भारत में विद्यार्थी आंदोलन का इतिहास व वर्तमान दशा, शिक्षा का परिदृश्य तथा शिक्षा का व्यवसायीकरण – तुहिन

4.08.2018

भारत में विद्यार्थी आंदोलन –
1. 1947 के पूर्व – यंग बंगाल मूवमेंट:

देश में विद्यार्थी आंदोलन 1947 के पूर्व का इतिहास करीब 185 वर्ष पुराना है। शैक्षणिक संस्थाएं और अन्य संगठनों द्वारा आधुनिक विचारधारा के प्रचार-प्रसार में न सिर्फ बंगाल में बल्कि देश के विभिन्न भागों में भी मदद मिली। 1928 में एकाडेमिक एसोसियेशन नामक संस्था जो कलकत्ता में एक पुर्तगाली नौजवान विवियन डिरोजियो के द्वारा स्थापित की गई थी का इतिहास में उल्लेख मिलता है। जहां तक जानकारी उपलब्ध है उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि एकाडेमिक एसोसियेशन देश का प्रथम विद्यार्थी संगठन था।

वास्तव में इस्टइंडिया कंपनी तथा प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन का आधुनिक एवं अंग्रेजी शिक्षा के बाम्बे, मद्रास, कलकत्ता तथा अन्यत्र प्रसार में भूमिका रही। यह ब्रिटिश शासन की जरूरत भी थी। लेकिन शिक्षा के प्रसार का परिणाम, ब्रिटिश प्रशासन की अपेक्षाओं के खिलाफ निकला। आधुनिक शिक्षा ने प्रजातंत्र, स्वतंत्रता, उदारता और यहां तक कि फ्रांसीसी क्रांति जैसे क्रांतियों से उपजे विचारों को लोगों तक पहुंचाया। इसी के साथ, कई उद्योग जैसे कि रेल्वे (1853), जूट, टेक्सटाइल, खनन, प्रक्रिया (1854 एवं उसके बाद) पूरे देश के पैमाने पर फैलने लगे। इसने भी आधुनिक विचारों और संगठन की सोच को फैलाने में मदद की। वास्तव में, माक्र्स का इस पर कहना था कि, ब्रिटिशरों ने, न चाहते हुए भी, भारत में सामाजिक क्रांति के बीज बोये।

19वीं सदी के सर्वाधिक महत्वपूर्ण आंदोलनों में से एक था यंग बंगाल मूवमेंट, जो कि डिरोजिओ के प्रभाव से शुरू हुआ था। इसने 1840 से 1860 के बीच बंगाल के नौजवानों को विशेष रूप से प्रभावित किया था। यह एकाडेमिक एसोसियेशन की परम्पराओं से पैदा हुआ आंदोलन था। यंग बंगाल मूवमेंट ने नवजागरण और सामाजिक सुधार के साथ-साथ राष्ट्रीय और राजनैतिक चेतना में वृद्धि करने का भी कार्य किया। इस आंदोलन के नेतृत्व में माधव चंद्र मल्लिक, राम गोपाल घोष, कृष्ण मोहन मल्लिक आदि थे।

