नौ अगस्त आदिवासी नहीं मूलनिवासी अधिकार दिवस उत्तम कुमार, सम्पादक दक्षिण कोसल

9.अगस्त 2018

पत्रकार लिंगाराम कोडोपी का माने तो बीते दिनों पुलिस ने जिन 15 आदिवासियों को सुकमा में मुठभेड़ में मौत के घाट उतारने की बात की है वह गलत है | आदिवासी नेत्री सोनी सोरी ने भी इसे गलत ठहराते हुए ग्रामीणों से चर्चा करता वीडियो सोसल मीडिया में वायरल किया तथा अखबारों में इस झूठ से पर्दा उठाया है | उसी दिन राजनांदगांव में हजारों की संख्याओं में किसानों ने विरोध दर्ज किया | मुख्यमंत्री के विधान सभा क्षेत्र राजनांदगांव में करोड़ों का सब्सिडी किसानों को सौगात के रूप में बांटने के बाद जनाक्रोश सड़कों में फूट पड़ा | ये दोनों ही घटनाएं आसन्न 9 अगस्त मूलनिवासी अधिकार दिवस के पहले घटित हुआ है | संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1993 में मूलनिवासी अधिकार दिवस पर प्रस्ताव लाया और 1994 नें इसे सभी देशों पर लागू किया | इनके मानवाधिकार को लेकर घोषणा पत्र का निर्माण भी हुआ आगे चलकर बहुत काम हुए लेकिन विश्व का मूलनिवासी आज भी हासिए पर है |

आपको बता दूं बीते एक अप्रैल को विभिन्न राज्यों के आदिवासियों ने अपनी मांगों के समर्थन में दिल्ली में संसद का घेराव किया था | ये सभी घटनाएं नई नहीं है जब मूलनिवासियों को अधिकार मांगने पर गिरफ्तार, हत्या अर्थात मौत के घाट उतारा जा रहा हो | हमारी सरकार की नीति शुरू से ही विरोध का रहा है | उनका कहना है कि देश में मूलनिवासी रहते ही नहीं है | एेसा नहीं तो क्यों 1957 में संयुक्त राष्ट्र संघ के 107वें आईएलओ कन्वेन्शन में देश में आदिवासी होना बताकर 1989 में सम्पन्न 169वें आईएलओ में आखिरकार हमारे प्रतिनिधि संयुक्त राष्ट्र संघ में क्यों कर कहते कि भारत में आदिवासी नहीं है |

 

आज़ादी के बाद से ही हासिए में रह रहे लोगों कि आवाज मजबूती के साथ उठाने भाजपा और अन्य राजनीतिक दल आज तक असफल रहे हैं क्योंकि वे संविधान को कूड़ेदान में रख दिया है | इसी कड़ी में संविधान की 5वीं अनुसूची का कड़ाई से अनुपालन करने और जनजातीय समुदाय संबंधित अन्य मांगों के समर्थन में संसद सहित देश में विरोध प्रदर्शन हो रहा है |

आदिवासियों के लिए संविधान में 5वीं अनुसूची बनाई गई क्योंकि आदिवासी इलाके आज़ादी के पहले भी स्वतंत्र थे | वहां, अंग्रेज़ों का शासन-प्रशासन नहीं था | तब इन इलाकों को सानान्य नहीं माना जाता था | 1947 में आज़ादी के बाद जब 1950 में संविधान लागू हुआ तो इन क्षेत्रों को 5वीं और छठी अनुसूची में वर्गीकृत किया गया | जो पूर्णत: बहिष्कृत क्षेत्र थे उन्हें छठी अनुसूची में डाला गया | जिसमें पूर्वोत्तर के चार राज्य हैं- त्रिपुरा, मेघालय, असम और मिज़ोरम |

 

अंग्रेजों ने आदिवासी क्षेत्रों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया | वहां अंग्रेजों को आदिवासी विद्रोह का सामना करना पड़ा | उन्हीं क्षेत्रों को 5वीं अनुसूची में डाला गया | इसमें दस राज्य शामिल हैं, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और हिमाचल प्रदेश | संविधान में 5वीं अनुसूची के निर्माण के समय तीन बातें स्पष्ट तौर पर कही गईं- सुरक्षा, संरक्षण और विकास यानी आदिवासियों को सुरक्षा तो देंगे ही, उनकी क्षेत्रीय संस्कृति का संरक्षण और विकास भी किया जाएगा, जिसमें उनकी बोली, भाषा, रीति-रिवाज़ और परंपराएं शामिल हैं |

