भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किए गए सभी सामाजिक कार्यकत्ताओं, वकीलों, पत्रकारों, लेखकों को बिना शर्त रिहा किया जाए: यौन हिंसा और राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएं (डब्लूएसएस).

प्रेस विज्ञप्ति 

1.10.2018


डब्लूएसएस (यौन हिंसा और राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएं) के साथी रोमिला थापर, देविका जैन, सतीश देशपांडे, प्रभात पटनायक और माया दारूवाला द्वारा उच्चतम न्यायालय में दायर जनहित याचिका को उच्चतम न्यायालय की खण्डपीठ के बहुमत के फैसले द्वारा खारिज किए जाने की कड़ी निंदा करते है। इस फैसले से पुणे पुलिस को खुली छूट मिल गई है, वे भीमा कोरेगांव (एफआईआर नम्बर 4/2018) मामले में मनगढंत और बदनीयती से भरी जांच की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते रहेंगे और उन्हें टोकने वाला कोई नहीं। अदालत ने अस्पष्ट और आधारहीन फैसला सुनाते हुए यह साफ कर दिया है कि नफरत और बहुमत की राजनीति से असहमति रखने वाले सामाजिक कार्यकत्ताओं के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और पुणे पुलिस द्वारा की गई गैरकानूनी गिरफ्तारियों पर लगाम लगाने में वह पूरी तरह नाकाम रही है। कोर्ट ने इस मामले में निष्पक्ष न्याय करने की अपनी जिम्मेदारी से और संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 में दिए गए मौलिक अधिकारों की रक्षा करने की जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लिया है।

इस अदूरदर्शी फैसले में यह कहा गया है कि पुणे पुलिस द्वारा की जा रही जांच किसी भी दुर्भावना से ग्रसित नहीं है। साथ ही, उच्चतम न्यायालय ने मामले में हो रही जांच में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया है और मामले में एसआइटी द्वारा जांच कराए जाने की मांग को भी खारिज कर दिया। और तो और, फैसले में यह भी कहा गया है कि सुधा भारद्वाज, वरनॉन गोंजालविज़, अरुण फरेरा, गौतम नवलखा और वरवरा राव की गिरफ्तारियां विरोध या असहमति को कुचले के लिए नहीं की गई थीं, बल्कि ये गिरफ्तारियां इस मकसद से की गई थीं ताकि प्रतिबंधित संगठन से इन सभी लोगों का संबंध स्थापित करने को लेकर जांच की जा सके।

वहीं न्यायाधीश डीवाय चंद्रचूड द्वारा दिए गए तर्कपूर्ण अल्पमत फैसले में यह कहा गया है कि, महाराष्ट्र पुलिस द्वारा जो साक्ष्य पेश किए गए थे उनके आधार पर पांचों आरोपियों का प्रतिबंधित संगठन से संबंध होने का आरोप लगाना तर्कहीन है। इसके अलावा, उन्होंने महाराष्ट्र पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए लोगों की छवि को खराब करने के लिए टीवी मीडिया के इस्तेमाल को गंभीरता से लिया। फैसले में कहा गया है कि पुणे पुलिस द्वारा प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करना और मीडिया में ख़त (जिसका सत्यापन अभी तक नहीं किया गया है) लीक करना, काफी चिंताजनक और गंभीर मसला है। इसके साथ फैसले में यह भी कहा गया है कि पुलिस के रवैये से जांच की प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं और जांच की प्रक्रिया के दौरान पुणे पुलिस पर पक्षपात करने का मामला बनता है। इसके अलावा, चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में रिपब्लिक टीवी द्वारा सुधा भारद्वाज (जो गिरफ्तार किए गए पांच लोगो में से एक हैं और डब्लूएसएस की सदस्य हैं) के खिलाफ जहर उगलने की मुहिम की निंदा की।

आगे जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा कि पुलिस की भूमिका न तो पंच की है, न ही वह मामले में अपराध घोषित करने की क्षमता रखती है। इसके बावजूद पुणे पुलिस ने मामले में मीडिया ट्रायल करने में मदद की और उसमें हिस्सेदारी भी ली। उन्होंने लीक किए गए ख़तों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए और अंतत: कहा कि पुणे पुलिस के पक्षपात भरे रवैये को देखते हुए, मामले में निष्पक्ष जांच का होना बेहद जरूरी है। विरोध और असहमति किसी भी जागृत लोकतंत्र का अहम हिस्सा होता है, चाहे विरोध या असहमति सत्ता को कितनी भी नापसंद हो। आपराधिक कानून को संविधान के प्रति जवाबदेह होना पड़ता है और न्यायालय को अनुच्छेद 32 के अंर्तगत जो संवैधानिक जिम्मेदारी सौंपी गई है, उसे निभाना बेहद जरुरी हो जाता है ताकि अटकलों के बाजार में स्वतंत्रता सूली पर न चढ़ जाए।

