🍀 नथमल शर्मा की छ: कवितायें .

 

नथमल शर्मा छतीसगढ के वरिष्ठ पत्रकार ,ईवनिंग टाईम्स सांध्य दैनिक के संपादक ,लंबे समय से देशबन्धु बिलासपुर का संपादन .प्रगतिशील लेखक संघ छतीसगढ  और इप्टा में लगातार सक्रिय साहित्यकार और कवि है .वे कवितायें कम लिखते हैं  लेकिन लगातार लिखते हैं . उन्हें सुनना संवेदनशील होने जैसा है .यह कवितायें आज नवभारत में छपी हैं ,हमारे आग्रह पर उन्होंने सीजी बास्केट को भेजी हैं .

  1 बेंट

दिल्ली के गोलघर में 

रखी कुल्हाड़ियों ने

ले लिया है 

जंगल काटने का फैसला 

उन्हीं कुल्हाड़ियों ने

जिनमें बेंट लगाकर 

हमने कुल्हाड़ी होने की

कूबत दी।

  2  पृथ्वी

 

मैं

पृथ्वी की पीठ पर बने

खून के धब्बे

पोंछना चाहता हूं

पहले पीठ के ही धब्बे

क्योंकि

लहू-लुहान हो चुकी

पृथ्वी का सामना

मैं नही कर पा रहा हूं

चल रहा हूं

अभी अपनी पृथ्वी के

पीछे-पीछे ही

उसकी छांव पड़ रही है

सुकून मिल जाता है

लेकिन फिर जब

नज़र जाती है

पृथ्वी की पीठ

लाल/लहू से लाल

दिखती है

अपना गमछा लेकर

पोंछ देना चाहता हूं

वे सारे धब्बे पीछे से ही

पूछता हूं पृथ्वी से

तुम्हे दर्द नहीं होता क्या ?

मुस्कुराते और कराहते हुए

कह रही है

सामने आओ तो बताऊँ

 

             

    4 शिखा

 

कुछ लोगों को याद ही होगा

चाणक्य का वह ज़माना

जब चन्द्रगुप्त राजा नही बना था

और

खुली ही थी कौटिल्य की शिखा

उसी ज़माने में

विजेता का पर्याय बनता सिकन्दर

बिना लड़े ही लौट गया था

पाटलिपुत्र की सीमा से

सिकन्दर जीता था

या हार स्वीकार कर 

लौट गया था

अब इस सवाल का

भला क्या मतलब हो सकता है

लेकिन इतिहास से जवाब तो

हमको मांगना ही है

तुमको लगता नहीं कि

सिकन्दर डर कर लौट गया था

आज सब तरफ सिकन्दर है

पर कौटिल्य न जाने कहां ?

अब कोई हिम्मत नहीं करता

भरे दरबार में जाकर

कंचुकी से खेलते

विलासी राजा के हाथ पकड़ ले

और ऐसे अपराध के लिए

देश निकाला की सजा मिलने पर

खोल दे शिखा

अब तो लोग हर वक़्त

इस डर से बचते घूम रहे हैं

कि पता नहीं कौन कहां

लेकर आ जाये मठा

फिर भी डरकर जीने के बजाय

प्यार से जीने की हिम्मत

तो जुटा ही सकते हैं कुछ लोग

वैसे वो दूर, बहुत दूर

कुछ उड़ता देखकर तुम

भ्रमित हो रहे हो

वो कौटिल्य की 

खुली शिखा नहीं है।

 5 भगवान

कमली सोकर उठी है

वैसे रात भर नींद ही कहां आई

आंगन में आ चुका है

धूप का एक टुकड़ा

छेनी-हथौड़ी की आवाज़ें आ रही है

कई दिनों से कमली देख रही है

एक चट्टान को रूपायित होते हुए

पिता कहते हैं

भगवान बना रहा हूं

जिस दिन बन जाएंगे भगवान पूरे

और पूजे जाएंगे

उस दिन आएगा

अपने घर में अनाज

सोचती है कमली 

इतनी देर से क्यों बनते हैं भगवान ?

**

_

    6 खेत/हंसना-रोना

खेत का चित्र

कौन बना सकता है ?

तस्वीर कौन खींच सकता है

खेत की ?

कट चुकी बालियों के बाद 

खेत को हंसते/रोते देखा है तुमने ?

जो छोटे-छोटे ठूंठ बचे रह गए

उनके बिल्कुल पास / आस-पास

बचे रह गए दानों को

बीनने आती चिड़िया

चोंच में भर-भर ले जाती

ये दाने

उसके नन्हे को देंगे जीवन

देखते हुए

खेत हंसता है

और हां, बंट गया है खेत

भाई तुमने अपना हिस्सा

तुरंत ही बेच दिया ?

बनने लगा उस पर मॉल

वहां अब कभी नहीं आएगी चिड़िया

रोटा है खेत इसलिए

लेकिन पड़ोस के बच गए

हिस्से को देख

फिर हंसता है खेत

ऐसा चित्र बनाओगे क्या चित्रकार ?

  नथमल शर्मा

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