विकास का छत्तीसगढ़ मॉडल क्या है . 10 पैसे में काम 100 रूपए का प्रचार. :देवेश तिवारी .

1.10.2018

विकास का छत्तीसगढ़ मॉडल वही मॉडल है जो गुजरात का है। 10 पैसे में काम 100 रूपए का प्रचार। ऐसा इसलिए कि, आप प्रचार माध्यमों के बारे में जरा गौर किजीए और अपने आसपास के बदलाव को महसूस किजिए। छत्तीसगढ़ में चलिए आपको सन 2000 में लिए चलते हैं नया राज्य बना संसाधन सीमित थे, केवल छत्तीसगढ़ में नहीं देश के बहुतायत राज्यों के पास संसाधन सिमित थे, 2000 से 2018 आते आते हम अपनी बात करें तो 90 हजार करोड़ के बजट के करीब छत्तीसगढ़ पहुंच गया, इसमें भी यह केवल एक आदमी का कमाल था ऐसा नहीं है केंद्रीय स्तर पर बनने वाली नीतियां जो तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह की अर्थव्यवस्था को लेकर किए गए प्रयोग का नतीजा था, जो केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं देश के लगभग सभी राज्यों में हो रहा था, हां माइनिंग का वह लाभ प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिल रहा था जो पीएम मोदी के आने के बाद जिला खनिज निधी के सीधे मिलने से हुआ, यह राशि अलग ही अंदाज में गार्डन से लेकर सुख​ सुविधाओं के लिए , सेलेक्टिव ठेकेदारिज्म के जरिए कलेक्टर वारे न्यारे कर रहे हैं यह अलहदा विषय है।

चलिए सरकार के बड़े कामों की चर्चा करें तो बस्तर में सरकार ने एक जावंगा एजुकेशन सिटी बनाया, लाइवलीहुड कॉलेज और कोचिंग सेंटर बनाए, रायपुर राजनांदगांव में हॉकी स्टेडियम स्विमिंग पूल बनाया। नया रायपुर बनाया, सारे एजुकेशन सेंटर को लाकर वहीं 4 किलोमीटर के दायरे में पटक दिया। किसानों को 3 साल का बोनस दिया, उज्जवला गैस, सौर सुजला, कुछ कहने को किसानों के लिए बांध बाकि अनुबंध उद्योगपतियों से, संडास,तेंदूपत्ता बोनस जैसा कुछ कुछ तात्कालिक और सेंटर इंन्फ्रास्ट्रक्चर विकास जैसी सुविधाएं मिली। गरीबों को एक बेहतर प्रणाली के जरिए राशन मिला, जो चुनावी साल में गरीबों की संख्या बढ़ाकर आम चुनाव के बाद कम भी होता रहता है।

तो ये हैं सरकार के वे काम जो मंचों से रेडियो, टेलिविजन, वेबसाईट, अखबार, इवेंट आॅर्गनाईज करके, आपको बताया जाता रहा। सरकारी कार्यक्रमों के भाषण का मजनून 60 साल बनाम 15 साल ही है। यह भाषण उन 50 फिसदी मतदाताओं के सामने है जिन्होंने मौजूदा सरकार के अलावा किसी दूसरी सरकार को देखा ही नहीं।
अब विकास के पैमाने पर किसान कहां खड़ा है 2001 की जनगणना से 2011 की जनगणना में 12 लाख किसान कम हो गए, खेतीहर मजदूरों की संख्या बढ़ी। ये खेतिहर मजदूरों को राशन तो मिल रहा है मगर इनकी जिंदगी में बदलाव लाने के प्रयास कहां तक हुए यह अनुत्तरित सवाल है.

मजदूरों को टिफिन,सायकल, मशीन काफी कुछ मिल रहा है मगर मजदूरों के बच्चों के लिए हॉयर क्लास सस्ता एजुकेशन कहां है, जहां से बदलाव की शुरूआत हो, प्रयास के सिमित कोचिंग सेंटर में संख्या सिमित है, जिन सरकारी स्कूलों में उनके बच्चे पढ़ते हैं उनकी हॉलत कैसी है यह असर की रिपोर्ट बयां करती है।

प्रदेश के 51 इंजिनियरिंग कॉलेजों में से 80 फिसदी बंद हो गए, बीएड कॉलेजों की बाढ़ आ गई, अब जो पढ़कर निकले उनके लिए रोजगार कहां है। मतलब कहां जाएंगे प्रदेश के रजिस्टर्ड साढ़े 19 लाख बेरोजगार।
प्रदेश में तमाम व्यवस्था के बाद भी शिक्षण संस्थान ठेके के शिक्षक, डेलीविजेस के प्रोफेसर्स पर चल रहे हैं, कॉलेजों की संख्या में ईजाफा तो हुआ है मगर उनके भीतर की शिक्षा में कितना ईजाफा हुआ। यह भी बताया जाना चाहिए, कि उन कॉलेजों में रोजगारपरक शिक्षा व्यवस्था कितनी है।