हमने पिछले कुछ हफ्तों में यह देखा कि उच्चतम न्यायालय ने कई ऐसे फैसले दिए जिसमें नागरिक अधिकार और स्वतंत्रता के सिद्धांतों ने नई ऊंचाइयां छुईं, इसे संविधान और लोकतांत्रिक ढांचे की आत्मा होने का दर्जा मिला। इस दौरान ऐसे फैसलों के नतीजतन नागरिक अधिकारों और स्वतंत्रताओं का दायरा काफी बढ़ गया है। जहां उच्चतम न्यायालय के तर्कों ने नागरिक अधिकारों को काफी ताकत दी है, वहीं राजनैतिक महत्व वाले मामलों में उच्चतम न्यायालय ने कठोर और दकियानूसी रवैया बनाए रखा है। नागरिक अधिकारों और स्वतंत्रता से संबंधित फैसले और सिद्धांत धरे के धरे रह जाएंगे अगर उनका उपयोग अदालतें व्यक्ति विशेष की स्वतंत्रता को बचाने में नहीं कर पाती हैं।

डब्लूएसएस असहमति पर वार और विरोध को कुचलने की साजिश के खिलाफ अपना विरोध जाहिर करता है। लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकत्ताओं, वकीलों, पत्रकारों और लेखकों पर हो रहे हमले जहरीली साजिश की बयार के झोंके हैं। इसमें उन लोगों को निशाना बनाया गया है जो जून में गिरफ्तार किए गए लोगों को बचाव में लगे थे। भीमा कोरेगांव मामले में पहले दौर में डब्लूएसएस की सदस्य शोमा सेन, वकील सुरेन्द्र गाडलिंग, सामाजिक कार्यकत्ता सुधीर धावले, रोना विलसन और महेश राउत को निशाना बनाया गया और उनकी गिरफ्तारियां की गईं। सुरेन्द्र गाडलिंग प्रो. जीएन साईं बाबा, महेश तिर्की, विजय तिर्की, पांडू नारोटे, हेम मिश्रा और प्रशान्त राही के वकील थे। भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार बाकी लोग इन सभी की गिरफ्तारियों के विरोध में मजबूती से खड़े थे। प्रोफेसर शोमा सेन नागपुर विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग की प्रमुख थीं, वे नारीवादी सिद्धांतों और जातिवाद के उन्मूलन पर काम करने वाली जूझारू सामाजिक कार्यकर्त्‍ता हैं। साठ साल की उम्र में जब उन्हें रिटायरमेंट मिलने ही वाली थी, तब पुलिस उन्हे गिरफ्तार कर ले गई।

महेश राउत को सिर्फ और सिर्फ इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वे गढ़चिरौली में राज्य द्वारा विस्थापन के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं और आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करने वाले संवैधानिक प्रावधानों को लागू करने की बात करते रहे हैं। सुधा भारद्वाज पर जो हमला किया जा रहा है वह स्पष्ट तौर पर उनके जमीनी स्तर पर काम को लेकर किया जा रहा है। वे पिछले तीन दशकों से छत्तीसगढ़ में वकील और ट्रेड यूनियन की नेता के तौर पर आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन के अधिकार और श्रमिक अधिकारों की सुरक्षा करने वाले संवैधानिक प्रावधानों को लागू करने के लिए काम करती रही हैं। वे जनहित नाम के संगठन (जो कानूनी सहायता देता है) के सदस्य के तौर पर गैर कानूनी भूमि अधिग्रहण, वन अधिकार कानून और पेसा कानून के उल्लंघन, पर्यावरण से संबंधित मुद्दों, बलपूर्वक विस्थापन और मानवाधिकार हनन जैसे मामले उठाती रही हैं। इसके अलावा, श्रमिकों के लिए वे कोर्ट में न जाने कितने केस लड़ती रही हैं। सुधा भीमा कोरेगांव मामले में जून में गिरफ्तार हुए पांच लोगों की गिरफ्तारियों के खिलाफ पीयूसीएल और इंडियन असोसियन आफ पीपल्स लॉयर्स (आईएपीएल) जैसे प्रतिष्ठित संगठनों के जरिये बोलती रही हैं। पहले वकील सुरेन्द्र गाडलिंग को गिरफ्तार किया जाता है जो दलित, आदिवासी, मुस्लिम और बहुजन समाज के गरीब-गुरबा मुवक्किलों के लिए उनके पक्ष से केस लड़ते थे। उसके बाद सुधा भारद्वाज और अरुण फरेरा जिन्होंने उनकी गिरफ्तारी का विरोध किया, उन्हें भी नहीं बख्शा गया।

