चितालता_शहादत_और_सरगुजा_का_जीतागया_भूमि संघर्ष.

बादल सरोज , 19.09.2019

(एक सरल सुबोधिनी)

कल – 17 सितम्बर 2018 को – कंवल साय और पिछारिन बाई की 29वीं शहादत बरस पर 5 हजार के करीब आदिवासियों – गैरआदिवासी ग्रामीणों के हुजूम का ऊंची पहाड़ियों-घने जंगल के बीच उनकी समाधि पर इकट्ठा होना, सो भी बिना किसी के लाये, किसी भी सभ्य और सूचना-सचेत समाज मे एक बड़ी खबर होनी चाहिए थी । अगर नही बनी तो उस समाज को अपने सूचना-कुपोषण के इस कदर चिंताजनक स्तर पर चिंतित होना चाहिए । बहरहाल, अम्मा कहती थी : संजा (शाम) के मरे को कब तक रोओगे !! इसलिए कुपोषण-संताप को यहीं छोड़, इनके बिना – इनके बावजूद ही, आगे चलें ।

● चितालता की शहादत सरगुजा के जिस भूमि संघर्ष से जुड़ी है वह जिन हालात में लड़ा गया उसे थोड़े शब्दों में बयान करना मुश्किल है । कहानी में कहें तो ;
#एक_समय_की_बात_है
इस हरी भरी वादी और घाटियों के सैकड़ों गांव-टोलों में चार जघन्य प्रभु-पशु थे ।
#एक तरफ राजा (जो आज तक हिंदुस्तान में भूतपूर्व नही हुए हैं) और उसके क्रूर सामन्त,
#दूसरी तरफ धूर्त महाजन -जिन्होंने कितनी जमीन हड़प रखी थी इसका सिर्फ एक उदाहरण काफी है कि उनके पास हल में जुतने वाले बैलों की 2-200 जोड़ियां हुआ करती थीं । अनेक इंसानों को वे इनके अलावा हल में जोत दिया करते थे, वह अलग था।
#तीसरी तरफ रामानुजगंज की ओर से आने वाले भाई लोग – जो इन दोनों के कॉकटेल तो थे ही , ट्रिगर हैप्पी का सोड़ा अलग से थे ।
#चौथी हुकुम बजाने वाली ताबेदार सरकार थी । तहसीलदार से लेकर कलेक्टर और ऊपर मंत्री और सेक्रेटरी तक सब उनके संगी-साथी थे । कमाई में साझेदार, ऐशगाह बना दिये गए सरगुजा के नियमित महानुभाव ।
● फिल्मी भाषा मे देखें तो यह अंग्रेजी फ़िल्म स्पार्टकस और हिंदुस्तानी फ़िल्म मदर इंडिया के बीच का काल था – बस अंतर सिर्फ इतना भर था कि ये 1989 के सरगुजा की बात है।
● भय इतना था कि कम्युनिस्ट पार्टी ने जब इस स्थिति को बदलने के लिए सक्रियता शुरू की तो उनकी बात सुनने के बीच में ही आदिवासी डर के मारे गांव छोड़ कर भाग जाते थे । कालेज से पढ़कर निकले युवा कामरेड्स ने अपनी रणनीति बदली , उन्होंने पदयात्रा शुरू की । रात के अंधेरे में जंगल घनेरे में छोटी-बड़ी बैठकें की । सन्नाटा टूटा । डर छूटा । हौंसला बढ़ा और लड़ाई की शुरुआत हुई ना से, सामूहिक ना से ।
● इस ना से खलबलाये चारों प्रभु-पशुओं ने मिलकर गंठजोड़ बनाया । गैंग ऑफ वासेपुर और नाना पाटेकर की शक्ति जैसी मुम्बइया फिल्मों की तरह जीपों में गुंडा वाहिनियों की गश्त शुरू हुई । आगे आगे एसपी पीछे पीछे हिस्ट्रीशीटर ; पटाखों की तरह गोलियां दागते । गांवों में दहशत मचाते । खुली और वीभत्स हिंसा और अनाचार का जघन्यतम दौर ।
● मगर जब “न सत था न असत था – न वो जिसके होने का भरम है वह था, वह है भी कि नही था इसका खुद उसको भी नही पता था” जब यह सब बताने वाले सूत्रवाक्य भी नही था । न इसे लिखकर ऋग्वेद का आरम्भ करने वालो का ओर था, न सिरा था, न अता था पता था । आदिवासी तबसे है । नरभक्षी जानवरों को घेरना, खदेड़ना और आखेटकों का आखेट उसे आता था ।
● फिलहाल मुख्तसर में ये कि कुछ महीने पहले तक नन्हे मृगछौने बने ग्रामीण संगठित इंसानों की तरह उठ खड़े हुए और जंगल मे जाग हो गई ।
● इस जागरण की खीज उतारी गई चितालता की घनी पहाड़ी पर बसे एक छोटे से टोले में रह रहे पहाड़ी कोरबा आदिवासी भाई बहन कंवल साय (25 साल) और पिछारिन बाई (30 साल) को 17 सितम्बर 1989 को पुलिस की गोली से भून कर ।
● कुर्बानी व्यर्थ नही गई । अत्यंत संक्षेप में यह कि जागे जंगल धधक उठे और सारी दमन आजमा चुकी सरकार देश भर में उठी आवाज के दबाब में – पहली बार सरकार की तरह – पहुंची । उसे अचानक इलहाम हुआ कि अरे, यहां तो बहुत शोषण है !! कैम्प लगे, आतंक रुका । सैकड़ों बंधुआ मजदूर आजाद हुए, महाजनी कर्जे खारिज किये गए, छिनी जमीन वापस मिली, बाकी जमीन बांटी गयी । और किसानों को मिला लालझण्डा ।
● विस्तृत वृतांत, अनुभव और सबक आगे कभी । अभी इस कहानी में उल्लेखित पदयात्रा करने वाले कामरेड चंद्रप्रकाश शुक्ला (सीपीएम जिला सचिवमण्डल सदस्य) Chandra Prakash Shukla और संघर्ष के एपीसेंटर के गांव राई खुर्द के वासी, इस संघर्ष में जेल में ही एनकाउंटर से बमुश्किल बचे ऋषि गुप्ता (महासचिव छत्तीसगढ़ किसान सभा) और रात और आज सुबह में उसी गांव में कुछ बड़े बुजुर्गों से संजय पराते Sanjay Parate के साथ बैठकर सुनी कहानी

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