शंकर गुहा नियोगी शहादत दिवस .: नियोगी व बीएनसी मिल का ऐतिहासिक संघर्ष .: उत्तम कुमार ,संपादक दक्षिण कोसल

क्या बीएनसी मिल पर उनकी योजनाओं को पुरस्कृत किया गया था !!!

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1908 में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ लडऩे वाले बाल गंगाधर तिलक की गिरफ्तारी पर बीएनसी मिल के मजदूरों ने हड़ताल की थी। 1923 में चर्चित ठॉ. प्यारेलाल सिंह के नेतृत्व में 6 माह तक यहां लंबी हड़ताल चली। मजदूरों ने जब अधिकार मांगा, तो उन पर गोली चलाई गई। जिसमें जरहू गोंड नाम का श्रमिक शहीद हो गया। उन्हें भारत के मजदूर आंदोलन का पहला शहीद का दर्जा प्राप्त है। सिंह को अंग्रेजों ने जिलाबदर कर दिया और उनका राजनांदगांव रियासत में प्रवेश पर पाबंदी लगा दिया था। प्रतिबंध के अवस्था में प्यारेलाल सिंह ने चिट्ठी भेजकर नागपुर से रामचंद्र सखराम रूईकर को बुलाया। उनके आने के बाद पहली बार 23 दिन और दूसरी बार 65 दिन की हड़ताल हुई। रूईकर पर कई बार जानलेवा हमले हुए। उनको बोरे में बंद कर बाघ नदी की पुलिया में डाल दिया गया। इस हादसे में उनके शरीर के कई हड्डियां टूट गई। स्थानीय मछुवारों ने उन्हें बामुश्किल बचाया।

 

उस दौरान एक ऐसा समय भी आया जब सोशलिष्ट पार्टी कमजोर पडऩे लगी थी। तब उस समय प्रकाश राय पहली बार राजनांदगांव आए। प्रकाश राय भारतीय कम्युनिस्ट पाटी की मजदूर संगठन इंटक के नेता कहलाते थे। वे कभी कंपनी में पैठ नहीं बना सके। उसके बाद यहां के मजदूर इतिहास में काला अध्याय आता है। जिसे हम खजान सिंह खनूजा व बलवीर सिंह खनूजा के बदनुमा समय के नाम से जानते है। बड़ा भाई मैनेजमेंट का वकील था और छोटा भाई मजदूरों का वकील। यूनियन इन दोनों के बीच पाटे में पिसकर कारोबार बन गया था। जब मजदूर किसी तरह के समस्या को लेकर इनके पास आते थे। तब जवाब में मजदूरों को इन भाइयों द्वारा कोर्ट केस करने कहा जाता था। इस तरह दोनों भाई मजदूरों के हितों के साथ खिलवाड़ करने के मामले में बदनाम हो चुके थे। यह मिल 1974 में नेशनल टेक्सटाईल कार्पोरेशन के अधिपत्य में चलना शुरू किया। कंपनी में श्रम कानूनों का घोर उल्लंघन होता था। मिल में 110-115 डिग्री फैरनहाइट के तापमान पर यहां सूत भाप से बनता था। मध्यप्रदेश में नेशनल टेक्सटाइल कार्पोरेशन में 7 कारखाने थे और सबका मालिक एक।

 

राजनांदगांव के इस मिल को इंदौर के मिल मजदूरों को मिलने वाली वेतन से कम वेतन मिलता था। यह उस समय का इतिहास है, जब इस मिल में 5500 मजदूर की मेहनत से 55 हजार मीटर कपड़ा बुना जाता था। उत्पादन के साथ मजदूरों की संख्या घटाकर 4,700 कर दी गई। इस तरह उत्पादन 65 हजार मीटर हो गया था। 1984 में यहां 4 यूनियनें थी। सुनवाई किसी का नहीं होता था। मजदूरों ने अपनी मुक्ति के लिए दल्ली राजहरा के प्रसिद्ध श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी को अपना नेता बनाया। उनके संगठन छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में 8 जुलाई 1984 को पहली राजनांदगांव कपड़ा मजदूर संघ के रजिस्ट्रेशन के कार्य को पूरा किया गया। इसके बाद मिल में खलबली मच गई। मिल में गर्मी 110 से 120 डिग्री फैरनहाइट तक रहता था।

