कोई न रहे मुगालते में जनता सभी दलों का बहीखाता लिख रही है : देवेश तिवारी अमोरा

24.09.2018, रायपुर 

छत्तीसगढ़ की सियासत में वोटर खामोश है, बीते 1 महीने से प्रदेश के 12 जिलो से अधिक दौरे करने के बाद यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि, मतदाता खामोश है। मतदाता को यह स्पष्ट नहीं है कि, उसे किसे मतदान करना है। मतदाता के सामने सवाल ही सवाल हैं, मतदाता अंर्तव्यक्तिक कम्यूनीकेशन से जूझ रहा है यानी खुद ही सवाल खुद से ही जवाब दे रहा है। वह 15 साल से सत्तासीन बीजेपी को योजनाओं की कसौटी पर कस रहा है। हर 5 साल में लगने वाले चुनावी मेले और ​उसमें बंटने वाली रेवड़ियों को वह अब जाकर समझने लगा है।

 

मोबाईल, चप्पल, बोनस, टिफिन, सायकल, किट, साड़ी, छाता सब लेकर उसे हर्ष हो रहा है, वह खुश है कि, भागते भूत की लंगोट भी हाथ में आ जाए तो बुरा क्या है। वह खुश होता है मुफ्त की सामग्री लेकर और कहता भी है अपन घर ले थोरे देवत हे, चुनाव आहे त बांटत हे लेहे म का हे, फेर वोट काला देना हे तेन चुनाव समय देखे जाही। मतदाता जानता है कि, 2008 में उसके पास मुफ्त का चावल था, 2013 में 70 लाख राशन कार्ड के जरिए राशन की सुनामी भी मतदाता ने देखी है। मतदाता इस समय के मुफ्त सामग्रीयों को भी देख रहा है। फिर से राशन कार्ड स्मार्ट कार्ड बनवा रहा है इस डर के साथ कि, चुनाव के बाद यह कितने दिन तक मान्य होगा। 

 

मतदाता का कुछ न कहना जरूरी नहीं कि, यह बदलाव का ही ईशारा हो, मतदाता के अंर्तमन में पक रही खिचड़ी की खुशबू भी बड़े से बड़ा राजनीतिक ​पंडित नहीं बता सकता। मतदाता कभी दल को , कभी प्रत्याशी को, कभी स्थानिय मुद्दों को अपनी कसौटी पर कसता है। इन सबके कॉकटेल के बीच वह सीएम के चेहरे को भी ध्यान में रख रहा है। कैसे 2018 कि मियाद नवा नवा करते हुए 2025 की नई तारिख दे रही है मतदाता उसे भी समझ रहा है। हॉलाकि, शहर की जनता को इससे बहुत फर्क पड़ता है कि, किसकी सरकार आ रही है ग्रामीण मतदाता को इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ रहा है, कार्यकर्ता उत्साह में है पार्टी की गतिविधियों को महसूस कर रहा है। 15 में दिखने वाले विकास में सड़क, बिल्डिंग, उंगलियों में गिने जा सकने वाले शिक्षण संस्थान को देखता है। दूसरी तरफ यह सोचता है कि, सब्सिडी या बोनस की पंदौली से वह कब तक पेड़ चढ़ने की कोशीश करता रहेगा। उसके जिंदगी में बदलाव ला देने वाले विकास का उसे इंतजार है, वह एक तरफ बीजेपी सरकार के वीजन और 15 साल बनाम 60 साल को देख रहा है, दूसरी तरफ 15 साल से सत्ता से दूर कांग्रेस के विजन को समझने की कोशीश कर रहा है। टिकटों की उधेड़बुन को महसूस कर रहा है कि, और अपने क्षेत्र के नेता को टिकट मिलने की गुंजाईश पर टकटकी लगाए हुए है। मतदाता तीसरे दल को लेकर खास चर्चा नहीं करता हां जाति वर्ग विशेष में उनकी बनती हुई पैठ को महसूस किया जा सकता है। मतदाता बोल नहीं रहा, बोलने से पहले पूछ रहा है कि, आप कौन से दल से हैं, किसे देना है आप बताईए। मतदाता की खामोशी तीनों ही दलों के लिए खतरे की घंटी है इस दौर में यदि बीजेपी सरकार और चेहरे को कांक्रिट करने में कामयाब रही तो जय, कांग्रेस खुद को विकल्प के तौर पर मजबूती से पेश कर पाई तो इनकी जय, जोगी बसपा मिलकर यदि बेहतर विकल्प दे पाए तो वोटकटुआ ईमेज से उपर भी कुछ हासिल कर पाएंगे। मतदाता की खामोशी को राजनीतिक दल के वे नेता महसूस नहीं कर पाएंगे जो ​कार्यकर्ताओं से घिरे रहकर खुशामद के बोल सुनने के आदी हो चुके हैं, वे राजनीतिक पार्टियां भी नहीं जो सर्वे टीम के बेहद कम मानदेय पर फिल्ड में सर्वे कर रहे आदमी से यह अपेक्षा करती है कि, वह पूरा​ विधानसभा घूमेगा लॉज में बैठकर फार्म नहीं भरेगा।

मतदाता की खामोशी को वे भी नहीं समझ सकते जो सोशल मीडिया के कुल 13 से 20 लाख युजर से 2 करोड़ मतदाताओं का रूझाान जानना चाहते हैं। और हम भी नहीं जो राजनीतिज्ञों की पल पल बदलते दावों पर खबरें लिखते हैं। मतदाता की चुप्पी मतदान केंद्र में टूटेगी तब परिणाम कई दलों की बोलती बंद करने के लिए काफी होगा।

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