5वीं अनुसूची में शासन और प्रशासन पर नियंत्रण की बात भी कही गई है | ऐसी व्यवस्था है कि इन क्षेत्रों का शासन-प्रशासन आदिवासियों के साथ मिलकर चलेगा |
मतलब इन क्षेत्रों को 5वीं अनुसूची में एक तरह से विशेषाधिकार मिले, स्वशासन की व्यवस्था की गई | स्वशासन के लिए संविधान में ग्रामसभा को मान्यता दी गई है | जैसे कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग परंपराएं हैं |

 

इन प्राचीन कबीलाई व्यवस्थाओं में एक ढांचा था, कबीले का सरदार होता था, आपसी झगड़ों का निपटारा वे गांव में ही कर लेते थे | पुलिस थाना व्यवस्था तब नहीं होती थी | 5वीं अनुसूची में इसी व्यवस्था को ग्रामसभा के रूप में मान्यता दी और उसे ज़मीन बेचने और सरकारी अधिग्रहण संबंधी अधिकार दिए | अपनी भाषा, संस्कृति, पहनावा, रीति-रिवाज़ और बाज़ार की व्यवस्था तय करने का अधिकार मिला कि बाज़ार में क्या बिके, क्या न बिके? गांव चाहता है कि शराब न बिके तो नहीं बिकेगी |

 

नब्बे के दशक 1996 में 5वीं अनुसूची के परिदृश्य में पंचायत के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा) क़ानून बना | 5वीं अनुसूची में ग्रामसभा पारिभाषित नहीं थी | ग्रामसभा के साथ-साथ पंचायती राज व्यवस्था को भी जोड़ा गया | दोनों को गांव के विकास की ज़िम्मेदारी मिली | ये गांव की प्रशासनिक व्यवस्था हुई | ज़िले की प्रशासनिक व्यवस्था करने के लिए ज़िला स्वशासी परिषद को मान्यता दी | समस्या यहीं से है कि परिषद की बॉडी और नियमावली अब तक किसी राज्य ने नहीं बनाई कि उसमें कितने सदस्य हों, उनके काम क्या हों 

यह परिषद स्वायत्त है, मतलब कि इसके पास वित्त का भी प्रबंधन हो | संविधान के अनुच्छेद 275 में ट्राइबल सब-प्लान (टीएसपी) की व्यवस्था है, इसके तहत ऐसे क्षेत्रों के लिए अलग से बजटीय आवंटन होता है जिसका प्रयोग आदिवासियों के कल्याण और उनकी आर्थिक व सामाजिक बेहतरी के लिए होता है | ज़िला स्वशासी परिषद पैसा किस तहसील में, किस ब्लॉक में ख़र्च हो, यह तय करती है |

 

जब परिषद ही नहीं बना तो स्वाभाविक है कि टीएसपी का पैसा कहीं न कहीं डायवर्ट किया जा रहा है | वहीं, स्वशासन की कल्पना करते हुए जिस ग्रामसभा की बात की गई, वर्तमान में उसके द्वारा लिए गए निर्णय को शासन स्वीकार ही नहीं करता है |

अनुसुचित जाति ,जनजातियों के लिए प्रमुख सविधानिक प्रावधान –

अनुच्छेद 14 : विधि के समक्ष समता–राज्य भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नही करेगा |

अनुच्छेद 15 : धर्म, मूलवंश, जाति या स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध |

अनुच्छेद 15 :(4): शिक्षण संस्थाओं में (तकनीकी, इंजीनियर, मेडिकल समेत ) जनजाति वर्गों के लिए प्रवेश हेतु स्थानों को आरक्षित किया है, ताकि उनका शैक्षणिक स्तर ऊंचा हो |

अनुच्छेद 17 : इसके अंतर्गत जातिवाद को समाप्त करने का प्रावधान रखा गया है |

अनुच्छेद 23 : बेगार को प्रतिबंधित किया गया, गरीब होने के कारण जनजाति व्यक्ति बंधुआ मजदूर बनाते है | बंधुआ मजदूरी प्रथा (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 उनकी पहचान, मुक्ति एवं पुनर्वास के लिए बना हुया है |

अनुच्छेद 24 : 14 वर्ष से कम आयु के बच्चे किसी खान, उघोग अथवा खतरे वाले रोजगार में नियोजित नहीं होंगे | यह भी इन्ही कमजोर वर्गों के सामाजिक सुरक्षा हेतु है |