इस प्रकार के कुछ और विद्यार्थी तथा शैक्षणिक संगठन उन्नीसवीं शताब्दि में बने जैसे कि जनरल नाॅलेज प्राप्तकर्ता (1838), स्टुडेन्ट्स एसोसियेशन (1876) आदि। सन् 1848 में दादा भाई नौरोजी ने एक चर्चा मंडल के रूप में ‘‘स्टुडेन्टस साइंटिफिक एंड हिस्टोरिक सोसायटी‘ नामक एक मंच की स्थापना की थी। उस समय विद्यार्थियों के लिए बहस के मुद्दे शिक्षा व्यवस्था पर केंद्रित होते थे। इतिहास में विद्यार्थियों द्वारा की गई पहली हड़ताल लाहौर के किंग एडवर्ड मेडिकल काॅलेज में की गई थी। स्वतंत्रता संघर्ष के दरम्यान विद्यार्थियों का योगदान अतुलनीय था। 1905 में बंगभंग के खिलाफ स्वदेशी आंदोलन तथा उसके प्रभाव से पैदा हुए साम्राज्यवाद विरोधी ज्वार में 1906 से 1908 के बीच केवल बंगाल में ही 184 व्यक्तियों को क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े रहने के अपराध में सजा हुई। जिसमें 68 विद्यार्थी थे। 1912 में अहमदाबाद में आयोजित दूसरे आॅल इंडिया काॅलेज स्टूडेन्टस काँफ्रेंस में ‘चरखा स्वराज पहले और शिक्षा बाद में‘‘ काआह्वान दिया गया। 1919 के प्रथम असहयोग आंदोलन के एक हिस्से के रूप में 1920 में नागपुर में आॅल इंडिया काॅलेज स्टूडेन्टस काॅफ्रेन्स में स्कूल-काॅलेजों का बहिष्कार तथा ब्रिटिश शासन के प्रति असहयोग का प्रस्ताव एकमत से पारित किया गया था। 1930 में द्वितीय असहयोग आंदोलन के दरम्यान विद्यार्थियों को बड़े पैमाने पर जुड़ने का आह्वान किया गया। पंजाब, बंगाल, उ.प्र. तथा बाॅम्बे प्रान्त में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने जुलूस हड़ताल व जंगी प्रदर्शनों में नेतृत्व किया तथा गिरफ्तारी दी। 1930 में ही पेशावर में मजदूर वर्ग के नेतृत्व में दस दिन तक जो स्वतंत्र प्रजातांत्रिक सरकार (कम्युन) की स्थापना हुई थी उसमें मजदूर वर्ग व किसान वर्ग के साथ विद्यार्थी समुदाय ने भी अभूतपूर्व संघर्षशीलता, साहस व आत्मत्याग का परिचय दिया था।

बीस के दशक का अंतिम समय तथा तीस का दशक क्रांतिकारी विद्यार्थी आंदोलन के उभार का समय था। शहीदे आजम भगत सिंह द्वारा अल्पायु में किए गए महान क्रांतिकारी कार्य तथा भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू की शहादत ने विद्यार्थी समुदाय को साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में वैज्ञानिक व साम्य की सोच के साथ जुड़ने को प्रेरित किया। 12 अगस्त 1936 को लखनऊ में आॅल इंडिया स्टूडेन्टस फेडरेशन (ए.आई.एस.एफ.) के रूप में देश में पहली बार एक राष्ट्रीय विद्यार्थी संगठन की नींव पड़ी। एआईएसएफ की स्थापना वामपंथी सोच से प्रेरित होकर की गई थी। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) जिसकी स्थापना 1925 में हुई थी की पहल से एसआईएसएफ बना। संगठन ने पूरे देश में विद्यार्थियों को ‘स्वतंत्रता, शांति, प्रगति‘ के नारे पर गोलबंद होने का आह्वान दिया था।

1936 में लखनऊ में ही मुंशी प्रेमचंद, सज्जाद जहीर आदि की पहल से क्रांतिकारी सांस्कृतिक आंदोलन की शुरूआत के लिए प्रगतिशील लेखक संघ (पी.डब्लू.ए) की स्थापना हुई। ए.आई.एस.एफ. के लखनऊ सम्मेलन में पंजाब, उ.प्र., सी.पी. एंड बरार, बंगाल, असम, बिहार तथा उड़ीसा के 11 प्रांतीय कमेटियों एवं 210 स्थानीय कमेटियों से 986 विद्यार्थी प्रतिनिधियों ने भाग लिया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तथा 1944-47 में हुए बहुतेरे आंदोलन जैसे कि तेभागा, तेलंगाना, पुनप्रा वायलार, कय्युर, आजादहिंद फौजीयों की रिहाई के लिए हुआ आंदोलन, डाकतार रेल, हड़ताल, नौसेना विद्रोह आदि में विद्यार्थियों का जुड़ाव उल्लेखनीय था। इन सब आंदोलन में बड़े पैमाने पर स्कूलों, काॅलेजों को बंद कराकर आत्मत्याग की भावना से प्रेरित होकर विद्यार्थियों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम विशेषकर साम्राज्यवाद-दलालपूंजीवाद-सामंतवाद विरोधी संघर्ष में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज किया।