प्रदेश में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत ए​तिहासिक काम हुआ है जो पहले की सरकारों की तुलना में सर्वश्रेष्ठ माना जा सकता है।

रोजगार के लिए 2013 में सीएम ने कहा कि, एग्रीकल्चर बेस्ड इंडस्ट्री आएंगे इससे रोजगार के अवसर खुलेंगे। कोर सेक्टर पर सरकार आगे काम नहीं करेगी, कोर सेक्टर तो अपनी जगह स्थायी रहे मगर फूड बेस्ड इंडस्ट्री का सपना हवा हवाई रहा।

प्रदेश में एग्रीकल्चर का रकबा लगातार कम हो रहा है। उन्नत पत्द्धती के जरिए उत्पादन बढ़ रहा है, दिलचस्प है सभी चीजों का बढ़ रहा है यानी पहले जहां केवल धान था, वहां सब्जियां, फल, दलहन तिलहन उग रहे हैं, जमीनें कम हो रही है फिर भी सभी का उत्पदान चमत्कारिक ढंग से बढ़ रहा है। इसके आंकड़ों पर शंका होती है मगर बढ़ा है।

यानी प्रदेश में विकास उतना नजर आता है जितना दिखाने का कहें ब्रांडिंग का लेप लगाकर बेचने के लिए जरूरी है। हमारा छत्तीसगढ़ धूमकेतू बनकर विकासमान हो गया हो ऐसा भी नहीं है। सभी राज्यों की तरह सामान्य विकास के काम हुए हैं, मगर ब्रांडिंग में हमारा कोई जवाब नहीं है। एक जावंगा के बनने में जिनता खर्च हुआ है उससे ज्यादा खर्च इस बात पर हो चुका है कि हमने उसे बनाया है।
पर्यटन जो सबसे ज्यादा रोजगार देता है उस क्षेत्र में अब तक हमने केवल 10 फिसदी काम किया है 90 फिसदी काम की गुंजाईश अब तक बरकरार है।

स्मार्ट सिटी के नाम पर गार्डन,दिवारों की पुताई, और मूलभूत के पानी कचरा प्रबंधन जैसे काम जो पहले जेएनयूआरएम के तहत होते थे वही हो रहे हैं, हां ब्रांडिंग ऐसी की आपको अहसास होगा कुछ तो हो रहा है।
देश में विदेश से आने वाले निवेश के मामले में हम पिछे से पहले नंबर पर हैं, झारखण्ड और मप्र हमसे आगे हैं
पर्यटकों की संख्या में हम देश के कई राज्यों में सबसे निचले पायदान पर हैं.

रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने और नए उद्योग बसाने के मामले में हम आज भी फिसड्डी हैं
पलायन की समस्या कागजों में खत्म हो गई, हमारे यहां से जम्मूतवी एक्सप्रेस, सारनाथा नवंबर, दिसंबर में फुल बुकिंग है।

सबसे सरपल्स राज्य होने, हमारा कोयला, पानी उद्योग होने के बाद भी हम उत्पादक राज्य के अनुपात में महंगी बिजली खरीदते हैं
50 हजार तक सरकार की गारंटी, आयुष्मान केवल गरीबों के लिए, इसके उपर सरकारी अस्पताल ओव्हर लोड हैं,
चिकित्सा के मामले में प्रदेश के उत्तर से दक्षिण तक केवल रायपुर ही बड़ा केंद्र है।

हमारे यहां के विश्विद्यालयों की ग्रेडिंग अन्य राज्यों की तुलना में फिसड्डी है हमारे यहां​ रिसर्च पर पहले होने वाला खर्च 4 सालों में सबसे निचले स्तर पर है
खैराती योजनाएं बनाने के मामले में हम देश में पहले नंबर पर हैं  भ्रष्ट्राचार के आरोपों पर जांच नहीं कराने और विश्व में सबसे कम सजा तक पहुंचाने के मामले में हम पहले नंबर पर हैं देश में सबसे ज्यादा संविदा अधिकारी छत्तीसगढ़ में काम करते हैं, जिनके छोड़ने से युवाओं को अवसर मिलता देश में सबसे आंतरिक सुरक्षा नक्सलवाद से मौतें छत्तीसगढ़ में होती है।  जनसंख्या घनत्व के लिहाज से अफगानिस्तान से अधिक सैनिक बस्तर में तैनात हैं किसान आत्महत्या के मामले में हम देश के शिर्ष 5 राज्यों में शुमार हैं .छत्तीसगढ़ में और विकास होता जब 10 रूपए के विकास को बताने के लिए 100 रूपए खर्च नहीं होता, विकास महसूस करने की चीज है चीख चीखकर बताने से विकास महसूस नहीं होता इसका असर इतना होगा कि वोट मिल जाते हैं, मगर जिंदगी में बदलाव केवल उतने लोगों का ही होता है जितने विज्ञापन में उल्लेख किए जाते हैं।

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देवेश तिवारी 

पत्रकार 

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