सत्यता को लिखना या बोलना गुनाह नहीं बल्की मानवता की ताकत हैं, दंतेवाड़ा पुलिस कर रही हैं गुमराह .

 

 

लिंगाराम कोडपी की रिपोर्ट 

20.09.2018

छत्तीसगढ़ राज्य के दन्तेवाड़ा जिला की पुलिस प्रशासन डर क्यो रही हैं। अपराध हुआँ हैं या नहीं हुआँ हैं, इसका फैसला पुलिस प्रशासन कैसे कर रहा हैं? जहाँ पुलिस को निष्पक्ष जाँच करना चाहिए वहाँ पर अपराध मड़ा जा रहा हैं।

सत्यता को लिखना या बोलना गुनाह नहीं बल्की मानवता की ताकत हैं.

मैंने फेसबुक में आदिवासी युवती के न्याय के लिए लोगों तक खबर पहुचाया हैं। इसमें मैंने कौन सा अपराध किया हैं? जो ग्रामीणों का शक था उस शक को लिखा हैं। इस पोस्ट को 1400 लोगों ने शेयर किया तो जिले के पुलिस प्रशासन को मिर्ची क्यों लग रही हैं? पुलिस प्रशासन को आपत्ती इसलिए हो रही हैं क्योंकि शायद इनके विभाग में इस तरह की घटनाएं होती हैं। इसलिए मामले को झोलमोल व लोगों को पुलिस कहानी बता कर गुमराह करना चाहती हैं।

रही सवाल युवती के प्रथम बयान की तो युवती ठीक से होश में आयी भी नहीं थीं कि पुलिस प्रशासन ने बयान लिया और कह दिया कि ग्रामीण वेश भूषा में थे। अपने आप को बचाने के लिए दन्तेवाड़ा पुलिस प्रशासन कितना खेल खेलेगा? इस घटना में तो पुलिस प्रशासन जज बना हुआ हैं। तहकीकात नहीं करेंगे किसी को भी अपराधी बना देंगे जैसे आज तक पुलिस प्रशासन करते आयी हैं। न्यायालय क्यों है? मामला न्यायालय में हैं और जिला दन्तेवाड़ा के माननीय पुलिस अधीक्षक अभिषेक पल्लव पत्रवार्ता कर सबूतों को प्रकाशित कर रहे हैं, न्यायालय तमाशा देख रहा हैं।

जिस आदिवासी युवती ने अन्याय के खिलाफ आवाज उठायी हैं, उसे पुलिस 24 घण्टे पहरा दे रही हैं। मानो युवती ने सच बोल कर अपराध किया हो। युवती सोच रही होगी कि मैंने सच क्यो बोला?

सुकमा जिले के चिन्तागुफ़ा में एक ऐसी ही घटना हुई थी। जिसमे एक आदिवासी युवती का C.R.P.F. ने बंदूक की नोक में बलात्कार किया था। खबरे पेपरों में आयी F.I.R. तक C.R.P.F. के खिलाफ हुआँ। भारतीय कमनीष्ट पार्टी ने इस घटना को जोरदार तरीके से उठाया अन्ततः सुकमा जिले की पुलिस प्रशासन ने पीड़ित युवती को अपने अधीन रखकर युवती को प्रताड़ित किया मारा पीटा और न जाने क्या-क्या। अंत में पीड़ित युवती ने पुलिस के अन्याय के खिलाफ घुटने टेक दिए और केस वापस ले लिया और युवती से पुलिस प्रशासन ने लिखवा लिया कि उसके साथ कुछ नहीं हुआँ। पीड़ित युवती आज चिन्तागुफ़ा गाँव में नहीं हैं, सूत्रों के मुताबिक युवती आंध्रप्रदेश गयी हैं बताते हैं। हो सकता हैं युवती न्याय न मिलने से माओवादी सगठन में शामिल हो गई हो।

समेली की इस युवती के साथ भी इस तरह की घटना हो सकती हैं। पुलिस प्रशासन कुछ भी कर सकती हैं। यहाँ तक कि पीड़ित युवती की जान भी ले सकती हैं हो सकता हैं कि युवती को पागल बनाया जाए। ये बस्तर की पुलिस हैं यहाँ अधिकार मांगो तो मौत या जेल की सलाखें मिलती हैं। सच बोलो तो अर्बन माओवादी का टैग मिलता हैं। झूठ बोलो तो ऐसोआराम और सम्मान मिलता हैं।

मैं इस बात से नहीं डर रहा हूँ की मेरी गिरफ्तारी हो जाएगी मैंने वहीं लिखा जो गाँव के ग्रामीणों ने कहा। मैंने अपना पत्रकारिता का धर्म निभाया हैं। ग्रामीण भी सच बोल रहे हैं क्योंकि बाजार का दिन था उस दिन शाम तक C.R.P.F. के जवान उस जंगल में थे। पुरे गाँव के ग्रामीण बोल रहे हैं। जब C.R.P.F. के जवान शाम तक उस जंगल में थे तो नक्सली कहाँ से आ गये?

शसक्त ही सुरक्षित मतलब जो ताकत वर हैं वहीं सुरक्षित हैं। शायद आदिवासी कमजोर हैं, इसी एवज में देश के आदिवासियों को आँसू और भीख दिया जा रहा हैं। आज तक देश में आदिवासियों के साथ न्याय कभी नहीं हुआँ। इसलिए हर आदिवासी युवती ताकतवर बने और आदिवासी युवा देशभक्त। आदिवासी ही भारत के मूल वासी हैं, अर्थात आदिवासी भारत सरकार हैं।

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