अंतरराष्ट्रीय मूल निवासी दिवस (9 अगस्त) के अवसर पर : अंतर्राष्ट्रीय और अखिल भारतीय स्तर पर आदिवासियों की दशा और दिशा : तुहिन

 

प्रस्तावना

– संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 1994 में विश्व के मूल निवासियों के लिए 9 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय दिवस घोषित किया। यह तय हुआ कि 1995-2004 के बीच अंतर्राष्ट्रीय मूल निवासी दशक के दरम्यान प्रति वर्ष 9 अगस्त अंतर्राष्ट्रीय मूल निवासी दिवस के रूप में मनाया जाए। 2004 में महासभा ने ’’कार्य और महत्ता के दशक’’ के रूप में 2005- 2015 के बीच दूसरा अंतर्राष्ट्रीय मूल निवासी दशक मनाने की घोषणा की। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुमान के अनुसार दुनिया के 70 देशों में करीब 370 मिलियन मूल निवासी (आदिवासी) निवास करते हैं। और यह विश्व की कुल जनसंख्या के 6 प्रतिशत से कुछ कम है तथा 72 देशों में 5000 अलग-अलग शाखाओं से ताल्लुक रखते हैं। विश्व की प्राचीन सभ्यताओं का निर्माण मूल निवासियों ने किया था। इनमें से कुछ अत्यंत विकसित थे जैसे कि मेक्सिको, पेरू और दक्षिण व मध्य अमरीका के माया, इन्का व एजटेका सभ्यता थे और ऐसे भी समुदाय हैं जो किसी भी प्रकार के बाहरी प्रभाव से खुद को अलहदा रखते हैं जैसे कि अंडमान द्वीपसमूह के सेंटिनेल और जारवा समुदाय। बहुत सारे मूल निवासियों के समुदाय इस पृथ्वी से विलुप्त हो चुके हैं, कई समूह विलुप्ति की कगार पर हैं तथा कई समूह बदलाव की विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजर रहे हैं।

 

उपनिवेशवाद की निर्ममता के शिकार –

मध्ययुग में यूरोपियन उपनिवेशवाद जब पूरी दुनिया में अपना पैर जमाने लगा तो एशिया, अफ्रीका, दक्षिण अमरीका और आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा। क्रिस्टोफर कोलंबस द्वारा अमरीका की खोज के बाद यूरोपियन उपनिवेशवादी ताकतें विशेषकर स्पेन, पुर्तगाल, हालैंड (डच) ब्रिटेश, डेनमार्क, फ्रांस, बेल्जियम आदि अमरीका महादेश को आबाद करने के नाम पर अफ्रीकी महादेश से जहाज भर-भर कर अफ्रीकी मूल निवासियों को बलपूर्वक अमरीका ले गए। यूरोपियन उपनिवेशवादी ताकतों ने अफ्रीका में गांव के गांव जलाकर व बर्बर तरीके से जबरदस्ती अफ्रीका (जहां पर कि पृथ्वी की प्रथम मानव सभ्यता का प्रकाश फैला था) के लोगों को उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका में ले जाकर गुलाम बनाया। अफ्रीका के मूल निवासियों के गुलाम व्यापार से यूरोपियन उपनिवेशवाद फलता-फूलता रहा। अमरीका को जिन लोगों ने अपने खून पसीने से सींचा, आबाद किया, आज भी वे अफ्रीकी-अमरीकी, अमरीका में दूसरे दर्जे के नागरिक हैं तथा नस्लवादी रंगभेद नीति का सबसे ज्यादा शिकार हैं। भले ही अमरीका में गुलाम प्रथा का कानूनी रूप से विलोप हो गया हो लेकिन अब भी वे वहां सबसे ज्यादा गरीब, बदहाल, बरोजगार, हिंसा के शिकार, मानवाअधिकारों से वंचित सबसे ज्यादा तादाद में जेल में बंद हैं।

