पहाड़ी_तो_शबरी_की_ही_है_न : सुभाषणी सहगल अली

5.10.2018

महिलाओं के लिए न्याय की कठिन लड़ाई के मार्ग में सबसे जटिल रोड़े परंपराओं, धार्मिक रीति.रिवाज और संस्कार के होते हैं । अधिकतर परम्पराएं धार्मिक रीति.रिवाज और संस्कार महिलाओं को नियन्त्रित करने के लिए उनका निचला दर्जा बनाए रखते हैं और उनकी असमानता को नैतिकता का सहारा देते हैं । विशेष जातियों के महिला.पुरुष दोनों पर लागू होने वाले जाति उत्पीडन के साथ जुडी अपमानजनक और हिंसात्मक परम्पराओं और मान्यताओं को छोड़ए यह सच्चाई तमाम धर्मों को मानने वाले समुदायों की महिलाओं के विषय में पत्थर की लकीर के समान है ।

 

इन रोड़ों को हटाने के लिए महिलाओं को अपने अन्दर साहस जुटाना पड़ता है । अपने समर्थन में लोगों को जुटाना पड़ता है । आन्दोलन और संघर्ष करने पड़ते हैं । न्याय की गुहार लगानी पड़ती है । हर कदम पर सरकार की मदद की अनिवार्यता से मजबूर होना पड़ता है ।

सरकारे संविधान और समानता के प्रति अपनी कटिबद्धता की दुहाई देती है, लेकिन उनकी नीयत, नीति और व्यवहार को बदलती राजनैतिक प्राथमिकताएँ और राजनैतिक लाभ की समझदारी तय करती है ।

तीन तलाक के मामले को लेकर मोदीजी और उनके मंत्री देशभर मे मुस्लिम महिलाओं के रक्षक होने का दावा कर रहे हैं, सच्चाई तो यह है की तीन बहादुर मुस्लिम महिलाओं ने सर्वोच्च न्यायालय में एक बार में तीन तलाक कहकर तलाक देने की प्रथा के खिलाफ अर्जी लगाईं थी । न्यायालय ने उनकी बात को मानते हुए इस पद्धत्ति को गलत और संविधान.विरोधी ठहरा दिया । यह मुस्लिम महिलाओं और न्याय की बड़ी जीत थी । सरकार ने इस मामले का राजनैतिक लाभ उठाने के लिए “तीन तलाक” के खिलाफ कानून बना डाला जिसके तहद एक दीवानी का जुर्म ; एक साथ तीन तलाक कहना : को एक फौजदारी के जुर्म में बदल दिया । संसदीय रास्ते से अलग हटकर सरकार ने कानून को अध्याधेश के माध्यम से लागू कर दिया।

क्या सरकार वास्तव में मुस्लिम महिलाओं की पक्षधर है ? मुसलमानों में ही बोहरा समुदाय शामिल है । इनका एक बहुत बेदर्द रिवाज है, बच्चियों का खतना यह खतना आज भी ज्यादातर ब्लेड से किया जाता है । दर्द तो उस समय बहुत होता है और यह दर्द जिंदगी भर ख़त्म नहीं होता है ।

बहुत ही साहसी बोहरा महिलाओं ने इस बर्बर कृत्यके खिलाफ अपने समाज में अभियान चलाया । उन्होंने कहा कि इस कृत्य का कुरान शरीफ में कहीं कोई ज़िक्र नहीं है और बाकी मुस्लिम फिरकों में इसकी जानकारी तक नहीं है । इन महिलाओं ने देश के कई राज्यों के बोहरा महिलाओं और पुरुषों से बातचीत की और उनके साक्षात्कार इकठ्ठा किये । उनके अभियान के समर्थन में हज़ारों लोगों ने हस्ताक्षर किया । फिर उनकी तरफ से ‘एक महिला वकील” सुनीता तिवारी ने इस कृत्य को बंद करने की मांग मई के महीने में सर्वोच्च न्यायालय से की । सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी बात के औचित्य को स्वीकार किया और उस समय केंद्र सरकार के वकील ; एटार्नी जनरल श्री के के वेणुगोपाल ने सरकार की तरफ से कहा कि वह इस कृत्य का विरोध करते हैं क्योंकि वह बुनियादी अधिकारों के विरुद्ध है और अमरीका इंग्लैंड के अलावा 27 अफ्रीकी देशों में वर्जित है ।