यह घटनाक्रम इस बात की गवाही देता है कि इन सभी के खिलाफ सरकार निशाना साध रही है। पहले भी सामाजिक कार्यकत्ताओं पर असहमति जताने या सत्ता से भिन्न मत रखने के लिए हमले होते रहे हैं पर इस बार वकीलों पर हो रहे हमलों से यह बात साफ तौर पर पता चलती है कि अब न्याय व्यवस्था के अंर्तगत भी हकों की लड़ाई लड़ने के खिलाफ एक तयशुदा तरीके से दमन किया जा रहा है। इसका उन सामाजिक कार्यकत्ताओं पर बुरा असर पड़ता है जो हाशिये पर रह रहे लोगों के साथ खड़े रहते हैं। इससे हाशिये पर रह रहे समाज को यह संदेश साफ-साफ जाता है कि आज के दौर में उनके संवैधानिक अधिकारों के लिए लड़ना, उनके अधिकारों को जमीनी स्तर पर लागू करने की उम्मीद करना अपने-आप में एक गुनाह है।

इस बीच, जिन लोगों ने भीमा कोरेगांव में दलित, बहुजन और मुसलमानों पर हमले किए वे आज भी खुलेआम घूम-फिर रहे हैं। भीमा कोरेगांव मामले में पहली एफआइआर पुणे (देहात) पुलिस ने मिलिंद एकबोटे और सम्भाजी भिड़े के खिलाफ हिंसा के लिए लोगों को उकसाने के लिए दर्ज की थी। इन सब के बाद अम्बेडकर के नक्शे कदम पर चलने वाले लोगों के खिलाफ पुणे पुलिस द्वारा दूसरी एफआइआर दर्ज करना अपने-आप में किसी रहस्य से कम नहीं है, क्योंकि अभी तक यह साफ नहीं कि संवैधानिक अधिकारों और सिद्धांतों जैसे कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए लड़ने वाले लोग जो मिलिंद एकबोटे और सम्भाजी भिड़े की गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे और जिनका भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा से कोई लेना-देना नहीं है उनकों क्यों गिरफ्तार किया गया। इस पूरे घटनाक्रम का एक ही तार्किक मतलब निकलता है, वह ये कि वे लोग जो आम लोगों के खिलाफ बनाए जाने वाली नीतियों के खिलाफ बोलते हैं, उन्हे इतना डरा दिया जाए कि उनके मुंह पर ताले जड़ दिए जाएं।

यूएपीए जैसे कानून की एक आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानूनन कोई जगह नहीं है और समय आ गया है कि संवैधानिक अदालतें नागरिकों के अधिकारों पर गहरा आघत करने वाले इस क्रूर कानून को असंवैधानिक घोषित कर दें। ऐसे मामले जिनमें यूएपीए लगाया जाता है उनमें जमानत की अर्जी मंजूर होना बहुत ही मुश्किल होता है और हिरासत में जितना वक्त बीत जाता है। फिर इसमें सजा से कुछ कम नहीं होता। यह सब लोगों को डराने-धमकाने और लोगों को बदनाम करने की साजिशों के अलावा और कुछ भी नहीं है। चाहे अदालतों में जो भी हो, अदालते जो भी करें, जो भी कहें, संघर्ष जारी है और जारी रहेगा। लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए राजनीतिक संघर्ष जारी रहेगा। यूएपीए के खिलाफ संघर्ष जारी रहेगा। बडे उद्योगपतियों का आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन हड़पने की साजिश, खनिजों का दोहन कर उनकी जेबें भरने के प्लान के खिलाफ संघर्ष जारी रहेगा।

हमारी मांग है कि भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किए गए सभी सामाजिक कार्यकत्ताओं, वकीलों, पत्रकारों, लेखकों को बिना शर्त रिहा किया जाए। भीमा कोरेगांव में असल में हिंसा भडकाने वालों पर कार्यवाही की जाए। यूएपीए जैसे भयंकर कानून को खत्म किया जाए।

यौन हिंसा और राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएं (डब्लूएसएस)

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