एक तरफ तो उत्तर अमरीका में अफ्रीका के मूलनिवासियों पर गुलामी थोपकर अमानवीय शोषण किया गया, तो दूसरी ओर दक्षिण अमरीका (लैटिन अमरीका) में वहां के मूल निवासियों माया, इन्का, एजटेका आदि रेड इंडियन समुदाय का समूल विनाश कर दिया। पेरू में क्रूर स्पेनीय सेनापति पिजारो ने सोने के खजाने की लालच में आदिवासी राजा अताहुआल्पा समेत असंख्य आदिवासियों की निर्मम हत्या की। यह कहा जाता है कि दक्षिण अमरीका में यूरोपीयन सभ्यता, रेड इंडियन मूल निवासियों के खून और मांस के लोथड़ों की बुनियाद पर पनपा है। दक्षिण अमरीका में हाइती पर फ्रांस तथा ब्राजील पर पुर्तगाल के आधिपत्य के अलावा समूचा महाद्वीप स्पेनी उपनिवेशवाद के कब्जे में रहा। उसी प्रकार अफ्रीका में ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, बेल्जियम व फ्रांस ने उपनिवेश बनाया तो एशिया के विभिन्न देशों को ब्रिटेन, फ्रांस, पुर्तगाल, अमरीका व हालैंड ने अपना उपनिवेश बना लिया। आॅस्ट्रेलिया में तो कैप्टन कूक द्वारा महाद्वीप की खोज करने के बाद, वहां के मूल निवासियों का खात्मा करके ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने ब्रिटेन के तमाम दागी अपराधियों को आस्टेªलिया में बसाकर यूरोपियन सभ्यता की नींव डाली।

पहले उपनिवेशवाद फिर पूंजीवाद के सर्वोच्च रूप साम्राज्यवाद के खिलाफ उपनिवेश की जनता, विशेष रूप से मूल निवासियों/आदिवासियों का प्रतिरोध संग्राम जारी रहा।

 

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवादियों ने उपनिवेशों में जनता के मुक्ति संघर्ष की तीव्रता तथा अपने संकट की घड़ी को देखते हुए दुनिया को लूटने की नयी रणनीति इख्तियार की। तमाम साम्राज्यवादी ताकतों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश साम्राज्यवाद के शक्तिहीन होने के कारण, विश्वयुद्ध में सबसे कम नुकसान उठाने वाली नयी साम्राज्यी ताकत अमरीका को अपना नेता माना। अतः अमरीका के नेतृत्व में सभी साम्राज्यवादी ताकतों ने पुराने किस्म के उपनिवेशवाद की जगह, प्रत्यक्ष नियंत्रण की जगह अप्रत्यक्ष नियंत्रण वाली नवउपनिवेशवादी रणनीति को अपनाना शुरू किया। इसके तहत् एशिया, अफ्रीका व दक्षिण अमरीका में साम्राज्यवादियों ने अपने पुराने उपनिवेशों में दिखावे के लिए 1945 के बाद औपचारिक आजादी की घोषणा की और अपने पिट्ठूओं के हाथ सत्ता सौंप कर (जो कि साम्राज्यवादियों के देशीय दलाल पूंजीपति और सामंती भूस्वामी वर्ग के लोग थे) पर्दे के पीछे से नवउपनिवेशों की राजनीति, अर्थनीति, सामरिक नीति आदि पर नियंत्रण व हस्तक्षेप करने लगे। अपनी नवउपनिवेशवादी नीति के तहत् अब साम्राज्यवादी ताकतों को हमेशा बलपूर्वक सैनिक हस्तक्षेप या आक्रमण के जरिए (जैसा अमरीका द्वारा इराक, अफगानिस्तान या अन्य देशों में किया जाता है) गरीब, पिछड़े या विकासशील देशों पर कब्जा करने की जरूरत नहीं पड़ती बल्कि वे विश्वबैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.), विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.) और बहुराष्ट्रीय निगमों (एम.एन.सी.) के जरिए उपरोक्त देशों को लूट-लूट कर खोखला बनाते हैं।

 