अनुच्छेद (25) (2) (बी) : सार्वजनिक हिन्दू धार्मिक संस्थाओं में प्रवेश की स्वतंत्रता |

अनुच्छेद 29 : यह अल्पसंख्यको के सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकारों को संरक्षण प्रदान करता है, जनजातीय कल्याण की दृष्टी से यह प्रावधान भी विशेष महत्व रखता है क्योकि देश के प्रमुख अल्पसंख्यक वर्गों में से जनजातियां भी प्रमुख है |

अनुच्छेद 46 : अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य दुर्लभ वर्गो में शिक्षा और अर्थ संबंधी हितो की अभिवृद्धि |

अनुच्छेद 243 (घ) : प्रत्येक पंचायत में अनुसूचित जनजाति के लिए स्थान आरक्षित रहेंगे और इस प्रकार आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात उस पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या से यथाशक्य वही होगा जो उस पंचायत क्षेत्र में अनुसूचित जनजातियो को जनसंख्या का अनुपात उस क्षेत्र की कुल जनसंख्या से है |

अनुच्छेद 243 (न) : ग्राम स्तर, खण्ड एवं जिला स्तर पर जनजाति की जनसंख्या के अनुपात में सदस्यों एवं जनजाति क्षेत्र में सरपंच, प्रधान एवं जिला प्रमुख के सभी पद जनजातियों के लिए आरक्षित किये गये है |

अनुच्छेद 244 (1) : राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रो एवं जनजातियों के लिये निर्धारित प्रशानिक प्रावधानों को संविधान की पांचवी अनुसूची में निर्दिष्ट करने की व्यवस्था की गई है |

अनुच्छेद 244 (2) : छठी अनुसूची-असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्य के जनजाति क्षेत्र के प्रशासन के बारे में उपबंध |

अनुच्छेद 275 : इसमे केन्द्रीय सरकार द्वारा राज्यो की जनजातीय कल्याण को बढ़ावा देने एवं इनके लिए प्रशासन की उचित वयवस्था करने के लिए विशेष धनराशी प्रदान करने की व्यवस्था है |

अनुच्छेद 330 : लोकसभा में अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए स्थानों का आरक्षण |

अनुच्छेद 332 : राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों का आरक्षण |

अनुच्छेद 335 : सेवाओं में पदों के लिए अनुचुचित जातियों वव जनजातियों के दावे |

अनुच्छेद 338 : राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग |

अनुच्छेद 339 : इसमे व्यवस्था की गई है कि संविधान लागू होने के दस वर्ष पश्चात अनुसूचित क्षेत्रो एवं अनुसूचित जनजातियों के विशेष प्रशासन की रिपोर्ट राष्ट्रपति के सम्मुख प्रस्तुत की जाये |

अनुच्छेद : 342 : इसमे राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है की वे राज्यों के राज्यपालों से विचार-विमर्श के बाद, प्रत्येक राज्य के जनजातीय समुदायों में से अनुसूचित जनजातियां तय करे |

अनुच्छेद 344 (1) : इसमे सलग्न पांचवी अनुसूची में राज्यपाल के लिए यह आवश्यक कर दिया गया है कि जब भी कहा जाय, अनुसूचित क्षेत्रो के प्रशासन की रिपोर्ट राष्ट्रपति को दे और उनका अनुदेश प्राप्त करे |

भारतीय संविधान के भाग 4 के अनुच्छेद 47 में राज्य का यह कर्तव्य माना गया है की जनजातियों की शिक्षा, उन्नति और हितो की सुरक्षा की और विशेष ध्यान दे |

उत्तर से लेकर दक्षिण बस्तर तक बड़े कार्पोरेटों को जमीन तथा खदीन सौंपे जा रहे हैं | 5वीं अनुसूची और वनाधिकार क़ानून के अनुसार, आदिवासी की ज़मीन ग़ैर आदिवासी को स्थानांतरित की ही नहीं जा सकती | फिर भी हज़ारों परिवार के संसाधन गैर आदिवासियोंं को सौंपा जा रहा है | हालांकि नान शेड्यूल एरिया में आदिवासियों को गैर कृषि जमीन बेचने में दिक्कत आ कही है | कांग्रेस और भाजपा कोई भी आदिवासियों के साथ नहीं हैं | कांग्रेस भी लंबे समय तक केंद्र और राज्य में सरकार में रही लेकिन आदिवासी तब भी ठगा गया |आगामी विधानसभा चुनावों में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी |

 