2. 1947 के बाद: 15 अगस्त 1947 के बाद तथाकथित आजादी के कारण हुए स्वप्नभंग तथा सच्ची आजादी न मिलने की पीड़ा और देश व समाज की मुक्ति की लड़ाई मंे विद्यार्थी भी पीछे नहीं रहे। 1959 व 1966 में पश्चिम बंगाल में भोजन की मांग को लेकर दो बड़े खाद्य आंदोलन हुए। जिसमें विद्यार्थियों ने जबरदस्त भागीदारी की। विशेषकर 1966 के खाद्य आंदोलन के पहले शहीद नुरूल इस्लाम तथा आनंद हाईत नाम के दो छात्र थे जो पश्चिम बंगाल के बसीरहाट में पुलिस गोलीबारी में मारे गए थे। 1967 का नक्सलबाड़ी का महान किसान विद्रोह जो पश्चिम बंगाल के बाद बिहार, केरल उ.प्र., आंध्र प्रदेश, जम्मू कश्मीर, ओड़िशा, तामिलनाड,ु म.प्र. समेत देश के अधिकांश हिस्से में फैल गया था का इतिहास बिना विद्यार्थियों की भूमिका के उल्लेख के अधूरा है। 1960 में तत्कालीन उ.प्र. के हिमालयीन क्षेत्र में हुए चिपको आंदोलन, 1974 में गुजरात में हुए नवनिर्माण आंदोलन, उसी समय बिहार तथा अन्य जगहों पर जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति के आह्वान पर तथा 1990 में मंडल कमीशन की सिफारिशों के खिलाफ देश में कई जगहों पर आंदोलनों में भी विद्यार्थियों की भागीदारी रही। लेकिन चिपको आंदोलन को छोड़कर उपरोक्त बाकी आंदोलनों का उद्देश्य साफ नहीं था तथा ये शासक वर्ग की फूटपरस्त राजनीति से प्रेरित थे।

महाराष्ट्र में साठ के दशक में हुए दलित पैंथर आंदोलन के प्रभाव से मूलरूप से जातिवादी उत्पीड़न के खिलाफ अंबेडकरवादी विचारधारा से ओतप्रोत विदर्भ रिपब्लिकन स्टुडेंट फेडरेशन (व्ही.आर.ए.एस.एफ.) की स्थापना 1967 में पुलगांव में हुई। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) से टूटकर भारत की कम्युनिष्ट पार्टी (माक्र्सवादी) सीपीएम की स्थापना 1964 में हुई। असल में भाकपा का नेतृत्व संशोधनवादी विचारधारा से ग्रसित था। उसने भारत की ठोस परिस्थिति का ठोस विश्लेषण नहीं किया तथा देश में अनुकूल परिस्थिति रहने पर भी जनवादी क्रांति करने में असफल रहा। यही हाल माकपा जैसे नव संशोधनवादी पार्टी का रहा जो पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी आंदोलन के दमन के जरिए (उस समय माकपा पश्चिम बंगाल की सरकार में प्रमुख भागीदार थी तथा माकपा के नेता ज्योतिबसु पुलिस मंत्री थे) बहुत जल्दी बेनकाब हो गई। 1947 के बाद साम्राज्यवाद द्वारा देश में पुराने किस्म के प्रत्यक्ष उपनिवेशिक व्यवस्था की जगह, अपने दलालों के जरिए शोषण की नवउपनिवेशिक व्यवस्था को लागू करने के षडयंत्र को पहले भाकपा फिर माकपा ने समझने की कोई कोशिश नहीं की। इसीलिए ये दोनों दल वर्ग संघर्ष के पथ से हटकर सामाजिक जनवादी दल के रूप में पतित हो चुके हैं। 1970 में माकपा की पहल पर स्टुडेंट फेडरेशन आॅफ इंडिया (एसएफआई) की स्थापना हुई। इसके अलावा 1983 में प्रोग्रेसिव स्टुडेंटस आॅर्गनाइजेशन (पीएसओ) तथा भा.क.पा. (मा-ले) लिबरेशन की पहल से 1990 में आॅल इंडिया स्टुडेंट्स एसोसियेशन (ए.आई.एस.ए.) की स्थापना वाम धारा के विद्यार्थी संगठनों की श्रृखंला में हुई।

