रिचार्ज करा सकूं ज़िंदगी को भी …..

नथमल शर्मा ःः 
 इवनिंग टाइम्स में  ” आज शाम की बात ” 

कोई एक शो रूम, कोई एक काउंटर, कोई एक दूकान नहीं है ऐसी जिसमें इस तरह का कूपन मिलता हो । इस तरह का कूपन जिससे ज़िंदगी रिचार्ज की जा सके । इसी तलाश में तो पहुंचा था वह । सरकार के द्वार । यानी कलेक्टर के दर्शन (जन) में । सरकार को उस पर जरा भी दया नहीं आई । भगा दिया उसे । 

          वह एक छात्र है । राज्य सरकार से उसे (भी) मोबाईल मिला है । सरकार की और चीज़ों की तरह मोबाईल भी मुफ्त में बंट रहे हैं । सरकार इसे संचार क्रांति योजना कहती है । मुफ्त में उस युवा को मोबाईल मिल गया । पर उसे खुशी नही हुई । अपनी निरीहता पर दुख और गुस्सा आया । उसे लगा कि मुफ़्त में मिली चीजें तो उसे अकर्मण्य ही बनाएगी । माल-ए-मुफ्त, दिल – ए- बेरहम । नहीं , उसे नही लेना मुफ़्त में मिली कोई भी चीज़ । वह युवा है । अपनी मेहनत पर भरोसा भी है । इसीलिए दुख और गुस्से में पहुंच गया कलेक्टर के पास । कहा कि फ़्री में मिला मोबाईल वह वापस करना चाहता है । इसके लिए बाकायदा आवेदन भी लिखकर ले गया था वह ।

और जैसा कि होता है सरकारी अफसर किसी भी काम को तुरंत करने के बजाय नुक्स पहले निकालता है । उस अफसर ने भी बिना कुछ सुने आवेदन वापस कर दिया । कहा कि यह तो मुख्यमंत्री के नाम पर है और यह कलेक्टर का जनदर्शन है । जाओ दूसरा आवेदन लाओ । सही बात । मुख्यमंत्री के नाम का आवेदन कलेक्टर क्यों ले भला ? हर पद की अपनी गरिमा और रुआब होता ही है । खैर, दूसरा आवेदन भी आ गया पर वह लिया ही नही गया । बल्कि उसे भगा दिया गया । ऊपर से यह भी कि यहां राजनीति करने आये हो । चलो भागो यहां से । वह कहते ही रहा कि साहब मुझे कुछ काम दिलाइये या दीजिए । मुफ़्त का मोबाईल नही चाहिये । काम करूंगा तो अपनी कमाई से मोबाईल भी ले लूंगा और उसे रिचार्ज कराने लायक भी बन जाऊंगा । पर कौन सुनता उसकी ? किसी को दया नही आई । और वह दुखी होकर लौट गया । 

 

      इस प्रदेश के एक युवक के साथ हुआ यह वाकया कई सवाल छोड़ ही गया । हालांकि अखबारों में उसकी छोटी सी खबर छपी गई । बस । इससे ज्यादा कुछ नही । शायद बहुत कम लोगों ने पढ़ी होगी । सब व्यस्त थे । हैं भी । विधायक और मंत्री जी विकास के लिए पसीना बहाने निकल पड़े हैं । स्मार्ट सिटी के हर कोने को सुंदर बनाना है । मंत्री और उनकी टीम विकास के लिए जुटी है तो कांग्रेस के नेता – कार्यकर्ता ऐसे विकास का विरोध करने में व्यस्त हैं । नारे लगा रहे हैं, गिरफ्तार हो रहे हैं । चुनाव बहुत पास हैं । विकास और विरोध से वोट तैयार होते हैं । वोटों से ही तो गणतंत्र चलता है । सब मिलकर वोट तैयार कर रहे हैं । मुफ़्त में चीज़ें बांटने से भी वोट मिलते हैं । पहले तो चुनाव के समय प्रत्याशी बांटा करते थे । साड़ी ,बिंदी,पायल,बिछिया और शराब । ये सब चोरी – छिपे  क्योंकि प्रलोभन देकर मतदाता को प्रभावित करने अपराध है । चुनाव आयोग कार्रवाई कर सकता है (हालांकि हुई किसी पर नही) ।

 

अब “इस” तरह के अनुभव के साथ जीते लोग सरकार बन गए । लगा कि जब मुफ़्त की चीज़ें बांटने से वोट मिलते हैं तो चुनाव के समय ही क्यों , हर समय यही किया जाए । तमिलनाडु से लेकर कश्मीर तक कि सरकारें जुट गई मुफ़्त में बांटने । चावल, साड़ी, कुकर,टीवी, टिफिन, गेहूं, ज्वार, बाजरा, लेपटॉप, मोबाईल तक सब कुछ फ्री में । फ्री जैसी कीमत में भोजन भी । ज़ाहिर है इससे वोट तय होते हैं । बस एक ही चीज फ्री में नहीं बांट पा रही है सरकार । शराब । सरकार बांटती नही बेचती है शराब । सरकार चलाने वाले हमारे नेताओं को लगता है कि शराब बांटने को लोग ठीक नही समझेंगे । सरकार की इस समझ को दाद देनी पड़ेगी । अपनी जनता (प्रजा नहीं) को कितने अच्छे से समझती है सरकार । जानती है कि लोग मुफ़्त में चीज़ें लेने को गलत नहीं समझते । बल्कि खुश होते हैं । हां, शराब भी मुफ्त में मिल जाये तो शराबी खुश हो जाएंगे पर समाज के अन्य लोगो को खराब लगेगा । 

         समझदार सरकारें बांट रही है सब कुछ । लोग भी हैं कि फ्री में मिली चीज़ें बटोर रहे हैं । देश में कहीं कोई खास विरोध नही है । नैतिक, अनैतिक और मेहनत, ईमानदारी जैसे शब्द अर्थ खो चुके हैं । मुफ़्त में मिल जाये तो लो । बरसों से ये सिलसिला चल रहा है । समाज का एक बड़ा तबका लगभग अकर्मण्य ही तो हो चुका है । पता नही समाज शास्त्री विद्वानों ने इस पर अध्ययन किया है या नहीं । मेहनत से कमाई रोटी ही स्वाद देगी और साथ भी । भारतीय सामाजिक मूल्यों में यह बात रही भी , पर अब कौन परवाह करता है मूल्यों की । वोटिंग मशीनें भी संवेदनहीन होती हैं वह सिर्फ आंकड़े जानती है । और आंकड़े तैयार होते हैं प्रबंधन से । मैनेजमेंट से । इसलिए नैतिकता, ईमानदारी को जरा अलग रखा जाए । स्कूल के निबन्धों और भाषणों के लिए अच्छे हैं ये शब्द । वह युवक भी शायद इतना कुछ नही 

जानता – समझता । वह तो कुछ काम काज करना चाहता है ताकि ज़िंदगी को संवार सके, रिचार्ज कर सके और अपने मोबाईल को भी रिचार्ज कराने लायक बन सके । ऐसे युवा साथियों की ही जरूरत है । उसका साथ देने की जरूरत है । मुफ़्त की चीजें लौटाने की हिम्मत दिखाने की जरूरत है । लोकतंत्र को बचाने की जरूरत है । कितने लोग हैं जो इसके लिए आगे आने के लिए तैयार हैं ?

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 नथमल शर्मा ,वरिष्ठ पत्रकार ,संपादक ईवनिंग टाईम्स बिलासपुर      

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