वनाधिकार क़ानून 2006 में दर्ज है कि कई सालों से जिस ज़मीन पर आदिवासी रह रहे हैं, खेती कर रहे हैं, उनको ज़मीन के स्थायी पट नहीं दिए जा कहे हैं |छत्तीसगढ़ के कवर्धा ज़िले में टाइगर रिज़र्व के नाम पर विस्थापन की योजना है | सरदार सरोवर बांध के नाम पर हज़ारों आदिवासी परिवार उजाड़ दिए | न उनको पुनर्वास मिला, न ढंग से मुआवज़ा. ज़मीन तो गई ही, जंगल भी गया | उनकी संस्कृति, जनजातीय इतिहास सब नष्ट हो गया |

आदिवासी को उठाकर शिविरों में रखा जा रहा है | आदिवासी का भी अपना एक भौगोलिक क्षेत्र होता है | उसे वहां से निकालकर पुनर्वास के नाम पर एक छोटी सी कोठरी थमा देते हैं | उवका जमीन संस्कृति, भाषा, सब-कुछ खत्म किया जा रहा है | आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है | संविधान ने उनका संरक्षण करने के लिए उन्हें सरकार को सौंपा था | सरकार तो उलटा उनका ख़ात्मा कर रही है | आदिवासियों की ज़मीन के नीचे अपार खनिज संपदा छिपी है | आदिवासी क्षेत्रों में ज़मीन के नीचे से सोना निकल रहा है, पेट्रोलियम पदार्थ की खोज हो रही है | ज़मीन के वे मालिक हैं लेकिन उनकी मिल्कियत का हक़ उन्हें नहीं मिलता | कानून से उन्हें इन खनिजों का कुछ प्रतिशत हिस्सा मिलना चाहिए, पर उनको वहां मज़दूर तक नहीं बनाया जा रहा | बस उनको भगाना चाहते हैं |

 

सुप्रीम कोर्ट का ही फैसला है कि जिसकी ज़मीन, उसका मालिकाना हक़. जिसका खनिज है, उसका मालिकाना है | वो नहीं दे रहे ना ही नौकरी ही मिलती है | आदिवासी को कुछ नहीं मिलता, उसका वजूद पूरी तरह मिटाया जा रहा है | 5वीं अनुसूची में आदिवासी को जनजाती कहा गया है, उसमें देश के राष्ट्रपति को यह अधिकार दे दिया है कि वे किसी भी जाति को जनजाति में शामिल कर सकते हैं और किसी भी जनजाति को बाहर भी कर सकते है |

संविधान में जो आदिवासियों को कहा गया है कि आदिकाल से, प्राचीन काल से जो जुड़े हैं, उसमें किसी को शामिल करने और बाहर करने का कोई सवाल ही नही यही आगे जाकर देश में असंतोष पैदकर रहा है |सरकार एससी/एसटी समुदाय के लिए खूब योजनाएं ला रही हैं | छत्तीसगढ़ के बस्तर या बस्तर से भी और अंदर चले जाएं अंदरूनी इलाकों में विकास की सही स्थिति ज्ञात होती है कि वास्तव में कितना विकास हुआ?

 

वहां पीने का पानी नहीं है | बरसात में कई बार लोग नालों से पानी भरकर लाते हैं, गड्ढे खोदकर लाते हैं, वो गंदा पानी होता है | आरओ पानी तो वहां कोई नहीं पीता, कहीं नहीं मिलता | टंकियां तो बनीं, लेकिन सरकार पानी नहीं भरती |बोरिंग है लेकिन पानी नहीं | राजनांदगांव के बोदाल में फ्लोराइड युक्त पानी आता है जो हड्डियों को ख़राब कर देता है | हड्डियां टेढ़ी हो जाती हैं | जवानी में लड़के बूढ़े हो जाते हैं | मतलब हड्डियां ऐसे मुड़ जाती हैं, कूबड़ बन जाता है |

 

परिषद बने, बजटीय पैसा इसके ज़रिये ही बंटे और यही फैसला करे कि कौन-से अधिसूचित क्षेत्र में कितना पैसा इस्तेमाल होगा, शिक्षा के क्षेत्र में, स्वास्थ्य के क्षेत्र में | परिषद के सदस्य आदिवासी ही होंगे, लेकिन कितने सदस्य होंगे यह पता नहीं है क्योंकि नियमावली ही नहीं है | पेसा कानून के तहत ये नियमावली बननी चाहिए |सरकारी लागू कार्यक्रम फेल है |

 

