गांधी 150 : तो फिर गांधी कहाँ हैं ?  नथमल शर्मा ,ईवनिंग टाईम्स ।

अक्टूंबर 2,2018 . बिलासपुर 

इवनिंग टाइम्स में प्रकाशितआज शाम की बात

 

150 बरस । आज से साल भर “एक सौ पचास” की धूम रहेगी । पूरे देश में तरह – तरह के आयोजन होंगे । शायद दुनिया में भी । गांधी अब आयोजनों के लिए ही रह गए हैं । पढ़ने और उनके विचारों पर अमल की बात तो बहुत दूर की बात है । न ही किसी को वैष्णव जन… याद है और न ही कोई उसकी बात करता । गांधी की तरह कोई जीना भी नही चाहता , जी भी नही सकता । जरूरत इसी की है । पर गांधी की महानता पर हर कोई बढ़-चढ़ कर बोलने के लिए तैयार है। जिस देश के लिए, भाईचारे और सद्भाव के लिए जान दे दी गांधी ने सबसे ज्यादा खतरे में तो वही है । हां, गांधी ने हज़ारों पेज लिखे जिन्हें पढ़ने की किसी को फुरसत नहीं , जरूरत ही नहीं । गांधी का सिर्फ एक कागज़ सबसे ताकतवर है और वह है रुपया । गांधी की तस्वीर वाला यह छोटा सा रंग-बिरंगा कागज़ सब पर भारी है । इसीलिए सरकारी दफ्तरों के बाहर गांधी बैठे हैं । मजाल है कि बिना गांधी के कोई फ़ाइल सरक जाए । 

        बात कहीं और जाने लगी । गांधी के साथ ऐसा ही होता है । महात्मा हो चुके गांधी को हर कोई अपनी तरह से इस्तेमाल कर रहा है । उनसे सहमत और असहमत सारे लोग आज गांधी के आयोजन कर रहे हैं । दरअसल यह महात्मा गांधी यानी मोहनदास करमचंद गांधी की एक सौ पचासवीं जयंती है । 2 अक्तूबर 1869 को पोरबंदर में जन्मे । बैरिस्टर बने । बेरोजगारी से भी जूझे । फिर एक अदालती मामला लड़ने दक्षिण अफ्रीका चले गए । बरसों रहे वहां । गुलामी की तकलीफ देखी । विद्रोही भी हुए । लौटते तक काफी कुछ बदल गए थे गांधी । बाल गंगाधर तिलक मिले यहां। लगा कि देश के लिए काम करने से पहले देश को जान तो लूं । निकल पड़े । रेल के तीसरे दर्जे में बैठकर । देश भर में घूमे । लोगों से मिले और गुलामी, गरीबी की भयावहता को समझे , और लगा कि सबसे बड़ी तकलीफ गुलामी ही है । आज़ादी के लिए आंदोलन जारी था । गांधी के जुड़ने और फिर नेतृत्व करने से इसे धार मिली । युवा, महिलाएं, मज़दूर, किसान सब जुड़ते गए । संचार साधनों की कमी के बावजूद गांधी की बात देश भर में पहुंच जाती । उसी समय भगतसिंह और उनके साथी भी आंदोलन कर रहे थे । गांधी को वह रास्ता भटकाव का लगा और कहा कि अहिंसा के रास्ते पर चलकर ही आज़ादी हासिल की जा सकती है । ये बात अलग है कि 1942 में गांधी “करो या मरो ” कहते हैं और उस रास्ते पर चल ही पड़ते हैं । देश आजाद होता है । इस आंदोलन में हजारों लोगों ने आहुति दी । जेल गए, जान दी । सबके नाम नही लिखे गए । अनाम रह गए वे सब और “साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल…” गाते हुए हम आज़ादी के जश्न में खो गए । हालांकि उस समय गांधी नोआखली(पश्चिम बंगाल) में दंगे रोकने की कोशिश कर रहे थे । यह सब कोई छिपी बात नहीं है , पर कोई इतनी बात भी नही करता अब । 