 

यूनियन पंजीकरण के बाद 13 जुलाई को मिल की गर्मी न झेल सकने के कारण कुछ महिलाएं बेहोश हो गई। इस घटना पर 14 जुलाई को मिल के 3600 मजदूरों में से 3 हजार मजदूर हड़ताल पर चले गए। जब लगातार मैनेजमेंट की अनदेखी से मजदूरों की हालत बिगडऩे लगी तो मजदूरों में रोष व्याप्त हो गया। उत्तेजित मजदूरों को निकालने की धमकी तक दे दी गई। आक्रोशित मजदूर आंदोलन के लिए उतर आए। पुलिस व जिला प्रशासन ने मैनेजमेंट से मिलकर मजदूरों को नौकरी से निकालने की कार्रवाई शुरू की। पुलिस ने लाठी चार्ज की, जिसमें एक हजार मजदूर घायल हो गए। 75 गंभीर रूप से घायल हो गए। कुछ को आईपीसी की धारा 151 में जेल भेज दिया गया था। 14 जुलाई 1984 को राजनांदगांव में गली व मोहल्लों से लेकर विभिन्न फैक्ट्री, ईंट भट्ठे, ठेका मजदूरों को इस धधकती आंदोलन से जोड़ा गया। मजदूरों की मेहनत रंग लाई। 108 गांवों में संगठन तैयार हो गया। 31 अगस्त को राजनांदगांव बंद करने का आह्वान मजदूरों ने किया। आह्वान के बाद मजदूरों पर पुलिस ने हमले तेज कर दिए। गिरफ्तारी व रिहाई का सिलसिला चला।

 

बेहतर कार्य परिस्थितियां, विशेषकर स्वास्थ्य संबंधी अधिकारों के लिए संघर्ष तेज हो गए थे। इंटक-एटक के खिलाफ मजदूरों में रोष भर गया था। 14 जुलाई से 30 अगस्त तक प्रदर्शन, घेराव, आमसभा, जुलूस के बाद पुलिस द्वारा लाठी चार्ज व गिरफ्तारी की कार्रवाईयां की गई। 31 अगस्त को नियोगी को गिरफ्तार कर रायपुर सेंट्रल जेल भेजा दिया गया। इस तरह 11 सितंबर तक आंदोलन जारी रहा। उत्पादन ठप कर दिया गया। इस पर वर्चस्व के लिए बौखलाई इंटक के एक समूह द्वारा मोर्चा के संघर्षरत मजदूरों पर हमला बोल दिया गया। एक मजदूर की मौत हो गई। 12 सितंबर को पुलिस द्वारा गोलीचालन हुई। तीन मजदूर मारे गए। अनेक घायल हो गए। 13 सितंबर तक आंदोलन चलता रहा। अक्टूबर में नियोगी रिहा कर दिए गए। उनके रिहाई के बाद पुन: प्रबंधन के साथ बातचीत शुरू हुई। मोर्चा का यह आंदोलन विस्तार करते हुए 1986 में राजाराम मेज प्रॉडक्ट में आंदोलन के रूप में पहुंच गई। 31 जुलाई 1984 को राजाराम मेज प्रॉडक्ट के मालिक राजाराम गुप्ता को बीएनसी मिल का मैनेजिंग एजेंट नियुक्त किया गया था। उन्होंने एक पत्र मिल के जनरल मैनेजर को लिखा था। उन्होंने नियोगी, राजनांदगांव कलेक्टर व श्रम अधिकारी के साथ चर्चा की। नियोगी ने 75 प्रतिशत मांगे चर्चा में उठाई। 17 बर्खास्त मजदूरों का सवाल भी रखा गया। उस चर्चा में 35 सौ मजदूरों के भविष्य को लेकर चर्चा हुई।