मूलनिवासियों का प्रतिरोध –

इस नयी गुलामी के खिलाफ द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद तथाकथित उपनिवेश मुक्त दुनिया के प्रपंच का पर्दाफाश कर नवउपनिवेशवादी शासक वर्गों के खिलाफ जल-जंगल-जमीन पर अपने हक के लिए, सच्ची आजादी के लिए, समतावादी समाज की स्थापना के लिए मूलनिवासियों सहित समस्त उत्पीड़ित जनता का संघर्ष एशिया, अफ्रीका व दक्षिण अमरीका में जारी है। इसकी एक झलक हमें मिलती है बाॅलीविया देश में जहां कोचाबाम्बा नामक क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा भूमिगत जल के अंधाधुंध दोहन व व्यापारीकरण के खिलाफ, मूल निवासियों ने जबरदस्त आंदोलन किया। उस आंदोलन में मूल निवासियों के नेता थे उन्हीं के बीच के इवो मोरालेस। बाद में उस आंदोलन के प्रभाव से आम चुनाव जीतकर इभो मोरालेस बाॅलीविया के राष्ट्रपति बने। राष्ट्रपति बनकर सबसे पहले उन्होंने 1 मई 2006 को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के अवसर पर तमाम बहुराष्ट्रीय पेट्रोलियम कंपनी का राष्ट्रीयकरण कर अपने देशवासियों को मई दिवस का तोहफा दिया। इसके कारण उन्हें अमरीका और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का जबरदस्त विरोध झेलना पड़ा। लेकिन इससे उनका फैसला नहीं बदला। उन्होंने और वेनेजुएला के राष्ट्रपति दिवंगत ह्यूगो चावेज समेत दक्षिण अमरीका के कई राष्ट्राध्यक्षों ने मिलकर साम्राज्यवादियों (जिन्हें विकसित देश कहा जाता है)/बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रबल दबाव को झेलकर भी अपने देश के प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय जनसमुदाय का नियंत्रण कायम रखने तथा अपने-अपने देश की संप्रभुता को बरकरार रखने का प्रयास जारी रखा है। एक तरफ वो हैं और दूसरी ओर हम हैं जो अपने देश के हुक्मरानों को देखते हैं जो ’मेक इन इंडिया’ के नाम पर देश की प्राकृतिक संपदा समेत तमाम संसाधनों को साम्राज्यवादियों के हाथों लूटने के लिए और देश की संप्रभुता को दांव पर लगाने पर आमादा हैं।

भारत में आदिवासी – सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या में आदिवासी 8.6 प्रतिशत या 104 मिलियन हैं। भारत में आदिवासी/मूल निवासी कई समुदायों में विभिन्न राज्यों में विशेषकर छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, आंध्रप्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु, गुजरात, पश्चित बंगाल तथा उत्तरपूर्व राज्यों व अंडमान निकोबर में निवासरत हैं। देशभर में शासकीय आंकड़ों के अनुसार अलग-अलग राज्यों में निवास करने वाले 757 अनुसूचित जनजाति समुदाय के लोग हैं। भारत में आर्यों के आक्रमण के पूर्व मूलनिवासी आदिवासी एवं द्रविड़ समुदाय ही देश की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के जनक रहे हैं। विश्वप्रसिद्ध मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा की नगरीय सभ्यता भी इसमें शामिल है। सामंती युग में मौर्य काल से लेकर सल्तनत काल और ब्रिटिश हुकूमत के पूर्व तक आदिवासी समाज काफी हद तक जल-जंगल-जमीन पर अपना अधिकार कायम रख सका था। लेकिन 1757 में पलासी की लड़ाई में जीत के बाद भारत में ब्रिटिश राज की जड़ें जम गईं।

 

