यह कविता ‌उनके लिए नहीं है : गणेश कछवाहा .

Want create site? Find Free WordPress Themes and plugins.

   * गणेश कछवाहा

यह कविता
‌उनके लिए नहीं है
‌जो शब्दों को
‌सुने ,पढे बगैर
‌वाह वाह कर देते हैं।
‌पंक्तियों के
‌पूरा होने से पहले
‌तालियां बजा देतें हैं।

‌यह कविता
‌उनके लिए भी नहीं है
‌जो सीता को
‌कोठे पर दम तोड़ने,
‌राम रहीम को
‌चार दिवारी में कैद करने,
‌सरयू में खून घोलने,
‌इंसानियत का क़त्ल करने,
‌इबादतगाह को कब्रिस्तान बनाने
‌समाधि, तपस्या, उपासना स्थल को
‌राजनैतिक दंगल बनाने,
‌तिरंगे को बदरंग करने,
‌रात के अंधेरे में
‌किसी मकां को जलाने,
‌गांधी के बन्दरों के
‌हाथों को रक्त रंजिश करने की
‌साज़िश रचकर
‌अमन चैन की बात करते हैं।

‌यह कविता
‌ उनके लिए भी नहीं है
‌जो बच्चों की मुस्कान,
‌माँ के आँचल,
‌नव वधु के हाथों की मेंहदी
‌और बिटिया की मुस्कान छीनकर
‌गुलाबों की पंखुड़ियों को
‌कोट के बटन होल में लगाकर
‌प्यार और सौंदर्यता का
‌इज़हार करते हैं।

‌यह कविता उनके लिए भी नहीं है
‌जो लंगड़े से
‌उसकी बैसाखी छीनकर
‌चमचमाती कार में बैठकर
‌धूल उड़ाते तेज दौड़ने का
‌दम भरते हैं।
‌यह कविता उनके लिए भी नहीं है
‌जो ज़िंदा रहकर भी
‌मुर्दों की तरह
‌आंखें फाड़े स्थूल पड़े रहते हैं।

‌यह कविता उनके लिए है
‌जिनके कब्र को लोग नमन करते हैं।
‌जिनका कब्र
‌ एक इबादतगाह बन जाता है।
‌मरने के बाद भी
‌जो जिंदा रहते हैं।
‌वास्तव में यह कविता
‌इंसानियत की कविता है
‌इंसान के अलावा
‌और किसी के लिए भी
हो नहीं सकती।

**

गणेश कछवाहा

Did you find apk for android? You can find new Free Android Games and apps.

CG Basket

Next Post

"  स्त्री "     फिल्म समीक्षा :  ओ_स्त्री_रक्षा_करना !! : बादल सरोज

Fri Sep 14 , 2018
Want create site? Find Free WordPress Themes and plugins. 14.09.2018 | ग्वालियर  हिंदी फिल्मों की अन्य विशेषताओं के साथ एक खासियत यह भी है कि वे ढंग-ढोर से डरा भी नही पाती । भय पैदा करने का पूरा जिम्मा बैकग्राउंड म्यूजिक पर होता है जो भें-भें-छुन्न-भड़ाक करके डराता कम है […]

Breaking News