सुप्रीम कोर्ट भी मुंह पर लगाए ताला !:आजाद भारत के इतिहास में मोदी सरकार ने एक और अनहोनी की.

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11.08.2018

आजाद भारत के इतिहास में मोदी सरकार ने एक और अनहोनी की। मोदी सरकार ने दो टूक अंदाज में सुप्रीम कोर्ट से कहा कि गवर्नेंस के खिलाफ बोलने से वह अपने को रोके! हां, सरकार ने अपने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल के जरिए दो टूक शब्दों में जजों से कहा कि वे सरकार की आलोचना नहीं करें। जजों को समस्याओं के हर पहलू का पता नहीं होता है। इसलिए बोला न करें, टिप्पणियां न करें। आप लोगों को समझना चाहिए कि आदेशों का असर होता है। कोर्ट के आदेशों के चलते रोजगार खत्म हुआ है। विदेशी निवेश रूका। सरकार की आमदनी खत्म हुई।

यही नहीं अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने जजों को आगे कहा – आप लोगों ने कोयला खानों, 2जी तरंगों पर जो फैसले दिए उससे खनन, दूरसंचार, कोयला क्षेत्र का भट्ठा बैठा। जनहित की इन याचिकाओं पर आपने जो किया उससे सरकार की रेवेन्यू घटी। 2जी, कोयला ब्लॉक आदि के लाइसेंस रद्द करने के फैसलों से विदेशी निवेश पर बुरा असर हुआ। कोयले की कमी हुई। कोयले के दाम बढ़े। सो, ऐसी जनहित याचिकाओं पर विचार करने से पहले आप लोगों को बजटीय व्यवस्था पर बुरे असर की भी सोचनी चाहिए।

क्या यह सब रोंगटे खड़े करने वाला, सुप्रीम कोर्ट को नासमझ बतला देश विरोधी करार देना नहीं है? एक झटके में नरेंद्र मोदी सरकार ने देश को बतलाया कि मनमोहन सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ 2जी व कोल ब्लॉक के मामले फालतू थे। सुप्रीम कोर्ट ने बेजा ऐसे फैसले सुनाए, जिससे सरकार की रेवेन्यू घटी। विदेशी निवेश और रोजगार पर बुरा असर हुआ। याद रखें कि निचली अदालत 2जी के मामले में फैसला दे चुकी है कि अदालत में सरकार घोटाला प्रमाणित नहीं कर पाई और सभी आरोपी बाइज्जत आरोपमुक्त किए जाते हैं।

सो, निचली अदालत का वह फैसला और अब सुप्रीम कोर्ट में अटॉर्नी जनरल का सुप्रीम कोर्ट से कहना कि आपके लाइसेंस रद्द करने के आदेशों से देश का भट्ठा बैठा है तो क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि नरेंद्र मोदी व भाजपा ने आकाश, पाताल, जमीन के घोटाले की बात करते हुए मनमोहन सरकार को भ्रष्टाचारी बताने का जो हल्ला किए हुए थे वह झूठा था। तभी अदालत में उनकी सरकार जहां 2जी मामले को घोटाला प्रमाणित नहीं कर पाई तो सुप्रीम कोर्ट में भी यह कह दिया जा रहा है कि आप जज लोगों ने वो फैसले सुना कर देश को बरबाद किया। निवेश, रोजगार, रेवेन्यू, बजटीय व्यवस्थाओं का भट्ठा बैठा!

जाहिर है यह एप्रोच सुप्रीम कोर्ट और उसके जजों को गैर जिम्मेदारना, नासमझ बता कर उसी तरह उन्हें देश का दुश्मन बतलाना है, जैसे पिछले चार सालों में बात बेबात मीडिया को, आलोचकों को, विरोधियों की बोलती बंद कर उन्हें राष्ट्र विरोधी, गद्दार जतलाया गया।