पलासी के युद्ध के बाद हिन्दुस्तान की दौलत को बरसाती नदी की तरह ब्रिटेन की तरफ मोड़ दिया गया। इस दौलत ने ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति पूरा करने में बड़ी मदद की। भाप के इंजिन, पावरलूम और बड़े पैमाने पर माल तैयार करने वाली मशीनों का आविष्कार हुआ। औद्योगिक क्रांति के पूरा होने पर ब्रिटेन के कारखानेदारों के सामने बाजार की समस्या खड़ी हो गयी। अपने कारखानों का माल बेचने के लिए उन्हें बाजार की जरूरत थी। हिन्दुस्तान के विशाल बाजार पर उनकी गिद्ध पड़ी। ब्रिटिश कारखानेदारों के लाभ के लिए जरूरी था कि भारत के उद्योगों को नष्ट कर उसे विशुद्ध खेतिहर देश बना दिया जाए। इसी के हित में 1793 में गवर्नर-जनरल लाॅर्ड काॅर्नवालिस ने ’जमीन का स्थायी बन्दोबस्त’ कर किसानों की बरबादी का एक नया कदम उठाया। इस बंदोबस्त के कारण जमीन पर किसानों का मालिकाना हक जाता रहा और नया जमींदार वर्ग पैदा हो गया, जो किसानों को किसी भी तरह का मुआवजा दिये बगैर उनकी जमीन का मालिक बन बैठा। इस जमींदार वर्ग को पैदा कर ब्रिटिश सौदागरों ने अपनी सरकार के सामाजिक आधार की सृष्टि की। ये नए जमींदार ब्रिटिश शासन के आधार स्तंभ बने। ’स्थायी बंदोबस्त कानून’ का सबसे बुरा प्रभाव देश के मूल निवासी आदिवासियों पर पड़ा और ब्रिटिश शासन तथा उनके देशीय दलाल भूस्वामी वर्ग और सूदखोरों के खिलाफ उनका आक्रोश आने वाले दो सौ बरसों तक यहां तक कि 1947 के बाद भी फूटता रहा। 18 सितंबर 1798 में लाॅर्ड काॅर्नवालिस ने इंग्लैंड में रिपोर्ट भेजी, ’मैं मजे में जोर देकर कह सकता हूं कि हिन्दुस्तान में कंपनी की भूमि (ईस्ट इंडिया कंपनी) का एक तिहाई अंश अब जंगल बन गया है, जिसमें सिर्फ जंगली जानवर रहते हैं।’ ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उसके देशीय दलालों ने आदिवासियों के न सिर्फ जल-जंगल-जमीन का अधिकार छीन लिया बल्कि उनसे उनकी आजादी को छीनकर उनकी ही जमीन पर उन्हें भूदास बनाने का प्रयत्न किया, जो आज भी विभिन्न रूपों में जारी है।

भारत के मूूल निवासियों/किसानों का प्रतिरोेध संघर्ष

प्रामाणिक रूप से कहा जा सकता है कि भारत का मुक्ति संग्राम जो अठारहवीं, उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी में ब्रिटिश शासन के खिलाफ था, उसका गौरवशाली और बड़ा हिस्सा मूल निवासियों या आदिवासियों का लगातार विद्रोह था। लेकिन ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उसके तलवे चाट कई भारतीय इतिहासकारों ने उपनिवेशवाद के प्रभाव से आदिवासियों की महान भूमिका को इतिहास में या स्कूल की पाठ्य पुस्तकों में वह स्थान नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे। बल्कि उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के द्वारा लालित-पालित कुलीन/अभिजात्य वर्ग के नेताओं को स्वतंत्रता संग्रामी कहकर प्रचारित किया जो सत्ताधारी वर्ग के लोग थे, वे कभी भी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई को निर्णायक स्तर पर नहीं ले गए, और कभी भी कोई बड़ा त्याग नहीं किया। उनके इसी समझौतावादी रूख के कारण ही पुरस्कारस्वरूप इन तथाकथित स्वतंत्रता संग्रामियों को अंग्रेजों ने 1947 में देश की सत्ता सौंप दी।

ब्रिटिश साम्राज्यियों और उनके सेवक इतिहासकारों ने भारतीय जनता के इन गौरवमयी संग्रामों पर यथाशक्ति परदा डालने की कोशिश की। साम्राज्यियों को भारत भूमि से मार भगाने की कोशिश करने वाले आदिवासी समाज के वीरों को उन्होंने डकैत, लुटेरा, हत्यारा आदि कहकर दुनिया की नजर में गिराने की कोई भी कोशिश बाकी न रखी। उनकी दृष्टि में फरेब, दगाबाजी, खुली लूट और डकैती का रास्ता अपना कर भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की बुनियाद मजबूत करने वाले क्लाइव, वारेन हेस्टिंग्स, डलहौजी जैसे लोग महान थे, लेकिन उनकी लूट-खसोट के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करने वाले वीर नारायण सिंह, गुंडाधूर, मजनू शाह, तीतूमीर, तीरथ सिंह, वेलू थंपी, सिद्धू-कानू-चांद-भैरव, रामसिंह कूका, टिकेन्द्रजित, तिलका मांझी, बिरसा मुण्डा आदि अपराधी थे, दंडनीय थे। मिथ्या, कुत्सा और कुप्रचार के इस परदे को फाड़ फेंकने की जिम्मेदारी इतिहासकारों और सच्चे देशभक्त बुद्धिजीवियों की है।

