विभाजन के वक्त देखा क्रूर साम्प्रदायिक यथार्थ,:  “तमस और भीष्म साहनी ”  और अपने वक्त की तमस रचने का समय… : प्रलेसं इंदौर का आयोजन .

विभाजन के वक्त देखा क्रूर साम्प्रदायिक यथार्थ,:  “तमस और भीष्म साहनी ”  और अपने वक्त की तमस रचने का समय… : प्रलेसं इंदौर का आयोजन .

रिपोर्ट :  सारिका श्रीवास्तव

10 अगस्त 2018 / इंदौर 

 प्रगतिशील लेखक संघ, इंदौर इकाई द्वारा 8 अगस्त 2018, भीष्म साहनी के जन्मदिवस पर केनरिस कला वीथिका में बैठक आयोजित की गई।

प्रलेसं इंदौर इकाई के अध्यक्ष एस के दुबे ने भीष्म साहनी का परिचय देते हुए कहा कि भीष्म साहनी की रचनाओं में उस समय की विभीषिका, विभाजन के दंश और बढ़ती साम्प्रदायिकता की पीड़ा को इस बखूबी बयान किया है कि पाठक को लगने लगता है कि ये सब उसके आस-पास और अभी कुछ देर पहले ही घटित हुआ था।

जन अर्थशास्त्री जया मेहता ने भीष्म साहनी और उनकी पत्नी शीला साहनी के साथ शिमला में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज में बिताए गए वक्त को याद करते हुए कहा कि भले ही मेरा बहुत करीबी रिश्ता साहित्य से न रहा हो किन्तु मुझे उनके साथ लम्बा समय बिताने का अवसर मिला। वे बहुत संवेदनशील थे और साधारण प्रतिक्रियाओं पर भी बहुत गहराई से विचार किया करते थे। उनकी उपस्थिति इतनी शान्त, सहज और सौम्य रहती थी कि तमस पढ़ते हुए अनेक बार आश्चर्य होता है कि उसमें लिखे गए बहुत क्रूर यथार्थ के प्रसंग भीष्म जी जैसे शान्त व्यक्तित्व वाले व्यक्ति ने लिखे हैं। उन्होंने उनकी कम चर्चित कहानी “यादें” का वाचन किया। ये कहानी दो वृद्ध महिलाओं पर आधारित है जो बहुत अच्छी दोस्त रहीं और अरसे बाद मिल रही हैं। अपनी पुरानी स्मृतियों का स्मरण करतीं दोनों सखियाँ अपने बीते दिनों में डूबती-उतराती रहती हैं साथ ही पाठकों को भी अपने साथ भावनाओं से भिगोती रहती हैं। दो पुरानी पक्की दोस्त तथा वृद्ध महिलाओं का पुनर्मिलन इतने स्वभाविक और भावनात्मक तरीके से रचा है कि कहानी का पाठ करते हुए जया मेहता खुद भी रो पड़ीं।

कृष्णा सोबती के संस्मरण “हशमत की नजर में भीष्म साहनी” का पाठ किया सारिका श्रीवास्तव ने। जिसमें कृष्णा सोबती ने भीष्म के लेखनकर्म पर प्रकाश डालते हुए उनकी भावनाओं को उकेरा है। हशमत के जरिए कृष्णा सोबती लिखती हैं कि भीष्म का लेखन उनके भोगे गए अनुभवों का लेखन है। भीष्म मध्यवर्ग की खरोंचे, ज़ख्म, उसके दर्द और उसके ऊपरी खोल को छू-छूकर, अपने को उस भीड़ से अलग खड़ा कर लेते हैं और नए सिरे से अपनी पुरानी चिर-परिचित जमीन में उन्हें अंकित करने का निर्णय कर डालते हैं। सारिका ने कहा कि अंतर्मुखी स्वभाव के भीष्म साहनी की कलम बहिर्मुखी थी। उनकी रचनाओं से जो टीस उभरती है वो गहरे तक पैठ जाती है जिसकी चुभन जहन में बनी रहती है।

 

कार्यक्रम में “अमृतसर आ गया है” कहानी का पाठ भी किया गया। उस कहानी में रेल के डिब्बे में बैठे यात्रियों का उम्दा तरीके से चित्र खींचते हुए विभाजन की विभीषिका और उसका जनमानस पर पड़ता प्रभाव और उसके फलस्वरूप घटित होते घटनाक्रम को भीष्म साहनी ने इस तरह से रचा है कि पाठकों को उस डिब्बे में सवार एक यात्री की तरह ही महसूस होता है की वह उन परिस्थितियों से स्वयं ही गुजर रहा हो।

 

हिंदी की प्रोफेसर कामना शर्मा ने परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ये कहानी विभाजन के दौर को चित्रित और अंकित करती है। अनेक बार ऐसी परिस्तिथियाँ आती हैं जब जुल्म होते हैं और हम मूक दर्शक बने तटस्थ देखते रहते हैं, कोई हस्तक्षेप तक नहीं करते क्योंकि पूरे वातावरण में जिस तरह दहशत का वातावरण, भय और डर व्याप्त है उसने हमें स्वार्थी बना दिया है।

 

प्रलेसं के राष्ट्रीय सचिव मण्डल के सदस्य विनीत तिवारी ने भीष्म साहनी की आत्मकथा की कुछ अंश सुनाते हुए कहा कि भीष्म अपने बचपन के संस्मरण यूँ लिखते हैं जैसे किसी आम या साधारण से बच्चे की बात हो। वे कहीं भी अपने महत्त्वपूर्ण होने को नहीं जताते। संस्मरण के दूसरे दौर में बलराज साहनी की जीवन शैली और बीमार पड़े छोटे बच्चे(भीष्म साहनी) की असमर्थता, बड़े भाई से तुलना और बीमारी एवं छोटे होने के दंश को बड़ी सहजता से भीष्म साहनी ने स्वीकारते हुए लिखा है। जिसका पाठ करते हुए विनीत ने कहा भीष्म साहनी के जीवन पर बलराज साहनी का बहुत असर रहा है। जिसे भीष्म ने अपने संस्मरण में बड़ी सहजता से स्वीकार भी किया है।
तमस का उल्लेख करते हुए विनीत ने कहा तमस 1972-74 के दौरान लिखा गया था। इसके पहले पाकिस्तान के साथ दो युद्ध हो चुके थे और विभाजन के समय की साम्प्रदायिक भावनाएं फिर से भारतीय जनमानस में उभार पर थीं। उस समय की परिस्तिथियों ने ही भीष्म साहनी को विभाजन के वक्त देखे गए क्रूर, साम्प्रदायिक यथार्थ की याद दिलाई और उन्होंने तमस लिखा। तमस इसलिए सबसे विश्वस्नीय दस्तावेजों में से एक है। बटे हुए भारतीय समाज को एकताबद्ध करने के लिए उस वक्त की कांग्रेस को भी तमस जैसी किसी कृति की जरूरत थी। आज के दौर की साम्प्रदायिकता पिछले 70 सालों में बहुत बदल चुकी है और वह फासीवाद की और भी भयानक शक्ल अख्तियार कर चुकी है हमें इसका सामना करने के लिए अपने समय की तमस को रचना होगा।

परिचर्चा में अजय लागू, सुलभा लागू, प्रोफेसर जाकिर हुसैन, संजय वर्मा, जावेद आलम, अर्चिष्मान राजू, आदिल सईद, राजेश पाटिल, सौरभ ने भी शिरकत की।

**

CG Basket

Related Posts

Leave a Reply

Create Account



Log In Your Account