10 जुलाई 1990 को नेशनल टेक्सटाइल कार्पोरेशन लिमिटेड के निर्देशक (तकनीकी) कनक राय ने नियोगी को पत्र लिखते हुए कहा था कि मेरे कार्यकाल में वर्ष 1988-89 का सर्वश्रेष्ठ कामकाज (उत्पादन, औद्योगिक संबंध) का पुरस्कार मिल को दिया गया है। यह आपके सहयोग के बगैर संभव नहीं था। मिल को सुचारू रूप से चलाने में समय-समय पर विभिन्न संवेदनशील मसलों पर आप से मिली मदद के लिए मैं व्यक्तिगत रूप से आभारी हूं। 23 मई 1991 को दूसरी बार इंदौर से नेशनल टेक्सटाइल कार्पोरेशन लिमिटेड के अध्यक्ष व प्रबंध निर्देशन पी सरावणन ने नियोगी को लिखा कि आप अपने नेतृत्व में मिल की रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान करवा पाए है। आशा है कि आप वही सहयोग मुझे भी देंगे। मुझे विश्वास हैं कि आपके बहुमूल्य सहयोग से हम बंगाल-नागपुर कॉटन मिल्स को और भी ज्यादा मजबूत और स्वस्थ आधार पर विकसित कर पाएंगे। इन दोनों पत्रों से नियोगी व उनके संगठनों पर उठाए जा रहे आरोप बेबुनियाद साबित हो जाते हैं कि नियागी के कारण बीएनसी मिल बंद हुई। जून 1986 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी को नियोगी ने बीएनसी मिल के हालातों पर पत्र लिखा था। उन्होंने दमन रोकने, छटनी बंद करने और वेतन के ढांचे को बदलने की दीर्घकालीन मांगों को पूरा करवाने उनसे हस्तक्षेप की अपील की थी।

 

अस्सी के दशक के इस चर्चित आंदोलन के दौरान मेहतरू देवांगन, घनाराम देवांगन, जगत सतनामी, रोधेबालक ठेठवार मारे गए। 12 सितंबर 1984 को राजनांदगांव गोली चालन पर पीयूसीएल ने रपट जारी किया। जिसमें लिखा था कि ‘इस दौर में प्रबंधन राष्ट्रीय कपड़ा निगम का रूख बड़ा ही तकनीकी रहा है। इस समस्या को सिर्फ मान्यता प्राप्त श्रमिक संगठन से बातचीत के दौरान ही हल किया जा सकता है और सदियों पुराना तर्क दिया जाता है कि मिल तो चालू है, श्रमिकों को काम पर आना चाहिए।…पर अधिकारीगण अपनी जिम्मेदारी को राजनांदगांव से भोपाल और भोपाल से दिल्ली की ओर सरकाते रहे है।…समस्या की जड़ों तक न जाकर उसे केवल कानून और व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा या राष्ट्रीय एकता और कुछ नहीं तो विदेशी हाथ की संज्ञा देकर निरर्थक बना दिया। इस लंबी हड़ताल के दौरान कोई भी सत्ताधारी राजनीतिज्ञ पीडि़तों अथवा प्रभावित क्षेत्रों में आजतक नहीं आया। …जनता से दूरी बढऩे पर ही सत्ताधारी अमानवीय और कूरूर हथकंडों को अपनाते हैं। यही कारण था कि प्रशासन ने संघर्षरत मजदूरों और किसानों पर संगठित हिंसा का उपयोग किया। यह संगठित हिंसा उस त्रिकोणीय संबंध का परिणाम है, जो प्रशासन, प्रबंधक और राजनैतिक दलों के बीच बढ़ रहा है। पुलिस, राजकीय दमन का केवल एक प्रतीक मात्र ही है।