वर्तमान स्थिति में न तो दक्षिणपंथी अखिल भारतीय विधार्थी परिषद् ¼ABVP) या नेशनल स्टूडेंट यूनियन आॅफ इंडिया ¼NSUI) या झूठे वामपंथी दलों से प्रभावित विधार्थी संगठन विद्यार्थियों की मूल समस्या का वैज्ञानिक समाधान करने में सक्षम है और न ही अखिल भारतीय स्तर पर एक सशक्त विद्यार्थी आंदोलन जो एक समान शिक्षा प्रणाली, वैज्ञानिक, जनवादी, प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष व साम्राज्यवाद विरोधी शिक्षा व्यवस्था के लिए संघर्षरत हो तैयार कर सकते हैं। वाम क्रांतिकारी विद्यार्थी आंदोलन की धारा में अंतिम संयोजन 2010 में मुम्बई में स्थापित अखिल भारतीय क्रांतिकारी विद्यार्थी संगठन (ए.आइ.आर.एस.ओ.) है जो इस दिशा में सक्रिय है तथा विद्यार्थी समुदाय के बीच आशा पैदा कर रहा है। ए.आई.आर.एस.ओ. ने अपने कार्यक्रम में देश में मौजूदा शोषणकारी नव उपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था को खत्म करने के लिए सभी विद्यार्थियों से उपरोक्त उद्देश्यों पर समझौताहीन संघर्ष छेड़ने का आह्वान किया है।

शिक्षा का वर्तमान परिदृश्य:

देश में शिक्षा का अधिकार कानून को लागू हुए 8 वर्ष हो गए हैं। यह दावा किया गया था कि दिसंबर 2002 में स्वीकृत 86वें संविधान संशोधन के द्वारा संविधान में जोड़े गये अनुच्छेद 21(क) के तहत उक्त विधेयक का संसद में पेश होना तथा पारित होना ही एक ऐतिहासिक कदम है। यह भ्रम फैलाया गया था कि शिक्षा का अधिकार कानून से विगत साठ सालों से नहीं मिला शिक्षा का अधिकार गरीब बच्चों की झोली में होगा और कोठारी आयोग का हरेक बच्चे को उम्दा-गुणवत्ता की शिक्षा देने का सपना साकार हो जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

बहरहाल यह समझने की जरूरत है कि विवादों में लिपटा यह कानून मौलिक अधिकार दे नहीं रहा वरन छीन रहा है- यह शिक्षा में गैर-बराबरी बढ़ा रहा है, गरीब बच्चों को अधकचरी शिक्षा दे रहा है। यह सरकारी और निजी स्कूलों के शिक्षकों के बीच भेदभाव करता है और सरकारी खजाने के सहारे स्कूली शिक्षा के निजीकरण और बाजारीकरण के नये दरवाजे चतुराई से खोल रहा है। इसमें सरकार की वित्तीय जवाबदेही भी कम करने के प्रावधान हैं।

यह आवश्यक है कि हमें तीन बुनियादी मद्दों पर विचार करने की जरूरत है। पहला, भारत का शासक वर्ग अपने हित में शिक्षा नीति गढ़ने में अपना निहित स्वार्थ क्यों मानता है। दूसरा सन् 1991 में साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण के तहत् नई आर्थिक नीति के लागू करने के बाद सरकारी स्कूल व्यवस्था को ध्वस्त करने और स्कूली शिक्षा का तेजी से निजीकरण व बाजारीकरण करने के लिए क्या नीतिगत बदलाव किए गये हैं। इसमें विश्व बैंक और अन्य अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों की क्या भूमिका रही है और ऐसा करवाने में उनका क्या मकसद है। तीसरा, सरकार एवं उस पर हावी काॅरपोरेट घरानों व वैश्विक बाजार की कैसा भारत बनाने की मंशा है और इसके लिए नया नीतिगत नजरिया क्या होगा। जाहिर है कि ये मुश्किल सवाल हैं लेकिन इनसे हम कब तक बचते रहेंगे? नीचे इन सवालों से जूझने का प्रयास किया गया है।

