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इस सप्ताह *लता मंगेशकर* ने अपना जन्मदिन मनाया है। *दस्तक* पर आज लता के जीवन के कुछ दिलचस्प किस्से। और आइये लता के गानों पर बात करें। पड़ताल करें जीवन में कब कैसे उनकी आवाज़ ने हमें सम्बल दिया और हमारी खुशियां भी बांट ली है

लता मंगेशकर का जन्‍मदिन पूरी दुनिया के लिए एक सुरीला दिन होता है। लता ने संघर्ष की मुश्किल राहों पर चलकर ये मुकाम हासिल किया है कि अब वो दुनिया की एक ज़रूरी आवाज़ बन गयी हैं, ऐसी आवाज़ जिसने हमें मुसीबत के दिनों में सहारा दिया और खुशी के दिनों में वो हमारी थिरकन की साथी बनी। आज मैं लता मंगेशकर के जीवन से जुड़े कुछ ऐसे किस्‍से लेकर आया हूं—जो उनकी शख्सियत और उनकी जद्दोजेहद की यात्रा को दर्शाते हैं।

एक ज़माने में लता जी को रेडियो सुनने का शौक़ था। वो संघर्ष के दिन थे। और अपनी किसी रिकॉर्डिंग की फ़ीस से लता जी ने एक ट्रांजिस्‍टर ख़रीदा था। आकाशवाणी मुंबई के शास्‍त्रीय संगीत के फ़रमाइशी कार्यक्रम में लता जी चिट्ठियां भी भेजा करती थीं। एक बार उन्‍होंने बताया था कि चूंकि आकाशवाणी का जन्‍म लता जी से पहले हुआ–इसलिए आकाशवाणी को वे अपनी बड़ी बहन मानती हैं। बहरहाल–उसी ट्रांजिस्‍टर पर जब लता ने प्रिय गायक कुंदनलाल सहगल के देहावसान का समाचार सुना तो वो रेडियो कभी नहीं सुना। लता, सहगल की इतनी दीवानी रही हैं कि बचपन में अपने पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर से कहा करती थीं कि मैं तो सहगल से ही शादी करूंगी। लता ने बाद में सहगल को श्रद्धांजलि देते हुए अपने अलबम में उनका गाना ‘सो जा राजकुमारी’ गाया था।

लता जी को फोटोग्राफ़ी का बड़ा शौक़ रहा है। अपने ज़माने के नामी कैमेरों से उन्‍होंने शूट किये हैं। मैंने जब नामी अभिनेत्री सुलोचना के घर जाकर उनका इंटरव्‍यू लिया तो अपनी एक तस्‍वीर की ओर इशारा करते हुए उन्‍होंने बताया कि ये तस्‍वीर लता ने खींची है। कोल्‍हापुर के दिनों में लता और सुलोचना पड़ोसी थीं और लता अकसर सायकिल चलाती हुई उनके घर आ जाती थीं।

एक और किस्‍सा। एक बार लता को मालाड में बॉम्‍बे टॉकीज़ रिकॉर्डिंग के लिए पहुंचना था। महालक्ष्‍मी स्‍टेशन पर एक नौजवान उनकी बोगी में चढ़ गया। घूरने लगा। लता जी घबराईं। गोरेगांव उतरीं तो वो भी उतर गया। लता जी बॉम्‍बे टॉकीज़ स्‍टूडियोज़ की तरफ बढ़ीं तो वो भी उनके पीछे-पीछे आया। अब लता जी को पूरा यकीन हो गया कि ये बदमाश मेरा पीछा कर रहा है। संगीतकार खेमचंद प्रकाश को बताया कि एक लड़का उनका पीछा कर रहा है। तब तक वो वहां पहुंच चुका था। खेमचंद प्रकाश उसे देखकर हंसे—‘अरे…ये तो दादा मुनि का छोटा भाई किशोर है। मैंने अभी अभी इससे गवाया है—‘मरने की दुआएं क्‍यों मांगूं’। आज ये तुम्‍हारे साथ गायेगा। ये गाना देव आनंद और कामिनी कौशल पर फिल्‍माया गया था—‘ये कौन आया करके सोलह सिंगार’। ‘जिद्दी’ फिल्‍म के इस गाने के ज़रिये गीतकार प्रेम धवन का भी करियर शुरू हुआ था।

सन 1947-48 में शशधर मुखर्जी दिलीप कुमार और कामिनी कौशल को लेकर ‘शहीद’ बना रहे थे। संगीतकार गुलाम हैदर उन्‍हें लेकर प्रोड्यूसर एस मुखर्जी के पास गए और उनसे कहा कि इस लड़की की आवाज़ में बहुत दम है। पर शशधर मुखर्जी ने कहा कि इसकी आवाज़ बहुत पतली है और कामिनी कौशल पर जंचेगी नहीं। यही राय दिलीप कुमार की भी थी। उन्‍हें लगा था कि लता के उच्‍चारण में मराठी की छाया है। गुलाम हैदर ने कहा कि देखना एक दिन ये लड़की नूरजहां से भी आगे निकल जायेगी। और सचमुच यही हुआ।

ज़रा सोचिए कि आगे चलकर लता के लगभग सभी कंसर्ट्स में दिलीप कुमार अपनी इस छोटी बहन का परिचय देते रहे। याद कीजिए लंदन में लता जी के पहले विदेशी कंसर्ट में दिलीप साहब की वो बात—‘जैसे फूल की खुशबू या महक का रंग नहीं होता वो महज़ खुश्‍बू होती है। ठंडी हवाओं का कोई मस्‍कन, घर आंगन , देश या वतन नहीं होता, जिस तरह किसी मासूम बच्‍चे की मुस्‍कुराहट का कोई मज़हब या भेद भाव नहीं होता, वैसे ही लता मंगेशकर की आवाज़ कुदरत की तख़लीक का एक करिश्‍मा है।‘

ये भी बता दें कि लता जी को परफ्यूम्‍स और क्रिकेट का भी बड़ा शौक़ है। कमाल की बात ये है कि लता अपने गाने नहीं सुनतीं। केवल एक अलबम सुनती हैं–‘चाला वाही देस’ जिसमें अपने भाई हृदयनाथ मंगेशकर के संगीत में उन्‍होंने मीरा बाई की रचनाएं गायी हैं।

बताइये लता की आवाज़ ने कब कैसे आपका साथ निभाया है। जन्मदिन शरद भाई का है। वो भी संगीतमय हैं। वो सबसे पहले बताएं। शुभकामनाएं।
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*० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले*