न्यायपालिका की जवाबदेही और स्वतंत्रता विषय पर कन्स्टीट्यूशन क्लब, नई दिल्ली में राष्ट्रीय सेमिनार : हमारा संविधान  सबको सामाजिक, आर्थिक, संप्रभुता ,धर्मनिरपेक्षता सामाजवाद , जनतांत्रिक गणतंत्र, की गारंटी देता है,  इनको नही बदला जा सकता है. एक बहुधार्मिक देश में धर्मनिरपेक्षता बहुत बहुत जरूरी है.

1.10.2018 ‘| नई दिल्ली 
मुनेश त्यागी ऐडवोकेट

न्यायपालिका की जवाबदेही और स्वतंत्रता विषय पर कन्स्टीट्यूशन क्लब, नई दिल्ली में हुए राष्ट्रीय सेमिनार में भाग लेते हुए मेरठ के अधिवक्तागण ,जिनमें तौसीफ अली खान, अब्दुल जब्बार खान, ब्रजवीर सिंह, प्रभात मलिक, राजकुमार गुर्जर, जी पी सलौनिया, करणसिंह सैनी ,प्रवीण भारती ,आसिफ अली अंसारी और मुनेश त्यागी ने भाग लिया.

सेमिनार में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए जस्टिस गोपाल गोवडा ने कहा कि हमारा संविधान एक राजनीतिक किताब है जो सबको सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय दिलाने का भरोसा दिलाती है. सम्प्रभुता, धर्मनिरपेक्षता, सामाजवाद , जनतांत्रिक गणतंत्र, हमारे संविधान के मूलभूत सिध्दांत हैं. इनको नही बदला जा सकता है. एक बहुधार्मिक देश में धर्मनिरपेक्षता बहुत बहुत जरूरी है.


उन्होंने कहा कि आज न्यायपालिका की निष्पक्षता, स्वतंत्रता और जवाबदेही पर हमला हो रहा है. आज सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय पर हमला हो रहा है. अतः हमें ऐसे सेमिनारों की जरूरत है. डां भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि न्यायपालिका, कार्यपालिका से आजाद होनी चाहिए. आज न्यायपालिका को किसी भी कीमत पर बचाने की जरूरत है. अगर हमारीन्यायपालिका आजाद नही होगी तो, आजादी, धर्मनिरपेक्षता, कानून के शासन और संवैधानिक संस्थानों पर और गणतांत्रिक व्यवस्था पर और जोरदार तरीके से हमले होंगे.


आज न्यायपालिका की जिम्मेदारी है कि वह कानून के शासन और संवैधानिक मर्यादाओं और मूल्यों की जमकर हिफाजत करे, औरतों के अधिकारों की रक्षा करे और उनका दायरा बढाये. यह बहुत ही सुखद अहसास हो रहा है कि इस सेमिनार को महिला और पुरूष अधिवक्तागण मिलजुलकर कर रहे हैं. न्यायपालिका एक संवैधानिक संस्था है.

उन्होंने कहा कि योग्य व्यक्तियों को ही जज बनाया जाना चाहिए, उनकी संवैधानिक सुरक्षा होनी चाहिए. उन्होंने जोर देकर कहा था अधिवक्तागण संविधानवाद के संरक्षक हैं. अधिवक्ताओं ने आजादी के संग्राम में बढचढकर हिस्सा लिया था. आज न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बचाने के लिए अधिवक्तागण में उसी जज्बे को कायम रखने की जरूरत है.

उंहोंने कहा कि आज हमारा गणतंत्र और जनतंत्र खतरे में है. न्यायपालिका की निष्पक्षता और स्वतंत्रता की हर हालत में सुरक्षा की जानी चाहिए. हर जज जवाबदेह है, वह संवैधानिक मर्यादा और मूल्यों के बाहर नही जा सकता है. उसको हर हाल में संविधानवाद, सम्प्रभुता, धर्मनिरपेक्षता,समाजवाद ,जनतांत्रिक और गणतांत्रिक मूल्यों की हिफाजत करनी होगी.

इस सेमिनार में कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी की पोलित ब्यूरो की सदस्य वृंदा करात ने कहा कि यह एक जरूरी मुद्दा है. आज जनता की आजादियों पर हमलों का काल चल रहा है. शासक पार्टी न्यायपालिका की मूलभूत संरचना को पसंद नही कर रही है, वह धर्मनिरपेक्षता के सिध्दांतों के खात्मे को आमादा है. यह खतरा भी उत्पन्न हो गया है कि भारत भी बचेगा या नही. संसद समेत सभी संवैधानिक संस्थाओं पर हमले हो रहे हैं.

उन्होंने सवाल किया कि न्यायपालिका को किससे खतरा पैदा हो गया है, न्यायपालिका की आजादी किससे और न्यायपालिका किसके प्रति जवाबदेह हो, इसे मुख्य रूप से जानने की जरूरत है. इसे संविधान और जनता के प्रति जवाबदेह होने की जरुरत है.

उंहोंने कहा का न्यायपालिका में हर स्तर पर बेईमानी और भ्रष्टाचार की भरमार है. कहीं भी रियायत नही है. जजों को नियुक्त करने की संस्था कोलिजीयम अपारदर्शी और धुंधली संस्था बनकर रह गयी है. इसे दुरूस्त किये जाने की सबसे ज्यादा जरूरत है.

अध्यक्षता करते हुए पी वी सुरेंद्रनाथ ने सवाल किया कि जनतंत्र क्या है. हमारी न्यायपालिका इसका अहम हिस्सा है. कोलिजीयम संस्था फेल हो गयी है. आज राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की स्थापना की सबसे ज्यादा जरूरत है इसके बिना हमारी न्यायपालिका स्वतंत्र और जवाबदेह नही हो सकती.

इस मौके पर सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने अपना सम्बोधन लाल सलाम के साथ शुरू किया और कहा कि हमारी न्यायपालिका में क्रांतिकारी बदलावों की जरूरत है. क्या हम नियुक्त किये जाने वाले जज के बारे में छानबीन कर सकते हैं? हमारे यहाँ ऐसा बिल्कुल भी नही है. नियुक्त किये जाने वाले जज के बारे में हमें सब कुछ जानने, पूछने और जांच करने की आजादी होनी चाहिए.

किसे नियुक्त किया जा रहा है ,उसके बारे में जनता जान पूछ ही नही सकती है, सवाल भी नही कर सकती है. भ्रष्ट तरीके से चुनी गई न्यायपालिका जनता के साथ इंसाफ नही कर सकती है. जज का दर्षन क्या है ,उसकी नैतिकता क्या है ,हमें इनका पता करने का अधिकार मिलना चाहिए. जज के चुनाव में न्याय पाने वाली जनता का हाथ होना चाहिए. जज की क्या जवाबदेही हो इसके लिए भी सुव्यवस्था होनी जरूरी है.

सीनियर अधिवक्ता चन्द्र उदय सिंह ने कहा कि हमारे कोलिजीयम पर भांति भांति के दबाव होते हैं, वह स्वतंत्र नही है. सुनवाई के लिए सैंकडों केस प्रतिदिन लगाये जाते हैं इससे सही इंसाफ नही मिल पाता है. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता व जवाबदेही होना लाज़मी है.

राष्ट्रीय सेमिनार की अध्यक्षता पी वी सुरेंद्रनाथ और संचालन ऐआईएलयू के राष्ट्रीय महामंत्री सोमदत्त शर्मा ने की. सेमिनार हाल खचाखच भरा हुआ था जिसमें सैंकडों अधिवक्ताओं को खडे होकर ही सेमिनार को सुनना पडा.

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