चुनिंदा विद्रोहों का संक्षिप्त विवरण –

1. सन्यासी विद्रोह (1763-1800) – बंगाल और बिहार में हुए इस विद्रोह से औपनिवेशिक
शासन के खिलाफ विद्रोह की शुरूआत हुई।

2. मेदिनीपुर के विद्रोह (1766-67) – बंगाल के मेदिनीपुर जिले के खैरा और मांझी नामक
आदिवासी समुदाय इस विद्रोह की प्रमुख शक्ति थे।

3. धलभूम का विद्रोह (1766-77) – बंगाल के धलभूम में हुआ मूल निवासियों का विद्रोह।

4. मोआमारिया विद्रोह (1769-99) – उत्तर असम के मोआमारिया संप्रदाय का विद्रोह।

5. चाकमा विद्रोह (1776-89) – पूर्वी बंगाल (अब बांगलादेश) के चटगांव की पहाड़ी जनजाति
चाकमाओं ने विद्रोह किया था।

6. पहाड़िया विद्रोह (1788-90) – यह विद्रोह बंगाल के तत्कालीन बीरभूम-बांकुड़ा जिले में
हुआ था।

7. चुआड़ विद्रोह (1798-99) – बांकुड़ा जिले के दक्षिण-पश्चिम और मेदिनीपुर जिले के उत्तर पश्चिम हिस्से में चुआड़ आदिवासियों ने बड़ा विद्रोह किया। इस विद्रोह ने सामन्त-जमींदारों-ब्रिटिशरों को इतना परेशान किया कि चुआड़ शब्द को बंगला में एक गाली (जो दुर्वृत्त और नीच के लिए प्रयुक्त होता है) के रूप में प्रयोग करना शुरू हुआ।

8. त्रावणकोर का स्वाधीनता संग्राम (1808-09) – केरल के त्रावणकोर में ब्रिटिश-विरोधी
विद्रोह के नेता वेलू थम्पी के नेत्त्व में हुआ मूल निवासियों का विद्रोह।

9. भील विद्रोह (1818-1831) – उत्तर में विंध्याचल से लेकर दक्षिण-पश्चिम में सहाद्रि या
पच्छिमी घाट तक का अंचल भीलों का पुराना वासस्थान रहा है। उनका विद्रोह विख्यात है।

10. हो आदिवासियों का मोर्चा (1820-21) – छोटा नागपुर (अब झारखंड) के सिंहभूम जिले में
’हो’ जनजातियों ने विद्रोह किया था।

11. राजस्थान का मेर विद्रोह (1820)

12. पागलपंथी विद्रोह (1825-33) – यह विद्रोह बंगाल के मैमनसिंह जिले के गारो और
हाजंग आदिवासियों का विद्रोह था।

13. गदाधर सिंह का विद्रोह (1828-30) – असम में ब्रम्हपुत्र घाटी का पहला विद्रोह।

14. खासिया विद्रोह (1829-33) – असम में लड़ाकू खासी आदिवासियों का विद्रोह।

15. सिंगफो विद्रोह (1830-31) – असम और बर्मा की सीमा के दोनों और रहने वाले सिंगफो
आदिवासियों ने विद्रोह किया था।

16. असम के अका आदिवासियों का विद्रोह (1829-38)

17. छोटानागपुर का कोल विद्रोह (1831-32)

18. कर्नाटक के कुर्गियों का मोर्चा (1833-34)

19. गोंड विद्रोह (1833) – पहले मध्यप्रांत आब उड़ीसा के संबलपुर क्षेत्र के गांेड आदिवासियों
का प्रबल प्रतिरोध।

20. असम-बर्मा के सीमा क्षेत्र का खामती विद्रोह (1839)

21. सुरेन्द्र साय का विद्रोह (1839-62) – संबलपुर क्षेत्र में गोंड विद्रोह (1833) के बाद भी सुरेन्द्र साय, अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासियों एवं अन्य शोषित किसानों को संगठित करते रहे और 1857 के महाविद्रोह के दौरान बगावत का झंडा बुलंद किया।

22. महाराष्ट्र के कोलियों का विद्रोह (1839-50)

23. मध्यप्रदेश के बंुदेलखंड के सागर, दमोह तथा जबलपुर में गोंड आदिवासियों का बुंदेला
विद्रोह (1842)

24. उड़ीसा का खोंड विद्रोह (1846)

