूनी प्रक्रिया प्रदान की जाए, जिसमें निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार शामिल हो, ताकि उनकी त्वरित रिहाई हो सके. हम सरकार से आग्रह करते हैं कि आम तौर पर मानव अधिकार रक्षकों के अपराधीकरण के हथकंडों अपनाने से बचें, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों के अत्यधिक व्यापक रूप से उपयोग करना शामिल है”.

“हम भारत सरकार को याद दिलाना चाहेंगे कि मानव अधिकार रक्षकों के अधिकारों की सुरक्षा करना और उन्हें बढ़ावा देना उनका कर्तव्य है, जिसमें महिला मानव अधिकार रक्षक शामिल हैं, जब तक कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपने वैध काम को करते हैं”.

इन दस कार्यकर्ताओं को गैरकानूनी गतिविधियाँ प्रबंधन कानून (यू.ए.पी.ए.) के तहत देश भर में दो छापेमारी में हिरासत में लिए गया था: पहले 6 जून 2018 को, और दूसरा 28 अगस्त 2018 को. “यु.ए.पी.ए. में ‘गैरकानूनी गतिविधियों’ और ‘आतंकवादी संगठन की सदस्यता’ की अस्पष्ट परिभाषा राज्य की एजेन्सियों को विवेकाधीन शक्तियों प्रदान करती हैं, जो इस कानूनी प्रकित्य में न्यायायिक निरीक्षण को कमज़ोर करती हैं, और नागरिक आज़ादी को शक्तिहीन करती हैं”, ऐसा यूनाइटेड नेशंस के विशेषज्ञों का मानना है.

यह विशेशज्ञ इस प्रकरण के सम्बन्ध में भारतीय अधिकारियों के संपर्क में हैं.

यूनाइटेड नेशंस के विशेषज्ञों की सूची:

(The UN experts)

• Mr. Michel Forst, Special Rapporteur on the situation of human rights defenders;

• Ms. Fionnuala D. Ní Aoláin, Special Rapporteur on the promotion and protection of human rights and fundamental freedoms while countering terrorism;

• Mr. Fernand de Varennes, Special Rapporteur on minority issues;

• Mr. David Kaye, Special Rapporteur on the promotion and protection of the right to freedom of opinion and expression;

• Ms. Ivana Radacic (Chair), Ms. Meskerem Geset Techane (Vice Chair),

• Ms. Elisabeth Broderick, Ms. Alda Facio, Ms. Melissa Upreti, Working Group on the issue of discrimination against women in law and in practice;

• Ms. E. Tendayi Achiume, Special Rapporteur on contemporary forms of racism, racial discrimination, xenophobia and related intolerance;

• Mr. Seong-Phil Hong (Chair),
• Ms. Leigh Toomy (Vice-Chair),
• Ms. Elina Steinerte (Vice-Chair),
• Mr. José Guevara, Mr. Setondji Adjovi, Working group on arbitrary detention.

सन 2016 में अल्पसंख्यक मुद्दों पर पूर्व विशेष राप्पोर्तयूर/ दूत, सुश्री रीता इस्सक-नडिय, ने मानव अधिकार परिषद् को एक विषयगत रपट पेश की थी, जो जाति आधारित भेद-भाव और विरासत की स्थिति की समान प्रणाली से सम्बंधित थी.

देखें : A/HRC/31/56

नोट: विशेष राप्पोर्तयूर/ दूत और स्वतंत्र विशेषज्ञ उस विशेष प्रक्रिया का हिस्सा हैं जो मानव् अधिकार परिषद् की प्रक्रिया से जुडी है, जो यूनाइटेड नेशंस की मानव अधिकार व्यवस्था में स्वतंत्र विशेषज्ञों की सब से बड़ी संस्था है. परिषद् की स्वतंत्र तथ्यान्वेषी और निगरानी तंत्र का सामान्य नाम है “विशेष प्रक्रिया”, जो या तो किसी ख़ास देश की परिस्थिति को संबोधित करती है, या फिर पूरे विश्व में विषयगत मुद्दों पर मुखातिब होती है. विशेष प्रक्रिया के विशेषज्ञ स्वैच्छिक आधार पर काम करते हैं; वे यू एन के कर्मचारी नहीं है और न ही वे अपने काम के एवज़ में पगार पाते हैं. वे किसी भी सरकार या संगठन से विमुक्त होते हैं और अपनी व्यक्तिगत क्षमता पर काम करते हैं.

यू एन मानव अधिकार पृष्ठ – भारत

आगे जानकारी हेतु और मीडिया से अनुरोध के लिए, कृपया संपर्क करें:

Ms. Jessica Ní Mhainín: defenders@ohchr.org

मीडिया द्वारा यू एन स्वतंत्र विशेषज्ञों पर जानकारी हेतु, संपर्क करें:

Jeremy Laurence, UN Human Rights (+41 22 917 9383): jlaurence@ohchr.org

इस वर्ष अधिकारों की सार्वभौम घोषणा की 70 व्ही वर्षगाँठ मांई जा रही है, जिसे यूनाइटेड नेशंस ने दिसम्बर 10.1948 को पारित किया था. सार्वभौम घोषणा – जो 500  भी अधिक भाषाओँ में अनुवादित किया जा चुका है – की जड़ में सिद्धांत है कि : “सभी मनुष्य जन्म और सम्मान में स्वतंत्र और बराबर पैदा होते हैं” . यह सभी के लिए, सभी समयों पर उपयुक्त रहता है. इस अनोखे और असरदार दस्तावेज़ की 70 व्ही वर्षगाँठ के सम्मान में, और इसमें निहित महत्वपूर्ण सिद्धांतों को नष्ट होने से रोकने के लिए, हम सभी जनों से हर जगह आग्रह कर रहे हैं कि वे मानव अधिकारों के लिए उठ खड़े हों:

www.standup4humanrights.org.

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