5वीं अनुसूची के तहत जनजतीय सलाहकार परिषद भी बनाई गई हैं | जनजातियों के उत्थान में उनका कैसा योगदान है? जनजातीय सलाहकार परिषद (टीएसी) को राज्य स्तर पर मान्यता दी गई है | इसमें 20 सदस्य होंगे, दो तिहाई आदिवासी विधायक होंगे | पांच सदस्य कोई भी हो सकते हैं, जैसे कि समाज या सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता | इसका मुखिया भी आदिवासी हो | कमेटी आदिवासियों के विकास, सुरक्षा और संरक्षण के संबंध मे प्रदेश के राज्यपाल को रिपोर्ट करे | राज्यपाल का काम है कि वे इस रिपोर्ट को राष्ट्रपति को भेजें |

 

राष्ट्रपति को जनजातीय समुदायों का अभिभावक कहा गया है और उनकी निगरानी का ज़िम्मा सौंपा गया है | राष्ट्रपति जब चाहे, तब राज्यपाल को आदेश देंगे कि उन्हें जनजातीय क्षेत्रों की रिपोर्ट चाहिए | नियम है कि 6 महीने या 3 महीने में वह रिपोर्ट मांगे, लेकिन ऐसा भी है कि अगर ज़रूरत हो तो, कभी भी रिपोर्ट मांगी जा सकती है 

अब स्थिति देखिए, राष्ट्रपति ने आख़िरी बार कब रिपोर्ट मांगी या जनजाति सलाहकार परिषद की बैठक कब-कब हुई, ये तक स्पष्ट नहीं है | किसी राज्य में बैठकें नहीं हो रही हैं | हुईं भी तो साल में कितने बार कोई ब्योरा नहीं है | 5वीं अनुसूची लागू तो है लेकिन उसके अनुपालन पर सवाल है | जैसे कि संबंधित किसी कलेक्टर से बात करते हैं तो जवाब होता है कि हमारे पास इससे संबंधित कोई सूचना नहीं है |

 

5वीं अनुसूची के अलग-अलग प्रावधान हैं जैसे कि पेसा क़ानून के लिए अधिसूचना चाहिए या ग्रामसभा के बारे में चाहिए तो राज्यपाल की ज़िम्मेदारी बनती है कि वो जारी करे कि इस सूची के इस अधिसूचित क्षेत में ये अधिकार हैं | जैसे कि अनुसूची में उल्लेखित है कि इन अनुसूचित क्षेत्र में सामान्य क़ानून लागू नहीं हो सकते या लागू हो भी सकते हैं | दोनों बाते हैं और परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं | परस्थितियां क्या होंगी | यह नोटिस राज्यपाल को जारी करना होता है |

ऐसे में सामान्य क्षेत्रों की ही तरह इन क्षेत्रों को चलाया जा रहा है | जो योजनाएं अन्य क्षेत्रों में चल रही हैं, वही यहां हैं | लेकिन वास्तव में यहां के लिए विशेष योजना हो, जिन पर अलग से विचार हो | बिना किसी अधिसूचना जारी किए कैसे सामान्य क्षेत्रों की तरह व्यवहार हो रहा है | टीएसी, ग्रामसभा, डीएसी से सलाह ली जाए जो संवैधानिक बॉडी हैं |

जंगल क्षेत्र में आदिवासी रह रहा है तो उनको जंगल क्षेत्र की जो भी वनोपज है जैसे ताड़ी, आम का पेड़ है, महुए का पेड़ या तेंदुपत्ता उस पर अधिकार मिले | सरकार और आदिवासी क़ीमत तय करे और वे उन्हें बेचें, पर ऐसा अब तक होता नहीं है | इन क्षेत्रों में घर लकड़ी के होते हैं | स्वाभाविक है कि लकड़ी काटकर ही बनेंगे, लेकिन जब ये जंगल में लकड़ी काटने जाते हैं तो गिरफ़्तार कर लिए जाते हैं | और कई नेता मालिक मकबूजा में एक रूपए में सागौन का पेड़ काट लिए | वन में हज़ारों सालों से जो रह रहा है, उनका अधिकार होना चाहिए, न कि वन विभाग का | घर बनाने के लिए भी लकड़ी नहीं दी जा रही तो कहां से लाई जाए | जल, जंगल और ज़मीन पर यह उसका अधिकार है, पर उसे मिलता नहीं |

