छत्तीसगढ़ की जनता सावधान… होशियार

23.09.2018

रायपुर / यह खबर आपको भ्रमित करने या प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ से भरोसा खत्म करने के लिए नहीं लिखी गई है। इस खबर का मकसद है कि चुनाव की बेला में जनता-जनार्दन सावधान रहे। इस खबर के साथ एक फोटो भी चस्पा है। इस फोटो को पिछले दिनों रायपुर के एक वरिष्ठ फोटोग्राफर ने खींचा था। पहली नजर में ही इस फोटो को देखकर मुंह से निकलता है- बाप रे… इतने चैनल वाले?

जी… हा…. अभी तो कम है। अभी थोड़ा ठहरिए… चुनाव तक कई और चैनल वाले आएंगे। अखबार वाले आएंगे। वेबसाइट वाले आएंगे।

भला बताइए एक मतदाता कितने चैनल देखेगा वह भी तब जब उसने अंबित- साबित जैसे मूर्ख लोगों की वजह चैनल देखना ही बंद कर दिया है। एक मतदाता कितनी वेबसाइट की लिंक खोलेगा जबकि लोगबाग लिंक पर लिंक भेजे जा रहे हैं। एक मतदाता को कितने अखबार बांचना चाहिए जबकि अखबार के पास कहने को कुछ नया नहीं है। अगर आप अखबार के नियमित पाठक है तो गौर करिएगा सारे अखबारों में एक जैसा ही छप रहा है। अखबार के संवाददाता उन्हीं खबरों को परोस रहे हैं जिन खबरों को हम वाट्स अप या सोशल मीडिया में पढ़ चुके होते हैं। इसका आशय यह नहीं कि आप अखबार पढ़ना छोड़ दें, लेकिन आपको यह तो देखना ही होगा कि कौन सा चैनल वाला सही खबरें दिखा रहा है। कौन सी वेबसाइट जनता की बात कर रहा है और कौन सा अखबार वाला सही तथ्यों के साथ जनता की बात लिख रहा है।

सामान्य तौर पर कहा जाता है कि मीडिया निष्पक्ष होता। छत्तीसगढ़ में पिछले चुनाव तक एक दो मीडिया घरानों ने इस निष्पक्षता को कायम रखा था। अब भी एकाध समूह शायद निष्पक्ष हो, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। अब चैनलों को, अखबारों को और वेबसाइट वालों को सरकारी खजाने से भरपूर धन मिल रहा है तो वे जनता की तकलीफों की बात क्यों करेंगे? खबर तो यह भी है कि सरकार के कुछ अफसरों ने अखबार और वेबसाइट को बकायदा फाइनेंस कर रखा है। अब जिस अखबार में सरकार का भरपूर विज्ञापन होगा वह सरकार का गुणगान नहीं गाएगा तो क्या करेगा?

मीडिया घराने इस बात को नहीं बताएंगे छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुए 18 साल हो गए हैं। यदि किसी लड़के ने वर्ष 2000 में भी छत्तीसगढ़ में जन्म लिया था तो वह वर्ष 2018 में जवान हो चुका है और बेरोजगार घूम रहा है। सरकार उसके हाथों को कोई काम नहीं दे पाई है? किसी को जानबूझकर नक्सली बनने का शौक नहीं होता है। बस्तर में ज्यादातर युवा इसलिए बंदूक थामते रहे हैं क्योंकि सरकार उनके हाथों को कोई काम नहीं दे पाई।

सरकार विकास का मतलब मानती है भव्य मंत्रालय बना दो। बिल्डिंग बना दो। एक शहर में दस- बीस पुल बना दो और फिर लोगों को पकड़-पकड़कर लाओ और नई राजधानी दिखाओ- मंत्रालय दिखाओ।

एक मंत्रालय, पुल या नई राजधानी के बन जाने से किसको फायदा मिलता है? क्या जनता हर रोज़ बेधड़क मंत्रालय आ- जा सकती है? इस तरह के तमाम बड़े भवनों और निर्माण कार्यों से केवल और केवल ठेकेदारों को ही लाभ मिलता है। आप मंत्रालय में अफसरों के कमरों की रौनक देखकर भौंचक रह जाएंगे। फोन-फान, लैपटॉप, मंहगा टीवी, लाखों की टेबल। हर कमरा पचास लाख से ऊपर। इतने पैसों में तो छत्तीसगढ़ के उस किसान की जान बच सकती है जो कर्ज से दबा हुआ है और आत्महत्या करने की सोच रहा है।

क्या आपको किसी अखबार वाले ने यह खबर बताई कि छत्तीसगढ़ के अफसरों और मंत्रियों की संपत्ति 18 साल पहले क्या थी और अब क्या है? किस अफसर और मंत्री ने 18 साल में सबसे ज्यादा विदेश यात्रा की और वहां से क्या सीखकर आए? छत्तीसगढ़ को उसका क्या लाभ मिला?

अखबार/ चैनल/ और वेबसाइट वाले यह नहीं बताएंगे कि छत्तीसगढ़ में मनरेगा के मजदूरों का कितना भुगतान बकाया है? किसान क्यों मर रहा है? पुलिस का अत्याचार कितना बढ़ गया है।
बहरहाल अपने आसपास आंख खोलकर देखने का समय आ गया है। एक अखबार, किसी चैनल या वेबसाइट की खबरों पर यकीन करने से पहले यह अवश्य देखिए आपको निजी तौर पर क्या मिला? क्या आपको छत्तीसगढ़ में काम मिला? आपकी औलाद को को काम मिला? सम्मान मिला या नीला-पीला-गुलाबी राशन कार्ड।

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