कोठारी आयोग ने कहा था कि पूर्व प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक उम्दा गुणवत्ता की शिक्षा देने के लिए जरूरी है कि देश के सकल राष्ट्रीय उत्पाद का कम से कम 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च किया जाए। इसके बावजूद साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण के तहत् सन् 1991 की आर्थिक नीति के चलते अगले 25 सालों में सकल राष्ट्रीय उत्पाद के प्रतिशत के रूप में शिक्षा पर किया जाने वाला खर्च लगातार घटाया गया।

संविधान में शिक्षा के मौलिक अधिकार की मूल दृष्टि
संविधान सभा में डाॅ. बी.आर. अंबेडकर के प्रयासों के बावजूद शिक्षा को संविधान के मौलिक अधिकार वाले खंड तीन में रखा जा सका। हालांकि 14 साल की उम्र तक के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अनुच्छेद 45 संविधान के राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों पर गौर करना जरूरी है। पहला, खंड चार में यह एकमात्र अनुच्छेद है जिसकी पूर्ति के लिए समय सीमा रखी गयी थी। संविधान लागू होने के दस साल के भीतर इस संकल्प को पूरा करना था जो आज तक नहीं हुआ। दूसरा 14 साल की उम्र तक में छह वर्ष से कम उम्र के भी बच्चे शामिल थे। यानी जन्म से लेकर 6 वर्ष तक के बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और पूर्व प्राथमिक शिक्षा को राज्य की जवाबदेही में शामिल किया गया था। तीसरा, संविधान ने आठ वर्ष (कक्षा 1-8) की प्रारंभिक शिक्षा का एजेंडा राज्य के सामने रखा था, न कि महज पांच साल की प्राथमिक शिक्षा का चैथा, इस अनुच्छेद को अनुच्छेद 46 के साथ पढ़ा जाना चाहिए जिसमें दलित और आदिवासी बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देने के लिए राज्य को निर्देशित किया गया था।

शिक्षा के अधिकार के विमर्श में नया मोड़ सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सन् 1993 में दिये गये उन्नीकृष्णन फैसले से आया। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 45 को खंड तीन के जीवन के हक वाले अनुच्छेद 21 के साथ जोड़ कर पढ़ने की जरूरत है। चूंकि ज्ञान देने वाली शिक्षा के वगैर इंसान का जीवन निरर्थक है। इस तरह सर्वोच्च न्यायालय ने सन् 1993 में 14 साल की उम्र तक के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दे दिया।

मौलिक अधिकार और शासक वर्ग का नजरिया
सर्वोच्च न्यायालय के उक्त ऐतिहासिक फैसले के बाद भारत का शासक वर्ग लगातार इस कोशिश में लगा रहा है कि किस प्रकार उन्नीकृष्ण फैसले के असर को घटाया या विकृत किया जाए। भारत सरकार की सैकिया समिति रपट (1997) और 83वां संविधान संशोधन विधेयक (1997) व उस पर मंत्रालय की संसदीय समिति ने स्कूली शिक्षा में बाजार की ताकतों को जगह देने के उद्देश्य से चतुर प्रावधान किए। लेकिन सरकार के इस नजरिए की सार्वजनिक तौर पर तीखी आलोचना हुई। अतः अगले चार साल के लिए शिक्षा के अधिकार का मसला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

नवंबर 2001 में 86वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा मे पेश हुआ। संसद के अंदर और बाहर इस विधेयक के जन विरोधी चरित्र पर व्यापक बहस हुई। जनसभाएं हुई व रैलियां निकलीं। स्पष्ट था कि इसको पेश करने का परोक्ष उद्देश्य शिक्षा का हक देना नहीं वरन् सर्वोच्च न्यायालय के उन्नीकृष्णन फैसले से मिले व्यापक हक को छीनना था। जो अधिकार उन्नीकृष्ण न के फैसले से मिल चुके थे वे भी 86वां संशोधन विधेयक के चलते छिन गये। खासकर, दस वर्ष के कम उम्र के 17 करोड़ बच्चों को पोषण, सेहत और पूर्व प्राथमिक शिक्षा का मिला हक। इसके बावजूद सभी राजनैतिक दलों में आपसी सहमति बन गयी और यह विधेयक संसद के दोनों सदनों में सर्वसम्मति से पारित हो गया।