25. असम के गारो लोगों का विद्रोह (1848-66)

26. असम के अबोरों का विद्रोह (1848-1900)

27. असम के लुशाई पहाड़ में रहने वाले लुशाइयों का विद्रोह (1849-92)

28. नागालैंड के नागाओं का मोर्चा (1849-78)

29. संथाल विद्रोह (1855-56) – महान संथाल विद्रोह को ’हूल’ भी कहते हैं। छोटानागपुर अंचल/बिहार/बंगाल में, पहले अमर शहीद बाबा तिलका मांझी फिर सिद्धू-कान-ू चांद-भैरव नामक चार भाइयों के नेतृत्व में मशहूर संथाल विद्रोह हुआ। जिसने झारखंड में अंग्रेजों की चूलें हिला दीं। संथाल विद्रोह में ’भगनाडिहि’ की लड़ाई बहुत प्रसिद्ध है।

30. 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम/महाविद्रोह मंे पूरे देशभर में मूल निवासियों की बड़ी भूमिका रही है। विशेषकर-झारखंड, बिहार, बंगाल, असम, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश और छत्तीसगढ़ में।

31. शहीद वीरनारायण सिंह का विद्रोह (1856-57) – महाविद्रोह की लपटें छत्तीसगढ़ (तब सीपी एंड बरार) तक पहंुची थी। रायपुर जिले के सोनाखान के वीर नारायणसिंह ने स्थानीय किसान जनता जो अकाल-भूखमरी से पीड़ित थी के साथ मिलकर अंग्रेजों और स्थानीय सूदखोरों के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किया। संबलपुर के विद्रोही नेता सुरेन्द्र साय के साथ इनकी मित्रता थी। कुरूपाट डोंगरी की जबरदस्त लड़ाई के बाद नारायण सिंह पकड़े गए और 1857 के 10 दिसंबर को उन्हें रायपुर में फांसी पर चढ़ा दिया गया। ठीक इसी समय रायपुर में ब्रिटिश फौज के अंतर्गत भारतीय सिपाहियों के विद्रोह का नेतृत्व मैगजीन लश्कर हनुमान सिंह ने किया। इस विद्रोह में सत्रह भारतीय सिपाही शहीद हुए (सभी तृतीय रेजीमेंट के थे)।

32. बंगाल, बिहार का नील विद्रोह (1860-61)

33. असम का जयन्तिया पहाड़ क्षेत्र का विद्रोह (1860-63)

34. त्रिपुरा, चटगांव का कूकी विद्रोह (1860-90)

35. असम में हुए कई विद्रोह (1861-94)

36. पंजाब में रामसिंह कूका के नेतृत्व में हुआ कूका विद्रोह (1869-72)

37. बंगाल के पाबना का किसान विद्रोह (1872-73)

38. आंध्रप्रदेश में गोदावरी जिले का रम्पा विद्रोह (1879-80)

39. मणिपुर में टिकेन्द्रजित का विद्रोह और शहादत (1891)

40. बिरसा विद्रोह (1899-1900) – बिरसा विद्रोह दरअसल बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुआ विद्रोह था। अंग्रेजों के छोटानागपुर/संथालपरगना टेनान्सी कानून के चलते जल-जंगल-जमीन से महरूम आदिवासी स्थानीय, जमींदार/महाजन तथा अंग्रेजी राज से बहुत कुपित थे। इस विख्यात विद्रोह को ’ऊलगूलान’ भी कहा जाता है। विद्रोह के दमन के पश्चात् रांची जेल में कैद बिरसा की मृत्यु 9 जून 1900 को हो गई। 3 बिरसापंथियों को मृत्युदंड दिया गया, 44 को अंडमान निकोबार में काला पानी और 47 को कड़ी सजा देकर अंग्रेजों ने विद्रोह का निर्मम दमन किया।

