बस्तर की लड़ाकू महिला सोनी सोरी को  मिला अंतर्राष्ट्रीय फ्रंटलाइन  डिफेंडर सम्मान :  उत्तम कुमार, सम्पादक दक्षिण कोसल.

20.09.2018| दिल्ली 

हम जब तक ज़िंदा रहेंगे लड़ते रहेंगे , सोनी सोरी

बस्तर में आदिवासियों के बीच लंबे समय से संघर्षरत सोनी सोरी को आदिवासियों के बीच उनके उल्लेखनीय कार्यों के लिए आयरलैंड अधिकार समूह ने उन्हें फ्रंटलाइन डिफेंडर आवर्ड से सम्मानित किया है l हाल ही में प्रेस क्लब में मिले इस सम्मान से उनकी गिनती एशिया में पहली महिला की हो जाती है l

दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क एंड अदर्स ने कॉन्फ्रेंस ऑन डिफेंड दी डिंफेंडर्स अर्थात हकों की आवाज़ उठाने वालों की रक्षा के लिए सम्मेलन का आयोजन किया था l

आज भी पुलिस-प्रशासन से लड़ाई चलती रहती है, आज भी पुलिस वाले मेरा दुपट्टा खींच लेते हैं, कभी थाने से तिरस्कार कर भगा देते हैं…लेकिन मुझे कोई शिकायत नहीं, क्योंकि मैंने ऐसे लड़ाई का मैदान खुद चुना है…मेरी आवाज़ आप तक पहुंच भी गई लेकिन उनका क्या जो बस्तर में रोज ऐसे समस्याओं से जूझ रहे हैं.

 

ये कहना है बस्तर की आवाज़, आदिवासियों के हकों के लिए लड़ने वाली जुझारू महिला सोनी सोरी का। वे पिछले दिनों नई दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क एंड अदर्स के कार्यक्रम में अपने अनुभव साझा कर रही थीं। कॉन्फ्रेंस ऑन डिफेंड दि डिंफेंडर्स यानी हकों की आवाज़ उठाने वालों की रक्षा के लिए आयोजित इस कॉन्फ्रेंस में सोनी सोरी को विशेष तौर पर आमंत्रित किया गया था। इस मौके पर उनके संघर्ष से जुड़ी एक फिल्म भी दिखाई गई।

छत्तीसगढ़ के बस्तर की रहने वाली सोनी सोरी का संघर्ष का अलहदा महत्व है। आदिवासियों के पक्ष में बोलने की उन्हें ऐसी-ऐसी सज़ाएं दी गईं कि सुनकर ही रौंगटे खड़े हो जाते हैं, दिल दहल जाता है। आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन की लड़ाई लड़ने पर उन्हें माओवादी कहा गया और तरह-तरह से प्रताड़ित किया गया। यहां तक कि पुलिस द्वारा उनकी योनि में पत्थर तक डाले उनके मुंह में कांच के लिए डाल दिये गए। उनके मुताबिक उन्हें प्रताड़ित करते हुए पुलिस का कहना था कि इसे ऐसा कर दिया जाए कि ये शर्म से मर जाए। लेकिन नहीं, वे दोगुनी फीनिक्स के ताकत की तरह फिर खड़ी हो गईं।

दिल्ली में आज उन्होंने कहा कि मेरे भीतर कई सवाल हैं। ये सवाल नहीं कि सोनी सोरी के साथ क्या हुआ, हालांकि जो हुआ वो बेहद दर्दनाक था, उसे मैं आज भी महसूस करती हूं। उस समय मैं कुछ और थी और आज कुछ और हूं। हालांकि आज भी प्रताड़ना कम नहीं हुई है। सोनी ने आज के बस्तर की हालत बताई और बताया कि किस तरह अभी 14 सितंबर को दंतेवाड़ा में एक बच्ची के साथ सुरक्षा बालों ने बलात्कार किया और किस तरह पुलिस ने बच्ची की जान बचाने और इलाज कराने की बजाय उन्हें प्रताड़ित किया। किस तरह लोगों को फर्जी मुठभेड़ों में मार दिया जाता है। किस तरह झूठे मामलों में गिरफ्तार किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि वहां आज भी बहुत लोग इस वजह से भी आवाज़ उठाने से डरते हैं क्योंकि शिकायत करने पर फिर पीड़ितों को मारा जाता है। हम कानून की बात करते हैं, हम हक की आवाज़ उठाते हैं तो हमें माओवादी कहा जाता है। इस मौके पर उन्होंने भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में अर्बन नक्सल के नाम पर पकड़े गए सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का भी जिक्र किया। सोनी ने सवाल किया कि आखिर इन लोगों को क्यों पकड़ा गया, क्या इसलिए क्योंकि ये गरीब आदिवासियों की आवाज़ उठाते हैं?

सोनी ने दुख जताते हुए कहा कि देश में बहुत कुछ गलत हो रहा है लेकिन वो सबकी आवाज़ नहीं उठा पातीं क्योंकि उनका अपना बस्तर ही लहूलुहान है।उन्होंने कहा कि मुझे देश के किसी भी हिस्से में जाना होता है तो न्यायालय को बताकर आना होता है, लेकिन मुझे अपने बस्तर के भीतर भी गांवों में नहीं जाने दिया जाता। वहां जहां मैं खेली, बड़ी हुई वहां जाने पर भी मेरे ऊपर प्रतिबंध है, तो ये कैसी आज़ादी है।

उन्होंने कहा कि आदिवासी दोनों तरफ से पिस रहे हैं। पुलिस तो हमें मारती ही है, कई बार माओवादी भी मुखबिर होने के शक में आदियासियों को जान से मारते हैं। आदिवासी दोनों तरफ से मारे जाते हैं। हमारा जीवन पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया है। लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर कभी शिकायत नहीं करुंगी, क्योंकि हम जब तक ज़िंदा रहेंगे लड़ते रहेंगे l

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