इस संशोधन के जरिए खंड तीन में अनुच्छेद 21 (क) जोड़ा गया जिसके तहत 6-14 आयु समूह के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार दिया तो गया लेकिन एक शर्त के साथ। शर्त यह है कि शिक्षा का मौलिक अधिकार ‘‘उस रीति से दिया जाएगा जो राज्य का कानून निर्धारित करेगा‘‘ ऐसी शर्त क्यों लगाई गयी, यह समझने के लिए हमें वैश्वीकरण के चलते भारत की शिक्षा नीति और व्यवस्था में जो भारी परिवर्तन हुए है। उनको जानना होगा।

शिक्षा पर नव-उदारवादी आक्रमण

भारत में वैश्वीकरण की शुरूआत की औपचारिक घोषणा तो सन् 1991 में नई आर्थिक नीति की घोषणा के साथ हुई। लेकिन इसके एजेंडे का सूत्रपात 1980 के दशक के मध्य में ही हो चुका था। इसका सबूत संसद द्वारा पारित हमारी 1986 की शिक्षा नीति में मौजूद परस्पर विरोधाभासी बयानों में देखा जा सकता है। एक और तो शिक्षा नीति ने कहा कि कोठारी शिक्षा आयोग (1964-65) द्वारा अनुशंसित पड़ोसी स्कूल की ओर बढ़ने का एजेंडा बनाया जाए। शिक्षा सभी बच्चों को स्कूल के जरिए नहीं दी जा सकेगी। संबधित आयु समूह को (नाॅन-फाॅर्मल) धारा के जरिए अनौपचारिक शिक्षित किया जायेगा। इस समानांतर धारा में नियमित शिक्षक नहीं पढ़ायेंगे- उनकी जगह बगैर अर्हता वाले ठेके पर रखे गये शिक्षाकर्मी नियुक्त किये जाएंगे। इस तरह सरकारी स्कूल के नीचे देश के आधे बच्चों के लिए घटिया शिक्षा की एक परत बिछाने का फैसला हुआ। इसी नीति में एक और परत बिछाने की घोषणा सरकारी स्कूल के ऊपर ग्रामीण क्षेत्र के मुट्ठी भर अपेक्षाकृत संपन्न तबके के बच्चों के लिए हुई-यानी नवोदय विद्यालयों की परत। इस तरह 1986 की शिक्षा नीति ने समान स्कूल प्रणाली की जगह बहु-परती शिक्षा व्यवस्था स्थापित करने की वैधानिक घोषणा कर दी जिसने 1990 के दशक में वैश्विक बाजार की ताकतों को शिक्षा के निजीकरण व बाजारीकरण की धरातल दी।
नई आर्थिक नीति के बाद वैश्विक बाजार का प्रतिनिधित्व करने वाली दो ताकतवर संस्थाओं, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष एवं विश्व बैंक ने भारत सरकार के सामने कर्ज व अनुदान पाने के लिए अपनी शर्तों का पैकेज रखा। इसका नाम था ‘संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम‘ (स्ट्रक्चरल एडजस्टमेंट प्रोग्राम)। इसके तहत सरकार के लिए यह आवश्यक हो गया कि वह देश के शिक्षा व स्वास्थ्य समेत सभी समाज विकास और कल्याण कार्यक्रमों पर खर्च घटाये। सरकार ने ये शर्तें स्वीकारी। उल्लेखनीय है कि कोठारी शिक्षा आयोग ने कहा था कि पूर्व प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक उम्दा गुणवत्ता की शिक्षा देने के लिए जरूरी है कि देश के सकल राष्ट्रीय उत्पाद का कम से कम 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च किया जाए। इसके बावजूद सन् 1991 की आर्थिक नीति के चलते अगले 25 सालों में सकल राष्ट्रीय उत्पाद के प्रतिशत के रूप में शिक्षा पर किया जाने वाला खर्च लगातार घटाया गया, सिवाय बीच के दो वर्षों के। सन् 2007-08 में यह खर्च घटते-घटते बीस वर्ष पूर्व के स्तर पर आ गया यानी सकल राष्ट्रीय उत्पाद का महज 3.5 प्रतिशत। स्पष्ट है कि जनता के सभी तबकों को समतामूलक गुणवत्ता की शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए शासक वर्ग की राजनीतिक इच्छाशक्ति घटती गयी है। ऐसा करने में वैश्विक बाजार की ताकतों का छिपा हुआ एजेंडा भारत की विशाल सरकारी स्कूल प्रणाली (आज लगभग 12 लाख स्कूल) को ध्वस्त करना था ताकि उसकी जगह फीस लेने वाले निजी स्कूल ले सकें। इसी एजेंडे का दूसरा पहलू सरकार को शिक्षा के प्रति अपनी संवैधानिक जवाबदेही से बरी होने का मौका भी देना था। लेकिन इतनी बड़ी और स्थापित व्यवस्था को खत्म करना आसान न था। अतः विश्व बैंक ने सन् 1993-94 से सरकारी खर्च में कटौती के फलस्वरूप हुई क्षति की आंशिक पूर्ति के नाम पर शिक्षा के लिए कर्ज व अनुदान का कार्यक्रम शुरू किया जिसको जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (डीपीईपी) के नाम से जाना जाता है जहां से पूरे भारत में केन्द्रीय और राज्य सरकारें मिलकर आठ साल की प्रारंभिक शिक्षा पर लगभग 40000 करोड़ सालाना खर्च कर रही थी वहीं विश्व बैंक ने स्वयं द्वारा प्रायोजित डीपीईपी में महज 500-1000 करोड़ रूपये सालाना खर्च करके स्कूली शिक्षा नीति पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। विश्व बैंक और इसकी सहचर अंतर्राष्ट्रीय वित्तपोषक संस्थाओं की इस घुसपैठ के फलस्वरूप अगले 10-15 सालों में भारत की पूरी स्कूल व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई। वैश्विक बाजार की इस रणनीति के निम्नलिखित तत्व पहचाने जा सकते हैं-

