इंदौर ,प्रलेसं और महिला फेडरेशन का आयोजन : “सामाजिक ढाँचे में स्त्री व्यथा और प्रेमचन्द की कलम” प्रेमचन्द जयंती .

इंदौर ,प्रलेसं और महिला फेडरेशन का आयोजन : “सामाजिक ढाँचे में स्त्री व्यथा और प्रेमचन्द की कलम” प्रेमचन्द जयंती .

प्रेमचंद के स्त्री पात्र

 

रिपोर्ट :  सारिका श्रीवास्तव

04.08.2018

प्रगतिशील लेखक संघ, इंदौर  एवं  भारतीय महिला फेडरेशन, .इंदौर  के संयुक्त तत्वाधान में प्रेमचन्द जयंती पर 1 अगस्त 2018 को कस्तूरबा रूरल महाविद्यालय, इंदौर की छात्राओं के साथ सामाजिक ढाँचे में स्त्री व्यथा और प्रेमचन्द की कलम विषय पर परिचर्चा की गई। इसके साथ ही 1 अगस्त को बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि पर प्रेमचन्द के साथ-साथ तिलक को भी याद किया गया। इस परिचर्चा में छात्राओं ने अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज करवाई।

 

कस्तूरबा रूरल इंस्टिट्यूट की हिंदी प्रोफेसर इंदु ने हम सबके आपसी परिचय की औपचारिकता के बाद उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द की रचनाओं पर परिचर्चा करते हुए कहा कि प्रेमचन्द जनता के रचनाकार थे। उन्होंने साहित्य को नए आयाम दिए और आमलोगों की पीड़ा को आम लोगों के शब्दों में ही उन तक पहुँचाया।

 

प्राचार्या निर्मला जी ने तिलक को याद करते हुए कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में अपना जीवन बलिदान कर देने वाले देशप्रेमी और स्वतंत्रता सेनानी के बलिदान को सरकार, प्रशासन के साथ-साथ मीडिया ने भी भुला दिया, जो बड़े ही दुख और अफसोस कि बात है। तिलक को याद करते हुए दो पंक्तियाँ भी आज किसी अखबार या टी व्ही समाचार में नहीं दिखीं। जो बड़ा ही शर्मनाक है। 

प्रेमचंद की रचनाओं का जिक्र करते हुए निर्मला जी ने कहा कि सहज और सरल भाषा में लोगों के बीच साहित्य को प्रेमचन्द ने ही पहुँचाया। मानवीय संवेदनाओं की गहराइयों का बखूबी चित्रण उनकी रचनाओं की खूबी है। बूढ़ी काकी की अवस्था और बुढ़ापे की तस्वीर के साथ-साथ रिश्तों की अहमियत, होरी और धनिया की मजबूरी और विवशता रोंगटे खड़े कर देती है।

इंस्टीट्यूट की छात्रा दीपिका ने उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द को याद करते हुए कहा कि उन्होंने साहित्य की राजनीतिक-सामाजिक विकास की भूमि पर कार्य किया। साहित्य के क्षेत्र में एक नई चेतना जागृत की और ग्रामीण अंचल को साहित्य के जरिए उकेर कर लोगों के सामने रखा।

छात्रा सेवंती सेनानी ने छात्राओं को प्रेमचन्द का जीवन परिचय दिया और बरखा रावत ने बाल गंगाधर तिलक का जीवन परिचय देते हुए बताया की तिलक ने एक नए युग का निर्माण किया। उंन्होने पूर्ण स्वराज्य की माँग करते हुए नारा दिया “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, उसे मैं लेकर ही रहूँगा।” पूजा ने बताया कि प्रेमचन्द ने 300 के करीब कहानियाँ लिखीं जो मजदुर, गरीब, किसान, दबे-कुचले और शोषित तबके की पीड़ा को बखूबी अभिव्यक्त करती हैं।

इंदौर भारतीय महिला फेडरेशन की सचिव नेहा ने तंतर कहानी का जिक्र करते हुए कहा किे तीन लड़कों के बाद जो लड़की जन्म लेती है उसे बहुत अपशकुनी माना जाता है, उसे ही तंतर कहते हैं। वह अबोध कन्या पैदा होते साथ ही कलमुंही, अभागी, राक्षसी जैसे शब्दों से लांक्षित हो जाती है। एक नवजात बच्ची के जन्म पर समाज, परिवार के व्यवहार और परिवार में किस तरह  की स्थिति बनती बताया गया है।

कामना शर्मा ने प्रेमचन्द की कहानी घासवाली का सारांश सुनाया और बताया सुंदर, निडर, गरीब घासवाली उससे काम की लालसा करने वाले उच्चजाति के युवक को विवेकपूर्ण तर्क देकर कैसे शर्मिंदा करती है। कहानी पर अपना वक्तव्य देते हुए कामना शर्मा ने कहा घासवाली जब क्रोधित होकर उससे प्रेम जताने वाले उच्चवर्ग के विवाहित युवक को फटकार लगाती है तब वह कहती है “हाँ, अगर मेरा पति अपने मन की करने लगे, मेरी छाती पर मूँग दलने लगे तो मैं भी उसकी छाती पर मूँग दलूँगी।” प्रेमचन्द ने महिलावर्ग के जीवन में कोने-कोने में छिपी पीड़ा को अपनी लेखनी से व्यक्त किया।

मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव मण्डल की सदस्य सारिका श्रीवास्तव ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए कहा कि आज “सामाजिक ढाँचे में स्त्री व्यथा और प्रेमचन्द की कलम” विषय पर चर्चा करने की जरूरत इसलिए भी पड़ी क्योंकि जिस तरह प्रेमचन्द को दलित और स्त्री विरोधी मानसिकता के नाम पर बदनाम करने की साजिश की जा रही है तब ऐसे समय हमारा इस विषय पर परिचर्चा करना बहुत प्रासंगिक है। समाज द्वारा गढ़ी स्त्री की छवि को प्रेमचन्द नकारते हुए एक नई छवि गढ़ते हैं जो निडर, साहसी, बुद्धिमान है। प्रेमचन्द अपने साहित्य के जरिए स्त्री को इंसान के रूप में प्रस्तुत करते हैं। 

उन्होंने अपने साहित्य के जरिए वर्गभेद, जातिभेद और इसका लिंग भेद पर किस तरह दुष्प्रभाव पड़ा है, बखूबी लिखा है।

इस परिचर्चा में ज्योति निकम, महाविद्यालय के प्राध्यापकगण भी शरीक हुए।

इसके पूर्व इंदौर प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा 31 जुलाई को रूपांकन में प्रेमचन्द को याद किया। इस परिचर्चा में दीपिका ने प्रेमचन्द की दो कहानियाँ “ठाकुर का कुआँ” और “सवा सेर गेंहू” का  वाचन किया। इंदौर प्रलेसं अध्यक्ष एस के दुबे, सचिव अभय नेमा, हरनाम सिंह, रविन्द्र व्यास, केसरीसिंह चिढार, रामआसरे पांडे, दिनेश दीक्षित, विजय दलाल, अरविंद पोरवाल, अशोक दुबे, शारदा मोरे, वर्षा तारे, विक्की, ऋतिका, घनश्याम, सारिका और ज्योति निकम ने अपने विचार रखे।

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