न्याय के लिए लड़ रही बोहरा महिलाओं को लगा कि उनकी जीत बहुत जल्द होगी । लेकिन इस बीच मोदीजी का भव्य सत्कार बोहरा समुदाय की ओर से हुआ । उनकी बहुत आवभगत हुई और जब सितम्बर के आखरी सप्ताह में सर्वोच्च न्यायालय में दुबारा सुनवाई हुई वेणुगोपालन पलट गए । उन्होंने बोहरा समुदाय के धार्मिक नेताओं का समर्थन करते हुए मांग की कि फैसले की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय की 5 न्यायमूर्ति की पीठ द्वारा की जाए । मामला टल गया है ।

बोहरा महिलाओं के साथ तमाम समानता प्रेमियों को ज़बरदस्त ठेस पहुंची । उनको अपनी निरीहता का एहसास हुआ । संविधान उनके पक्ष में नैतिकता उनके साथ न्यायपालिका की हमदर्दी भी उन्हें प्राप्त है । लेकिन सरकार चलाने वालों को एक समुदाय से समर्थन पाने की गुंजाईश दिखाई दी और उनकी नीयत पलट गयी । महिलाएं मायूस रह गयीं ।

इसके विपरीतए हाल ही में केरला की वाम मोर्चा सरकार ने शबरीमलाय ;शबरी की पहाड़ी की यात्रा में महिलाओं की भागीदारी के पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय के सामने अपना पक्ष रखा और न्यायालय ने इसे उचित भी ठहराया ।

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला केवल समानता के दृष्टिकोण से ही महत्वपूर्ण नहीं था । फैसले के पहले भी 10 वर्ष से कम और 50 वर्ष से अधिक उम्र की औरतों या लड़कियों के यात्रा में शामिल होने पर आपत्ति नहीं की जाती थी हालांकि मान्यता तो यह थी की शबरीमलाय की गुफा में विराजमान अय्यप्पा कट्टर ब्रह्मचारी हैं और महिलाओं को अपने करीब देखने से परहेज़ करते हैं, तो फिर १० साल से कम और ५० साल से अधिक उम्र की महिलाओं और बच्चियों से परहेज़ क्यों नहीं ?

सदियों से माहवारी के दौरान महिलाओं को अशुभ और अशुद्ध माना जाता है । उस अवस्था में उन्हें घर के बाहर कोठरी में सोने के लिए मजबूर किया जाता था । मंदिरों में पूजा में और किसी धार्मिक या शुभ आयोजन में उन्हें भाग लेने से रोका जाता था । 10 और 50 साल की महिलाओं को शबरीमलाय की यात्रा के दौरान अशुद्ध हो जाने की सम्भावना के कारण ही रोका जाता था ।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने केवल महिलाओं की बराबरी के अधिकार को सुनिश्चित ही नहीं किया उनके विशेष दिनों में अपवित्र होने की मान्यता पर भी ज़बरदस्त प्रहार किया । ऐसा करके उन्होंने महिलाओं की नाबराबरी के पक्ष में दी जाने वाली एक दलील ”कि वह हर महीने अशुद्ध और अशुभ हो जाती हैं” को निराधार साबित कर दिया । इस फैसले का असर एक तीर्थ यात्रा तक सीमित ने रहकर तमाम घरेलू और सार्वजनिक क्षेत्रों में देखने को मिलेगा । तमाम महिलाओं को एक ऐसी शर्मिंदगी के एहसास से यह फैसला मुक्त करेगा जो उन्हें कभी होनी ही नहीं चाहिए थी और जिसने उनके अन्दर अशुभ और अशुद्ध होने की भावना पैदा करके असमानता को स्वीकार करने की ज़मीन तैयार की है ।

जब महिलाएं यात्रा में शामिल होकर पहाड़ी पर चढ़ेंगी तो यह जग ज़ाहिर हो जाएगा कि गुफा में अय्यप्पा विराजते हैं लेकिन पहाड़ी तो शबरी की है !!

सुभाषणी सहगल अली ,माकपा पोलिट ब्यूरो की सदस्य 

 

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