मुल्क : नैरेशन_में_झकास_कन्क्लूजन_में_उदास : बादल सरोज 

मुल्क : नैरेशन_में_झकास_कन्क्लूजन_में_उदास : बादल सरोज 

10.08.2018

#मुल्क फिल्म मुसलमानों के खिलाफ बनाये जा रहे जहरीले माहौल की विभीषिका को पूरी समग्रता के साथ उजागर करती है। किस प्रकार इस जहर ने पीढ़ियों पुराने रिश्तों, दोस्ती-यारियों, सुख-दुःख में साझेदारियों, तहजीबी और कौमी विरासत यहां तक कि पासपड़ोस तक के साझेपन को काफूर कर दिया है इसका ब्यौरा यह फिल्म बहुत गहराई तक जाकर देती है। फिल्म यदि यह बताकर कि कितना सारा खत्म किया चुका है और कितना कुछ दांव पर लगा है डराती है तो यह दिखाकर आश्वस्त भी करती है कि अभी सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है।

● फिल्म की कहानी एक पढ़े लिखे प्रगतिशील जीवन मूल्यों वाले मुस्लिम परिवार की कहानी है। ऐसा परिवार जिसके बड़े बेटे ने एक हिन्दू लड़की से शादी की । शादी के बाद भी अपना धर्म नही बदला । अब संतान पैदा करने को लेकर अपने पति से असहमत है क्योंकि वह बच्चे के पैदा होने से पहले ही उसका धर्म तय करने के पक्ष में नही है, और यही मसला हल करने अपने श्वसुर के जन्मदिन पर हिंदुस्तान लौटी है ।


● मगर यह फ़िल्म असल मे उनके छोटे बेटे के इस्लामिक कट्टरपंथियों के दुष्प्रचार में फंस कर आतंकी कार्यवाही अंजाम देने और उसके बाद पूरे परिवार की यातनाओं और यंत्रणाओं की कहानी है। इसकी बुनावट शानदार और सुनाने (दिखाने) का अंदाज रोचक है। यह फिल्म “(नो) थैंक्स टू इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी रेवोल्यूशन” समाज में व्यापक रूप से फ़ैल चुके खतरनाक इस्लामोफ़ोबिया को भी उजागर करती है।

● अदाकारी के हिसाब से फिल्म में कहीं झोल नहीं है। #ऋषि_कपूर को सवा सौ साल तक जीना चाहिये, क्योंकि जैसे जैसे वे बड़े हो रहे हैं वैसे वैसे उनकी एक्टिंग उत्कृष्टता के नए नए सोपान खोल रही है। इस फिल्म में एक रिटायर्ड वकील (मुराद अली मौहम्मद) का चरित्र उन्होंने कमाल से निबाहा है। किंतु फिल्म की नायिका आरती बनी #तापसी_पन्नू हैं, हर फ्रेम में पूरी तरह से जीती (lively) हुयी । तबस्सुम बनी #नीना_गुप्ता कलात्मक अभिनय के छोटे होते जाते बोरे की पुरानी चावल हैं। एसपी दानिश जावेद की भूमिका में #रजत_कपूर द्वन्द को निबाहते हुए भी हमेशा की तरह सहज हैं। सरकारी वकील संतोष आनंद बने #आशुतोष_राणा ने वह प्रभाव भलीभांति छोड़ा है जो लेखक-निर्देशक लाउड बना दिए गए उनके केरैक्टर में उनसे चाहता था।


● लेकिन इस फिल्म की मारक एक्टिंग बिलाल बने #मनोज_पाहवा की है। जितना कमाल का उन्हें करैक्टर मिला है उतनी ही कमाल की उनकी परफॉरमेंस है।

● संगीत हैईये नहीं या होगा भी तो सुनाई नहीं दिया ; टिपणियाँ भाइयों के गाये कबीर हैं, जिन्हे फिल्म में इस्तेमाल किया है। सिनेमेटोग्राफी में #इवान_मुलिगन ने बनारस की बसाहटों का सौंदर्य और जीवन जोरदार मुखरता से दिखाया है।


यह_सब_कहने_के_बाद यह कि ;

★ किसी अच्छी फिल्म, जिसे काबिल फिल्म समीक्षकों ने सराहा हो। जिसे आज के दौर की साहसी और जरूरी फिल्म बताया हो, की आलोचना करना , उसके एक महत्वपूर्ण अंश से असहमत होना , उसकी तर्कदिशा की अस्वीकृति में हाथ उठाना, जोखिम का काम है। मगर कई बार जोखिम उठाना भी चाहिए। “मुल्क” देखने के बाद लिखी जा रही ये पंक्तियाँ इसी तरह की जोखिम हैं। जाहिर है कि इनसे भी असहमत हुआ जा सकता है।

★ फ़िल्म व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी और अन्य तरीकों से – कारपोरेट की गोद मे बैठे एक विघटनकारी गिरोह द्वारा फैलाये गये उथले और विषाक्त हिन्दुत्वी रेटोरिक और उसके प्रभाव – जो अदालत में ऐसी नजीरों पर लगने वाले ठहाकों यहां तक कि एकाधिक बार जज तक के रेस्पॉन्स में दिखाया गया है – को जिस बेबाकी से प्रस्तुत करती है, उतनी बेबाकी और फैक्चुअल, तार्किकता और संजीदगी उसके काउंटर आर्गुमेंट, काउंटर नैरेटिव में नहीं है ।

● जहर का उतार भावनात्मक स्टेटमेंट से किया गया है । यह फ़िल्म के पर्दे और उसके बिना विवाद में फंसे चलने के लिहाज से ठीक हो सकता है । उस मकसद के साथ न्याय नही है जिसके लिए यह फ़िल्म बनाई जाने का दावा किया गया है ।

● जैसे, किसी बिलाल को अपनी बेक़सूरी रिरिया के क्यों साबित करनी पड़ेगी ? किसी जावेद अहमद को अपनी निष्ठा शाहिद को जिंदा पकड़ने की बजाय उसे मारकर ही साबित क्यूँ करनी पड़ेगी ।……. किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है .

ऐसे “जैसे” और भी हैं :

● जैसे आतंकवाद सिर्फ एक फिरके की समस्या नही है । फ़िल्म आतंकवाद की कानूनी परिभाषा सुना कर रह जाती है । लेकिन उस परिभाषा के उदाहरण/साइटेशन – जो इफरात में हैं – नही देती । जैसे अदालत अपने फैसले में बच्चों पर ध्यान देने की हिदायत भी सिर्फ किन्हें देती है ? फ़िल्म भारतीय समाज मे डोमिनेंट आतंकी भटकाव को पिन पॉइंट नही करती । उसकी ओर इंगित तक नही करती .

● यहां #अनुभव_सिन्हा एक तरह से डोमिनेंट नैरेटिव के साथ एडजस्ट करते हुए दिखते हैं । लगता है अपना असंदिग्ध हिंदुस्तानीपन साबित करने के लिए निर्माता और निर्देशक भी बिलाल और जावेद अहमद सिंड्रोम से ग्रस्त हैं । यह आज के समाज का खतरनाक सच है .

● इस तरह देखे जाने काबिल यह फ़िल्म प्रस्तुति और नैरेटिव में जितनी ताकतवर है निष्कर्ष और कन्क्लूजन में उतनी नही ।

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