 समान शिक्षा स्कूल प्रणाली की जगह बहु-परती शिक्षा व्यवस्था हुई। हरेक तबके के लिए एक अलग गुणवत्ता की शैक्षिक परत बिछाने का नया समाजशास्त्रीय सिद्धांत गढ़ा गया। शिक्षा के जरिए दो प्रकार के नागरिक बनाने की कोशिश हो रही है।

 नियमित शिक्षक की जगह अर्हताविहीन, कम वेतनभोगी और ठेके पर नियुक्त पैरा शिक्षक (शिक्षाकर्मी, पंचायतकर्मी, गुरू जी आदि) ने ली।

 शिक्षा नीति के निर्णय हमारी संसद और विधानसभाओं में न होकर देशी व अंतर्राष्ट्रीय बाजार एवं विश्व बैंक के मुख्यालय में होने लगे।

 सरकार द्वारा अपनी जिम्मेदारियों को त्यागकर शिक्षा को गैर सरकारी संगठनों (एन.जी.ओ), बड़े काॅर्पोरेट घरानों एवं धार्मिक (साम्प्रदायिक समेत) संगठनों को सौंपने का खतरनाक सिलसिला शुरू हुआ।

शिक्षा का अधिकार कानून में एक नया शिगूफा छोड़ा गया है कि निजी स्कूलों में पड़ोस के गरीब बच्चों के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था। कानून में 25 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान का न तो शिक्षा के अधिकार से कोई संबंध है और न ही समान स्कूल प्रणाली से। इससे चलते शिक्षा में निजीकरण और बाजारीकरण की रफ्तार और तेज हो गई है। वाउचर प्रणाली निजी स्कूलों को पिछले दरवाजे से सरकारी धन उपलब्ध कराने और वैश्विक बाजार को संतुष्ट करने का नायाब तरीका है

