|| इस ‘मुल्‍क’ की फिल्‍मों में मुसलमान…|| ० यूनुस खान : दस्तक़ में प्रस्तुत

   || इस ‘मुल्‍क’ की फिल्‍मों में मुसलमान…|| ० यूनुस खान : दस्तक़ में प्रस्तुत

  || इस ‘मुल्‍क’ की फिल्‍मों में मुसलमान…|| ० यूनुस खान : दस्तक़ में प्रस्तुत

🎥 🎥

दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले

मैंने ‘मुल्‍क’ नहीं देखी है अभी। अनुभव सिन्‍हा की इस फिल्‍म का बेसब्री से इंतज़ार था क्‍योंकि पता था कि ये फिल्‍म क्‍या कहने जा रही है। ये भी पता था कि मुल्‍क बहुत ज्‍यादा चर्चा का विषय बनेगी। असल में भारत में ऐसी बेबाक फिल्‍में बहुत बहुत दिनों में और बहुत कम ही आती हैं जो खुलकर अपनी बात कहें। बिना डरे।

एक बहुत बड़ी टोली मुस्लिमों को आज़ादी के बाद से ही बहुत संदेह की नज़र से देखती है। और मुसलिम होने का मतलब होता है तकरीबन हर वक्‍त अपनी वफादारी को साबित करते रहना। इसलिए भारत में मुसलिम दो तरह से जीते हैं। एक तो पूरी कट्टरता के साथ, दाढ़ी, टोपी, मस्जिद वाले मुसलिम। और दूसरे जिन्‍हें धर्म से लेना देना नहीं होता। ये तरक्‍की-पसंद लोग हैं जो अपनी तरह से जीते हैं। पर नाम के आगे जो मुसलिम सरनेम होता है—उसके बरअक्‍स लोग दफ्तर, मुहल्‍लों, स्‍कूल सब जगह कहीं ना कहीं दबे-छिपे उन्‍हें संदेह के नज़रिये से देख ही लेते हैं।

मुस्लिम किस तरह सांप्रदायिक तनाव का सामना करते हैं इसे सईद अख्‍तर मिर्जा ने फिल्‍म ‘नसीम’ में बहुत ही खूबसूरती से दिखाया था। ये फिल्‍म सन 1995 में आई थी। और दिलचस्‍प बात ये है कि इस फिल्‍म में नामचीन शायर कैफी आज़मी भी एक महत्‍वपूर्ण भूमिका में थे। अगर आपने ये फिल्‍म ना देखी हो तो फौरन देख लेनी चाहिए। गोविंद निहलानी के धारावाहिक ‘तमस’ में भी सांप्रदायिकता और मुसलिम जीवन का एक पहलू उजागर किया गया था। बाद में निहलानी से इस धारावाहिक को फिल्‍म का रूप दे दिया था।

जहां मुस्लिमों के जीवन और उनके संघर्ष की बात आती है तो एम.एस. सथ्‍यू की फिल्‍म ‘गर्म हवा’ को कैसे भूला जा सकता है। दरअसल गर्म हवा तो कई मायनों में आज़ादी के बाद के मुसलिम परिदृश्‍य का एक बहुत ज़रूरी दस्‍तावेज़ है और हर युग में इस फिल्‍म को अलग अलग तरह से देखा जाना चाहिए।

हालांकि कुछ फिल्‍मों ने स्‍थूल रूप से मुसलिम परिदृश्‍य और उससे जुड़े अलग अलग विषयों को उठाया है, जैसे सागर सरहदी की फिल्‍म ‘बाज़ार’, श्‍याम बेनेगल की फिल्‍म ‘मम्‍मो’, नंदिता दास की फिल्‍म ‘फिराक’, अर्पणा सेन की फिल्‍म ‘मिस्‍टर एंड मिसेज अय्यर’ वगैरह।

चूंकि भारतीय पेशेवर सिनेमा का अपना गणित है जिसमें हर तत्‍व एकदम सही मात्रा में और एकदम संतुलित होना चाहिए। इसलिए हमारा पेशेवर सिनेमा इस मुद्दे पर अपनी बात कहने से हमेशा बचता रहा है। यहां मुसलिम पात्र एक फिलर के तौर पर आते हैं। वो बहुत ही स्‍टीरियो-टाइप होते हैं। यहां तक कि हिंदी सिनेमा ने अब तक हिंदी मुसलिम अंर्तधर्म विवाह और उससे जुड़ी समस्‍याओं पर भी कोई ठोस फिल्‍म पेश नहीं की है। इसलिए या तो ‘मुसलिम सोशल सिनेमा’ के नाम पर पुराने ज़माने जैसी फिल्‍में सामने आती रही हैं, ‘पाकीज़ा’, ‘चौदहवीं का चांद’, ‘मुगल-ए-आज़म’, ‘बरसात की रात’, ‘निकाह’ जैसी या फिर ऐसी फिल्‍में जिनमें मुस्लिम दुनिया को यथार्थ के चश्‍मे से देखा जाता रहा है। जैसे ‘सलीम लंगड़े पर मत रो’, ‘शाहिद’, ‘इकबाल’, ‘ओमरटा’ वगैरह।

बताइये इस बारे में आपका क्‍या कहना है?
___________________
*० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले*

CG Basket

Related Posts

Leave a Reply

Create Account



Log In Your Account