”  स्त्री ”     फिल्म समीक्षा :  ओ_स्त्री_रक्षा_करना !! : बादल सरोज

”  स्त्री ”     फिल्म समीक्षा :  ओ_स्त्री_रक्षा_करना !! : बादल सरोज

”  स्त्री ”     फिल्म समीक्षा :  ओ_स्त्री_रक्षा_करना !! : बादल सरोज

14.09.2018 | ग्वालियर 

हिंदी फिल्मों की अन्य विशेषताओं के साथ एक खासियत यह भी है कि वे ढंग-ढोर से डरा भी नही पाती । भय पैदा करने का पूरा जिम्मा बैकग्राउंड म्यूजिक पर होता है जो भें-भें-छुन्न-भड़ाक करके डराता कम है कानों को सताता अधिक है । उस पर हॉरर को साफ-सुथरी कॉमेडी से जोड़ना, डर में हंसी का तड़का लगाना तो और भी कठिन है : #अमर_कौशिक के निर्देशन वाली फिल्म “स्त्री” ये दोनों काम -इसके असल काम पर बाद में- पूरे करती है । एकदम चुस्त और अर्थवान संवादों और खूब अच्छे अभिनय के जोड़ से ऐसी फिल्म बन जाती है, जिसे देखने के बाद पैसा वसूल हो जाता है ।

● फ़िल्म एक क्रोधित स्त्री की भूतरूपेण आत्मा, उसके आतंक और उससे मुक्ति की कहानी है जो हर साल पर्व के चार दिन के लिए आती है और जो पुरुष हत्थे चढ़ जाये उसे उठाकर ले जाती है, उसके कपड़े भर छोड़ जाती है । वह पढ़ी लिखी और शिष्ट भी है, हर मकान पर “ओ स्त्री, कल आना” को पढ़कर लौट भी जाती है । कल फिर आने के लिये ।

● ये पंक्तियां फिलम की स्टोरी सुनाने के लिए नही लिखी जा रही हैं । यह बताने के लिए हैं कि यह हॉरर-कॉमेडी फिल्म एक दुरुस्त संदेश के साथ है जिसे दो टूक और तल्ख शब्दों में बयान करते हैं “स्त्री” की असली कथा के इकलौते जानकार शास्त्री जी – वे उसके कहर से मुक्ति का एक अनूठा उपाय भी सुझाते हैं, जो फ़िल्म तक के लिए ही सार्थक और उपयोगी नही है ; उसकी एक यूनिवर्सल वैल्यू है । #विजय_राज ने इस एक डेढ़ फ्रेम की भूमिका में जान डाल दी है ।

● शास्त्री जी से स्त्री व्यथा-कथा सुनने के बाद पूरा नजरिया ही बदल देती है फ़िल्म । गुजरी रीलों (आजकल रीलें नही होतीं, क्या होता है पता नही 😏😏 ) के अनेक दृश्य और संवाद याद आ जाते हैं और मानीखेज हो जाते हैं । पता चलता है कि लिखे से ज्यादा तो अनलिखे में है, कि अन्तर्प्रवाह तो कुछ और ही है : स्त्री के अलग अलग रूपों के प्रति सम्मान और प्रेम । उसके अस्तित्व की सादर स्वीकारोक्ति !!

● फ़िल्म बहुत ही तर्कसंगत तरीके से इस मुकाम तक पहुंचाती है । “ओ स्त्री कल आना ” की भयमिश्रित टालू इबारत को आखिर में “ओ स्त्री, रक्षा करना” के आग्रही और स्नेहसिक्त अनुरोध में बदल जाती है ।

● फ़िल्म के संवाद बहुत चुस्त, लाइवली और अर्थवान हैं । स्त्री प्रश्न पर तो कन्विन्सिंगली ठीये पर पहुंचाते ही हैं । सामयिक प्रश्नों पर भी करारी चोट करते हैं । पता नही सरकारें टाकिजों का फीडबैक लेती हैं कि नहीँ 😉😉 मगर हुकूमत के लिए चिंता का विषय होना चाहिए कि इस फ़िल्म के दौरान पूरे थिएटर के सामूहिक ठहाके और वे डायलॉग्स जिन पर वे लगे ; टू से द लीस्ट उसके लिए सुखद नही हैं । खासतौर से इसलिए कि मल्टीप्लेक्सेज में “अल्लम गल्लम-अटीचर-फटीचर-बाबू-टीचर” टाइप के लोग नही आते । वह सुथरा और कमोबेश अभिजात्य मध्यमवर्ग आता है जो पॉपकॉर्न का 250 रु. का मीडियम और 540 रु. का लार्ज कागज का कटोरा अफ़्फोर्ड कर सकता है । (हम हर बार आर्डर लेने आये बन्दे से रेट जरूर पूछते हैं ; कल भी पूछी ।) अब अगर ये “जिन पै तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे” तो इट्स राइट टाइम कि माल्या या नीरव या चौकशी के आसपास रिहाइश ढूंढ ली जाए । बहरहाल फिलिम पर लौटते हैं ।

