दिल्ली सरकार का न्यूनयम मजदूरी का आदेश हाईकोर्ट ने रोका . हाईकोर्ट की बात का एक ही अर्थ है कि पूंजीवादी समाज मे मालिकों की मर्जी से किया गया फैसला ही प्राकृतिक न्याय और संविधान सम्मत है .ः नंद कश्यप

दिल्ली सरकार का न्यूनयम मजदूरी का आदेश हाईकोर्ट ने रोका . हाईकोर्ट की बात का एक ही अर्थ है कि पूंजीवादी समाज मे मालिकों की मर्जी से किया गया फैसला ही प्राकृतिक न्याय और संविधान सम्मत है .ः नंद कश्यप

दिल्ली सरकार का न्यूनयम मजदूरी का आदेश हाईकोर्ट ने रोका . हाईकोर्ट की बात का एक ही अर्थ है कि पूंजीवादी समाज मे मालिकों की मर्जी से किया गया फैसला ही प्राकृतिक न्याय और संविधान सम्मत है .ः नंद कश्यप

7.08.2018

भारत के प्रधानमंत्री द्वारा खुलेआम कारपोरेट के साथ प्रतिबद्धता ने दिल्ली के सबसे निचले पायदान के मेहनतकशों से उनकी न्यूनतम मजदूरी छीना दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला उसी बयान से प्रभावित है.

जब पूंजीवादी व्यवस्था की बात आती है तो व्यवस्था का पोषण चारो अंग करते हैं, सरकार, नौकरशाही,न्याय पालिका और मीडिया तो खैर इसकी चेरी ही होती है, समाज में सबसे निचले पायदान के मेहनतकशों के लिए वैसे भी प्राप्त रोजी से घर चलाना कठिन होता है, सरकारें जुबानी सहानुभूति दिखलातीं है, उनके जीवन में स्थाईत्व लाने कोई ठोस कदम नहीं उठातीं, ऐसा ही एक हादसा इस मेहनतकश हिस्से के साथ हुआ हाल के दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले से दिल्ली हाइकोर्ट ने श्रमिकों का न्यूनतम वेतन बढ़ाने के फैसले को खारिज करते हुए कहा कि ‘जल्दी प्रयास और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन के कारण दुर्भाग्यवश इस संशोधन को रोकना पड़ा’ क्योंकि इससे संविधान का उल्लंघन हो रहा था। हालांकि दिल्ली सरकार द्वारा तय की गई न्यूनतम मजदूरी भी खुद सरकार के वेतन आयोग द्वारा एक परिवार के गुजारे के लिए तय की गई आवश्यक न्यूनतम रकम के मुक़ाबले बहुत कम थी।

व्यापारियों, पेट्रोल व्यापारी और रेस्टोरेंट मालिकों ने दिल्ली सरकार के तीन मार्च, 2017 को न्यूनतम वेतन की अधिसूचना को ख़ारिज करने की मांग की थी. व्यापारियों का कहना है कि समिति ने उनका पक्ष जाने बिना ही फैसला ले लिया.

हाईकोर्ट का यह भी कहना था कि ‘दिल्ली में न्यूनतम वेतन की दर को इसलिए नहीं बढ़ाया जा सकता क्योंकि दिल्ली में वेतन दर पड़ोसी राज्यों से ज़्यादा है।’

हाईकोर्ट की बात का एक ही अर्थ है कि पूंजीवादी समाज मे मालिकों की मर्जी से किया गया फैसला ही प्राकृतिक न्याय और संविधान सम्मत है क्योंकि क्या श्रमिकों की श्रम शक्ति की कीमत के अलावा किसी और वस्तु/सेवा के बाजार मूल्य में वृद्धि के पूँजीपतियों के फैसले को इस आधार पर रद्द किया गया है कि उन वस्तुओं/सेवाओं के ख़रीदारों की सहमति मूल्य तय करते हुए नहीं ली गई थी? पेट्रोल के दाम बढ़ते हुए, स्कूल-अस्पताल की फ़ीज़ बढ़ते हुए, खाद्य पदार्थों से दवाइयों तक की कीमतें बढ़ाते हुए कभी फैसला आम मेहनतकश लोगों की राय लेकर होता है? लेकिन श्रम शक्ति का न्यूनतम मूल्य निर्धारित करते हुए मालिकों की राय न लेना अप्राकृतिक और संविधान का उल्लंघन है!

फिर कितनी हास्यास्पद बात है कि पड़ोसी राज्यों में मजदूरी कम है तो दिल्ली में भी कम होनी चाहिए? इसके बजाय पड़ोसी राज्यों को भी मजदूरी बढ़ाने के लिए क्यों न कहा जाना चाहिए? और किसी मामले में ऐसा कुतर्क सुना गया है?

पर सच यही है कि मालिकों और मजदूरों के बीच वर्ग विभाजित समाज में सत्ता के सब अंग – संसद से पुलिस-न्यायालय तक सब मालिकों के हितों की सुरक्षा में ही कार्य करते हैं। वही उनके लिए ‘न्याय’ की परिभाषा है। उनसे मेहनतकश जनता के लिए इंसाफ की उम्मीद ही भ्रम है।

सवाल तो यह भी पूछा जाना चाहिए कि जजों से लेकर सांसद-मंत्री और अधिकारी अपने घरों पर जिन श्रमिकों को रखते हैं क्या उन्हें न्यूनतम मजदूरी देते हैं? क्या वे बाल श्रमिकों का शोषण करते हैं?

एक खबर यह भी कि फैसला सुनाने के बाद जज महोदया पदोन्नत होकर मुख्य न्यायाधीश बन गईं हैं!

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नंद कश्यप 

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