सोचें कि यह कहना किस मनोदशा का प्रमाण है कि जज को सरकार की आलोचना नहीं करनी चाहिए? वे जनता के हित में आई याचिकाओं पर तीखी टिप्पणियां करने से बचें। याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान टिप्पणी करके हेडलाइन न बनवाएं! जाहिर है अटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल की दलीलों का सीधा अर्थ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी मीडिया टीम की मीडिया मॉनिटरिंग में पैदा यह परेशानी है कि सुप्रीम कोर्ट के जज हर दिन कुछ न कुछ बोलते रहते हैं और सरकार विरोधी हेडलाइन बनाते हैं तो इन्हें भी रोको। जैसे संपादकों, मीडिया संस्थाओं को अपनी तह समस्या-खबर उजागर करने की हेडलाइन बनाने से रोक दिया है वैसे ही इन जजों को भी हैसियत बतानी चाहिए। तभी केके वेणुगोपाल जैसे सुलझे, वरिष्ठ वकील के भी मुंह से यह वाक्य निकला कि हर दिन मैं आपके टिप्पणियों को पढ़ता हूं। लेकिन एक जज सभी समस्याओं के सभी पहलुओं को नहीं जानता है।

जाहिर है ‘हर दिन’ वाली यह परेशानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी मीडिया टीम की है। वेणुगोपाल ने तो पूरा करियर सुप्रीम कोर्ट में जजों को टिप्पणी करते, सुनते हुए और हर दिन हेडलाइन बनते देखा है। उन्होंने भी पहले सरकार की आलोचना को लोकतंत्र की जरूरत, कार्यपालिका पर अंकुश माना होगा। लेकिन अब क्योंकि वे सरकार की तरफ से हैं तो उनसे सुप्रीम कोर्ट के जजों को यह मैसेज हुआ कि मुंह पर ताला लगा कर बैठें। सीधा अर्थ है कि जजों का कहा, उनकी टिप्पणियां भी सरकार की बरदाश्त की सीमा से बाहर हो रही हैं। तो उस दिन की कल्पना भी अब कर सकते हैं जब सरकार विरोधी टिप्पणी करने वाले जजों के खिलाफ गोदी मीडिया में यह नैरेटिव बनने लगे कि फलां जज को क्या समझ है कि हाईवे के किनारे के शराब ठेकों को बंद करने से कितने बेरोजगार हुए और सरकार को कैसे रेवेन्यू का इतना भारी नुकसान हुआ जो सीमा पर तैनात सैनिकों को तनख्वाह देने में भी मुश्किल होने लगी है और यह जज तो राष्ट्रद्रोही व पाकिस्तान का एजेंट!

यह बाल की खाल नहीं है। आने वाले वक्त में ऐसी हकीकत भी संभव है। अपना दिमाग भन्ना गया यह सुन कर जो वेणुगोपाल ने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन के लाइसेंस को रद्द करने से देश को हुए नुकसान के साथ हाईवे के पांच सौ मीटर के दायरे में शराब की बिक्री पर पाबंदी वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश के हवाले कहा कि इससे लोगों की नौकरियां चली गईं! इसके साथ वेणुगोपाल ने यह भी कहा कि भारत विकासशील देश है। बजट में पैसा आवंटन एक सेक्टर की कीमत पर दूसरे सेक्टर में होता है। सरकार को पहले ऐसे लोगों को देखना होता है जो गरीब हैं व हर दिन सिर्फ सौ रुपए कमाते हैं। इसलिए कोर्ट फैसलों से पहले पीआईएल से बजट पर होने वाले असर के बारे में भी सोचा करे।

सोचें, सुप्रीम कोर्ट के जजों को मोदी सरकार ने खम ठोंक बताया कि आप लोगों की समझदारी पर शक है। सरकार महान है और उसके काम में बाधा न आने दी जाए। उसे जवाबदेह नहीं बनाया जाए। फिर भले मामला भ्रष्टाचार का हो या किसी भी तरह के जनहित का।

मतलब सुप्रीम कोर्ट, उसके जजों को नशाबंदी जैसे सामाजिक सरोकारों की चिंता नहीं करके धंधे, सरकार के रेवेन्यू को प्राथमिकता देनी चाहिए। यह तर्क अपने आप में भाजपा, संघ परिवार के चाल, चेहरे, चरित्र और उसकी संस्कार भारती जैसी बातों पर ऐसा थप्पड़ है कि इन्हे शर्म से चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। यदि ऐसी ही दलीलों से गवर्नेंस, रेवेन्यू है तब तो हाईवे के किनारे वेश्यावृति के कोठे बने, जुआघर बने तो मोदी सरकार में यह सब इसलिए जायज व जरूरी होगा क्योंकि इनसे धंधा बनता है, रोजगार और विदेशी निवेश हो सकता है!