जितने भी वन क्षेत्र हैं जनजातीय क्षेत्र में ही हैं | ग्रामीण क्षेत्र के पेड़ कटे हैं तो उस पर पहला हक़ ग्रामसभा का हो | लेकिन ग्रामसभा को कोई अधिकार नहीं दिया | सच यह है कि अशिक्षित आदिवासी को कई सारे बिलों के बारे में पता ही नहीं और न ही उनके कथित नेता जानते है | राज्य और केंद्र सरकार समाज के पिछड़े तबको के लिए कई योजनाएं बनाती हैं, घोषणाएं और वादे करती हैं, लेकिन ज़मीन पर असर होता नहीं दिख रहा | देखते हैं आयोग बनने के बाद क्या बजट में हेड और मंडल कमीशन लागू हो पाता है या नहीं |

योजनाएं आदिवासी के नाम पर बनती हैं, लेकिन उनका फायदा उसे नहीं मिलता | आदिवासी के नाम पर दूसरों ने लाभ लिया | आदिवासियों के नाम पर पेट्रोल पंप आवंटित हुए, लेकिन फायदा सामान्य वर्ग के लोग ले गए | 5वीं अनुसूची में जितनी भी खदानें हैं, वे आदिवासियों को ही आवंटित होनी हैं, लेकिन सब सामान्य वर्ग के पास हैं | लेकिन, कोई कानून ऐसा नहीं कि इन लोगों को स्पष्ट सज़ा का प्रावधान हो |

इसके लिए राज्य सरकार ज़िम्मेदार है | आदिवासी शिकायत इसलिए नहीं करता क्योॉकि उसे मालूम ही नहीं है फला फला उनका अधिकार है |उनको अपने अधिकार पता नहीं हैं | योजनाएं बन रही हैं लेकिन फायदा नहीं पहुंच रहा और कहीं न कहीं सिस्टम ज़िम्मेदार है | समस्या ये भी है कि सरकार योजनाएं बनाती हैं लेकिन जिनके लिए बनाई, उनको ही जानकारी नहीं है |
आदिवासी समुदाय से 47 सांसद और करीब 600 विधायक हैं | 5वीं अनुसूची से उन्हें कोई मतलब नहीं |आदिवासी राजनीति , धर्म और जाति के नाम पर सवर्णों के तिजोरी में कैद हो चुकी है | सरकार, राष्ट्रपति, राज्यपाल, शासन-प्रशासन को कतार में अंतिम व्यक्ति के प्रति ईमानदार होना चाहिए था | अगर भ्रष्टाचार भी है तो ज़िम्मेदार सरकार है |

5वीं अनुसूची पूरी तरह लागू होती है तो ज़िला कलेक्टर के पास हर तीन महीनों और छह महीनों में ताज़ा अधिसूचना रहेगी | इसमें ऐसा प्रावधान भी है कि इन क्षेत्रों में लोगों को रोज़गार नहीं मिल रहा तो राज्यपाल अधिसूचना जारी करेगा कि फलां तहसील में 100 प्रतिशत आरक्षण लागू हो | जिससे कि वहां मौजूद हर नौकरी स्थानीय बेरोज़गारों को ही मिलेगी, भले ही वे पांचवीं पास हों या दसवीं, उससे मतलब नहीं | उसे उसके स्तर का रोजगार मिलेगा. इससे पलायन रुकेगा |

वर्तमान में ग्रामीण रोज़गार के लिए अन्य जिलों, तहसील यहां तक कि राज्यों में जाता है. जब 5वीं अनुसूची लागू होगी तो उसे गांव में ही रोज़गार मिलेगा. भले ही गिट्टी भरने या तालाब खोदने का रोज़गार मिले | अभी ज़मीन छीनने पर आदिवासी विरोध करता है तो सबसे पहले उसे नक्सल से जोड़कर सीधे जेल में डाल दिया जाता है | आम जनता की सहानुभूति ख़त्म |

लेकिन 5वीं अनुसूची के बाद ज़िला परिषद और ग्रामसभा फ़ैसला करेगी कि हमारे लोगों पर कौन सी धारा लगे, इसकी पुलिस में शिकायत होनी चाहिए या नहीं | गांव में ही मामलों का निपटारा होने लगा तो स्वाभाविक है कि उनके ऊपर अत्याचार कम हो जाएंगे | जनजातीय क्षेत्रों की जेलों में बंद क़ैदियों में 90 प्रतिशत आदिवासी है | आज आदिवासी अधिकारों से वंचित माओवादियों के नाम जेलों नें कैद हैं वे गुलाम हैं |

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उत्तम कुमार ,संपादक 

दक्षिण कोसल
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