 

इस दमनात्मक रवैये ने हड़ताली मजदूरों के मन में असुरक्षा और डर पनपाने के बजाए कुछ नए क्रांति दूत पैदा कर दिए है। अब धीरे-धीरे लोग यह महसूस करने लगे हैं कि इस व्यवस्था के तहत सामाजिक न्याय गरीबों की चौखट पर नहीं पहुंचाया जा सकता। …इसका असर यह है कि उनमें एक नयी राजनीतिक चेतना का संचार हो रहा है। खासकर नई पीढ़ी के लोगों के बीच, जो राज्य की संगठित हिंसा और सत्ताभोगियों के हथकंडों का शिकार बनकर आज की व्यवस्था का सही रूप को पहचान रहे है।’ उस वक्त पीयूसीएल ने आशा व्यक्त किया था कि इस संघर्ष के माध्यम से वे एक नया विकल्प ढूंढने में सफल होंगे। आखिरकार सन् 1991 के 28 सितंबर को श्रमिक नेता नियोगी की हत्या कर दी गई। उसके बाद कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार ने पूरे देश भर में निजीकरण के तहत कई निजी उद्योगों को बंद करना शुरू किया। इसी नीति के तहत 30 सितंबर 2002 को इस ऐतिहासिक मिल को भी बंद कर दिया गया। इसके साथ ही सूती के बेहतरीन मच्छरदानी बनना बंद हो गया। उसके स्थान पर कारर्पोरेट घरानों के मच्छर मारो यंत्रों व अगरबत्तियों ने ले ली। इस इतिहास में देखा हमने की हाथ से कपड़ों को बुनने की तकनीक अत्याधुनिक पावरलुम ने ले ली।

 

2008 में इसके कुछ हिस्सों व मलबों को 12.5 करोड़ में उच्च न्यायालय के पंजीयक की उपस्थिति में नीलाम कर दिया गया। कहा जाता है कि 1995 को मिल जिस जमीन पर स्थित है उसका लीज खत्म हो गया है। इसका नवनीकरण नहीं होता है। नेशनल टेक्सटाइल कार्पोरेशन ने 2008 में बैंक कर्ज, निगम का बकाया राशि, बिजली बिल का भुगतान करने के लिए उक्त कारखाना जमीन का कुछ हिस्सा बेचने की अर्जी उच्च न्यायालय में लगाया। जिसने इसे नीलाम में खरीदा इस जमीन को अंदर ही अंदर किसी दूसरे पार्टी को बेच दिया। आज भी इस मिल में नगर निगम का नोटिस चस्पा हुआ है कि इस मिल को खरीदने वाले को बकाया करों का भुगतान करना पड़ेगा। तन ढंकने के लिए कपड़ा व मच्छरों से निजात देने मच्छरदानी बनाने वाले मजदूर बेरोजगार हो गए। हाल ही में तुलसीपुर रेलवे चौकी पर स्थित दो दशक पुरानी कपड़ा मिल मजदूर संघ के कार्यालय को रोड चौड़ीकरण के नाम पर तोड़ दिया गया। उनके संघर्ष और बंद मिल को चालू करने की मांग मजदूर नेताओं द्वारा आज भी उठाया जाता है। दुर्ग में आज 28 सितम्बर को छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा समन्वय समिति द्वारा विशाल श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया है। जिसमें तमाम उद्योगों के निकाले गए मजदूरों को वापस लेने, नियोगी के हत्यारों को सजा देने, मारे गए मजदूरों के अधिकारों के साथ वर्तमान में मजदूरों के गिरते हालातों पर चिंतन किया जाएगा। इस तरह नियोगी द्वारा स्थापित संघर्ष व निर्माण का जज्बा मजदूरों के दिलों में जिंदा है।

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