जानें कि सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार की तरफ से जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस दीपक गुप्ता की उस बेंच के सामने बुधवार को नसीहत तब थी जब यह बेंच विधवाओं, बच्चों और कैदियों के अधिकारों के जनहित मामले पर विचार कर रही थी।

तभी सरकार की दलीलों पर जस्टिस लोकुर ने जवाब देने में कोताही नहीं बरती। कहा -हम भी इस देश के नागरिक हैं और हम देश के सामने मौजूद समस्याओं को जानते हैं। वे हर बात के लिए सरकार की आलोचना नहीं कर रहे हैं। जस्टिस लोकुर ने आगे कहा- हम यह स्पष्ट कर रहे हैं कि हमने हर चीज के लिए सरकार की आलोचना न तो की है और ना ही कर रहे हैं। कृपया यह माहौल मत बनाइए कि हम सरकार की आलोचना कर रहे हैं और उसे उसका काम करने से रोक रहे हैं। आप अदालत के सकारात्मक निर्देशों की ओर भी देखिए।

जस्टिस लाकुर ने सरकार की दलीलों पर आगे कहा- आप बजट पर फैसलों के प्रभाव की बात करते हैं तो सरकार ने अब तक क्यों नहीं निर्माण मजूदरों के लिए सेस से एकत्र 30 हजार करोड़ रुपए व ओड़िशा, कर्नाटक गोवा में अवैध खनन के जुर्माने जैसी विभिन्न मदों से एकत्र एक लाख 50 हजार करोड़ रुपए के फंड का इस्तेमाल किया? आपने उसका क्या उपयोग किया? लैपटॉप खरीदने में किया, जबकि निर्माण मजदूर अशिक्षित है। वाशिंग मशीनें खरीदवाईं जबकि पहनने के कपड़े नहीं हैं!

जस्टिस लोकुर ने यह भी कहा कि यदि सरकार अनुच्छेद 21 पर कोर्ट की दखल नहीं चाहती है तो अफसरों से काम कराए वरना अनुच्छेद 21 (नागरिकों के जीने के अधिकार और आजादी) तो रहेगा और अदालत उस पर अमल करवाएगी। क्यों नहीं अभी तक मनरेगा व खाने के अधिकार के लिए संस्थागत ढांचा बना है? कहां हैं ये संस्थाएं? पहले अधिकारियों (शासन) से काम कराएं!

और जब जज की यह फटकार हुई तो अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल का रोना हुआ कि सरकार सातवें शिड्यूल की सूची-दो के मामले में इसलिए असमर्थ है क्योंकि ये मामले राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र के हैं। जेल सुधार जैसे मामलों में केंद्र सरकार महज निर्देश दे सकती है।

यह सुन जस्टिस लोकुर का फिर कहना था – हमने राज्यों को भी बार-बार निर्देश दिए हैं। और इस सब पर सुबह ऑनलाइन सर्च में दिखी हेडलाइन, सुर्खियां थी – ‘केंद्र सरकार ने कोर्ट से कहा- टिप्पणियां करने में संयम बरतें’। ‘बेजा टिप्पणी करने से बचें जज’। ‘सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा- बेजा टिप्पणी से बचें’, ‘जजों को हर समस्या के पहलू का नहीं होता पता’! -मतलब पूरा जोर सुप्रीम कोर्ट को नसीहत देने का, सरकार के पक्ष का। तभी तो गवर्नेंस का आज मतलब है हेडलाइन मैनजमेंट!

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