उपनिवेश विरोेधी संघर्ष मंे छत्तीसगढ़ के बस्तर का योगदान –

यह अत्यंत आवश्यक है कि हम उन भयंकर युद्धों की श्रृंखला को याद करें, जिन्हें बस्तर के आदिवासियों ने ब्रिटिश राज और सामंतो के खिलाफ 1774 से 1910 के मध्य लड़ा था।
(1) हल्बा विद्रोह (1774-1779)
(2) भोपालपटनम संघर्ष (1795) (यह विद्रोह न होकर विद्रोहभास था)
(3) परलकोट विद्रोह (1825)
(4) तारापुर विद्रोह (1825)
(5) पेरिया विद्रोह (1842-1863)
(6) महान मुक्तिसंग्राम (1856-57)
(7) कोई विद्रोह (1859)
(8) मुड़िया विद्रोह (1876) – यह विद्रोह बस्तर के इतिहास में प्रसिद्ध है।
(9) रानी चो रिस (1878-1882) (यह भी विद्रोह न होकर विद्रोहभास था)
(10) महान भूमकाल (1910) – गूंडाधूर के नेतृत्व में हुआ यह विद्रोह पूरे मध्य प्रांत के इतिहास में प्रसिद्ध है। विद्रोह को ब्रिटिश राज ने नागपुर तथा मद्रास की फौजी टुकड़ियों की मदद से निर्मम दमन कर कुचल दिया।

फिलहाल

नवउपनिवेशवादी व्यवस्था में भी आदिवासियों का संघर्ष, उपनिवेशवादी व्यवस्था के दौर की तरह जारी है। क्योंकि आज भी न तो जल-जंगल-जमीन पर उनका अधिकार स्थापित हुआ है। और न ही उन्हें देश की दूसरी आम जनता की तरह सच्ची आजादी या मुक्ति मिली है। देश की समूची जनसंख्या में मात्र 9 प्रतिशत होते हुए भी, एक के बाद सरकारों की तथाकथित विकासीय परियोजनाओं के चलते उनका विनाश हो रहा है और कुल विस्थापन में 56 प्रतिशत आदिवासियों का विस्थापन हो रहा है। कभी तथाकथित माओवाद को कुचलने के नाम पर हो या आदिवासियों द्वारा अपनी व्यथा को प्रकट करने की अभिव्यक्ति ’पत्थलगाड़ी आंदोलन’ को कुचलने के नाम पर हो या फिर अंबानी, अडानी, जिंदल या टाटा जैसे बड़े काॅर्पोरेट घरानों की पहल से किए जा रहे ’’विकास’’ की बात हो, कीमत आदिवासी जनता को ही चुकानी पड़ती है। वे ही सबसे ज्यादा दमन का विनाश का शिकार बनते हैं।

आज भी सबसे ज्यादा निरक्षर, अशिक्षित, बेरोजगार, बीमार, भूखमरी से पीड़ित, गरीब, भूमिहीन, खेतिहर मजदूर और जेलों में कैद तथा मानवाधिकार से वंचित मूलनिवासी या आदिवासी लोग ही हैं।

असल में विश्व मूलनिवासी दिवस के अवसर पर ऐसा महसूस होता है कि आज भी मूल निवासी भारत समेत तमाम देशों में काॅर्पोरेट/बहुराष्ट्रीय कंपनियों के राज के खिलाफ चहुंओर संघर्ष कर रहे हैं। इसका अर्थ तो यही है कि किसी भी सरकार के एजेंडे में चाहे वो कितने भी अच्छे दिन का दावा करें, आदिवासियों, दलितों, शोषितों, मेहनतकशों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों तथा उत्पीड़ित वर्ग का कल्याण प्राथमिकता क्रम में कहीं नहीं है। विभिन्न शासक वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाली राजनीतिक पार्टिया एवं उनकी सरकारों के एजेंडे में अति अमीरों को और भी अमीर करना, उनके बैंक बैलेन्स, उनकी संपदा को और भी बढ़ाना तथा उनकी पूंजी की सुरक्षा की पूरी गैरेन्टी लेना प्राथमिकता में है। इसलिए मूल निवासी शोषित, मेहनतकश वर्ग पहले से भी कही अधिक हाशिए में ढकेला जा रहा है।

संदर्भ-
1. भारतेर स्वाधीनता संग्रामः सुप्रकाश राय (बांग्ला)
2. भारत का स्वतंत्रता संघर्षः अयोध्या सिंह
3. बस्तर का इतिहासः राम कुमार बेहार
4. छत्तीसगढ़ का पहला किसान विद्रोह और वीर नारायण सिंह की वसीयतः शंकर गुहा नियोगी और हरि ठाकुर

 


संपर्क – तुहिन देब
मोबा- 095899-57708, 94255-60952
ई-मेल tuhindebchhattisgarh@gmail.com

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