         सत्य,अहिंसा,सादगी यही तो सिखा रहे थे गांधी । न केवल सिखा रहे थे बल्कि उस पर अमल भी कर रहे थे । वर्धा या अहमदाबाद के आश्रमो में जाकर देखिए कैसे रहते थे गांधी । जाते हैं लोग । चरखे के साथ फोटो खिंचवाकर फेसबुक पर पोस्ट कर गर्वित होते हैं । बापू कुटीर के सामने सेल्फी लेते हैं । लौटकर बताते हैं । मॉल के किसी फ़ूड जोन में बैठकर गांधी की सादगी के किस्से सुनाते हैं । सत्य की बात तो अब क़िस्सों में भी नहीं । अहिंसा जैसे शब्द ईमानदारी की तरह गायब हो रहे । गांधी के नाम पर हर शहर में चौक , सड़कें, मोहल्ले, कालोनी सब हैं । हम गांधी को मानते हैं । तभी तो ऐसा है । मेरे शहर में गांधी प्रतिमा के ठीक सामने शराब बिकती रही बरसों । वहीं से रैलियां निकलती या खत्म होती और वहीं थकान भी दूर होती । गांधी का कोई अनुसरण नहीं करता । खुद गांधी ने ही ही कहा था कि मैं ही अपना पहला और आखिरी अनुयाई हूँ । 

           गांधी के नाम पर खादी पहनने का चलन शुरू हुआ। खादी भंडार खुले । सस्ते कपड़े की बात कही गई । आज वह खादी राजनेताओं का ड्रेस कोड हो गई। उसमें भी ब्रांडेड । एक ब्रांड तो खादी के कुर्तों के लिए प्रसिद्ध । जहां सबसे महंगे खादी के कुर्ते और नेहरू(अब मोदी) जैकेट मिलते हैं । गरीब आदमी तो खादी पहन ही नही सकता । गरीब आदमी तो गांधी का नाम भी नहीं ले सकता । वह तो नेताओं और विद्वानों के लिए है । मज़बूरी का नाम महात्मा गांधी भी अब पुरानी बात हो गई । गांधी को महान

बता- बता कर जीवन से, व्यवहार से दूर कर दिया गया है । स्टार होटलों या भव्य भवनों में गांधी पर सेमिनार होते हैं । एनजीओ के लिए भी गांधी माकूल है । गांधी की हजारों  प्रतिमाएं होने के बावजूद वे अमूर्त ही हैं । “वे इतने सरल हैं कि उन्हें समझना उतना ही कठिन है  । ” इसीलिए कोई समझना नही चाहता । अमर रहे या जय बोलकर गांधी की महानता के साथ खुद को जोड़ लेता है हर कोई । गांधी की कुछ या बहुत सारी बातों से असहमत हुआ जा सकता है लेकिन सत्य,अहिंसा और सादगी से कैसे इनकार करेंगे ? आज यही गायब है । जबकि सबसे ज्यादा जरूरत इसी की है । गांधी की बात करना और गांधी की बात पर अमल करना दोनों में बहुत अंतर है । बात तो हर कोई करते दिख जाएगा पर अमल करने वालों को ढूंढना पड़ेगा । आज से शुरू हो रहे  इस एक सौ पचासवीं वर्षगांठ के जश्न में मेरे पत्रकार साथी  साल भर में ऐसे एक सौ पचास लोगों को ढूंढ पाएंगे क्या ?

       कुछ बरस पहले तक इस देश के आम आदमी के लिए गांधी का नाम एक सहारा था । रोशनी देने वाला लगता था । फिर देश और समाज गांधी से दूर होते गया (गांधी तो वहीं रहे और पुकारते भी रहे) । गांधी ने जिन्हें धन पिशाच कहा वे आ गए पूरी ताकत के साथ और गांधी मार्गों पर ही बन गई चमचमाती इमारतें। भव्य मॉल । सत्य को बहुत नीचे दबाकर ये पिशाच अब कारपोरेट कल्चर के रूप में आए । इस भव्यता में गांधी कुटीर का कोई काम नहीं । अब यहां भी 2 अक्टूबर मनाया जाता है (सेलिब्रेट होता है) । इन इमारतों में गरीब आदमी भी जा रहा है और खुद को गांधी से दूर करते हुए लुट रहा है , पर इस लूट को फिलहाल तो समझ नहीं पा रहा है । मध्यम वर्ग तो सुविधाओं का अभ्यस्त होता ही है ,उसके लिए गांधी एक महान नाम भर ही तो है । तो फिर गांधी कहाँ है ? इस देश की राजनीति, शिक्षा, सामाजिक जीवन,खेती-बाड़ी, पारिवारिक जीवन – कहाँ फिट करेंगे गांधी को ? किसे फुरसत है इन सवालों से जूझने की ? ईमानदारी से सवाल पूछें तो  हो सकता है 150 बरस का जश्न खत्म होते तक कोई जवाब मिल जाये ।हां, ईमानदारी से सवाल पूछें तो ? दरअसल गांधी के गुणगान की जरूरत नहीं। गांधी की तलाश बाहर नहीं खुद के भीतर करने की जरूरत है और खुद के भीतर झांकने के लिए ईमानदारी और नैतिक साहस चाहिए। 

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