● #राजकुमार_राव हाल के दौर में खुद की अभिनय क्षमता को साबित करने वाले गैर चिकने चुपड़े अभिनेता हैं । शाहिद, न्यूटन, काई पो चे से होते हुए स्त्री तक की उनकी यात्रा हर फिल्म में नया निखार सामने लाई है । एक सीन में तो उन्होंने शाहरूख खान को जीया है ; उनसे कुछ बेहतर ही ।

● #श्रध्दा_कपूर को और अधिक फिल्में मिलनी चाहिए । उनमें लावण्य, अभिनय और परफॉर्म करने का धीरज तीनो हैं । अब शक्ति कपूर की बेटी भर होने की सजा उन्हें क्यों भुगतनी पड़ रही है ? यूं भी बॉलीवुड के निर्माता-निर्देशक इतने दूध के धुले कबसे हो गए ? और यूँ भी कि विज्ञान की कमाल की खोजों के बावजूद अभी तक ऐसी तकनीक या विधा कहां खोजी जा सकी है कि लोग अपना जैविक पिता चुन सकें ।

● चंदेरी की खूबसूरती ही अलग है । सिनेमेटोग्राफर #अमलेंदु_चौधुरी ने उसका भरपूर इस्तेमाल किया है । हॉरर और कॉमेडी दोनों ही परफेक्ट टाइमिंग मांगती हैं । इसके लिए जरूरी होती है एडिटिंग, जिसे #हेमंती_सरकार ने अच्छी तरह से किया है ।

● मगर फ़िल्म के बेहद प्रभावशाली कलाकार हैं पुस्तक भंडार वाले रुद्रा (#पंकज_त्रिपाठी) उन्हें देखकर लगता है कि जैसे वे चंदेरी में ही जन्मे, पले और बड़े हुए हैं । असली अभिनय वह है जो किया न जाये : बस हो जाये । विक्की के दर्जी पिता के रूप में #अतुल_श्रीवास्तव और दोस्त जना के रूप में #अभिषेक_बनर्जी ने अपने किरदारों को कुछ इसी तरह जीया है ।

● #क्या_फ़िल्म_डराती_है ?
मोटा मोटी नहीं ।

“स्त्री”बनी #फ़्लोरा_सैनी से ज्यादा डराता हैं भें-भें-भुइँ-पिन्न-कुऊँ ऊँ ऊँ -भड़ाक वाला बैकग्राउंड स्कोर मगर इन दोनों से भी भयास्पद असर छोड़ती है लहंगे का नाप देती और सामान्य संवाद बोलती असली वाली स्त्री श्रध्दा !!
● एक #फ्री_एडवाइज ; करीब 25 करोड़ रुपयों की लागत से बनी ये फ़िल्म हमारे जाने के पहले तक पांच गुना कमाई कर चुकी थी । बेहतर होगा कि निर्माता इस मुनाफे का दस फीसद चंदेरी की स्त्रियों के सशक्तीकरण के किसी ठोस काम मे खर्च कर दें ।

★★★★ वरना….. फिर स्त्री आएगी और कपड़े भर छोड़ जाएगी ।

(* हमारा पैसा यूँ भी जल्दी वसूल हो जाता है क्यूंकि फ़िल्म देखने हम यथासम्भव बुधवार को जाते हैं । उस दिन भोपाल के सिनेपोलिस, मल्टीप्लेक्स 6 दिन तक की लूट का प्रायश्चित करने के मूड में होते हैं और पौने दो सौ की टिकिट सौ में पड़ जाती है ।)

CG Basket

Related Posts

Leave a Reply

Create Account



Log In Your Account