धुर दक्षिणपंथी मोदी सरकार द्वारा वर्तमान शिक्षा बजट में हजारों करोड़ रूपए की कटौती कर शिक्षा का बाजारीकरण किया जा रहा है। शिक्षा के निजीकरण और बाजारीकरण में केन्द्र व राज्य की भाजपा सरकारें वो करने जा रही हैं जो पिछले साठ बरसों में किसी सरकार ने नहीं किया। पिछले 20-22 सालों में भारत की शिक्षा नीति विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन (डब्लू.टी.ओ.) और तमाम अंतराष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों के पास गिरवी रख दी गई और देश के संविधान को ताक पर रख दिया गया है। इस सारी प्रक्रिया में अकेले कांग्रेस ही शामिल नहीं है, संसद में शामिल सभी पार्टियां इसमें हिस्सेदार रही हैं। भाजपा खुद इसमें प्रमुख हिस्सेदार रही।

पिछले एक साल में मोदी सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में पिछले सरकारों के शिक्षा के निजीकरण के एजेंडे को और तेज करने का काम किया है। इसका सबसे बड़ा सबूत ये है कि 2014-15 में जो बजट पेश किया गया था उसमें शिक्षा के बजट को 83 हजार करोड़ रूपये से घटाकर उसे 69 हजार करोड़ रूपए कर दिया गया। यानी 13 हजार 7 सौ करोड़ आए की कमी कर दी गई। कुल मिलाकर 16.5 प्रतिशत की कटौती। सत्तर साल के इतिहास में पहली बार ये हुआ है कि किसी सरकार ने शिक्षा का बजट बढ़ाने की बजाए घटा दिया। कुल मिलाकर इस समय एजेंडा निजीकरण-बाजारीकरण और और भगवाकरण का है और शिक्षा को मुनाफाखोरी का धंधा बना देने का है। मानव संसाधन मंत्री कहते हैं कि हम शिक्षा नीति पर लोगों से बात करेंगे, लेकिन केंद्रीय विश्वविद्यालयों का एक एक्ट लगभग तैयार है और इस पर कोई बात करने को तैयार नहीं है। बिना किसी से पूछे यूजीसी ने नौकरशाहों का तैयार किया हुआ नवीन पाठ्यक्रम सारे केंद्रीय विश्वविद्यालयों पर थोप दिया। उनको आदेश दे दिया गया कि इसका पालन करो। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने निरक्षरता उन्मूलन के लिए पूरे देश के पैमाने पर चलाए जा रहे ’साक्षर भारत कार्यक्रम’ को 31 मार्च 2018 से बंद कर दिया है। फलस्वरूप पूरे देश में इस कार्यक्रम की रीढ़ की हड्डी रहे 400 जिलों के प्रेरकों (प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक महिला व एक पुरूष प्रेरक) और 1980 से मानव संसाधन विकास मंत्रालय के प्रौढ़ साक्षरता कार्यक्रम/साक्षर भारत/निरक्षरता उन्मूलन कार्यक्रम में अकादमिक व तकनीकी संसाधन समर्थन कर रहे 32राज्य संसाधन केंद्रो (हर राज्य में एक या दो कार्यरत्) के पास अब कोई कार्य नहीं है। वे पूरी तरह बेरोजगार हो चुके हैं। और अब तो मानव संसाधन मंत्रालय ने यूजी.सी को ही खत्म कर दिया है।

कम दर्ज संख्या के आधार पर पूरे देश में 4000 स्कूलों को बंद किया जा रहा है। इसे युक्तियुक्तकरण का नाम दिया जा रहा है। देश में 40 फीसदी स्कूलों में छात्रों के लिए व 38 फीसदी स्कूलों में छात्राओं के लिए शौचालय नहीं है। 54 फीसदी स्कूल चारदीवारी से सुरक्षित नहीं हैं, 43 फीसदी स्कूलों में लाइब्रेरी नहीं है और 14 फीसदी स्कूलों में पीने का पानी नहीं है। प्राथमिक स्कूलों में ही देश में 12 लाख शिक्षकों की कमी है और 35 फीसदी से ज्यादा स्कूलों में केवल एक या दो शिक्षक ही है, जो पांचों कक्षाओं की पढ़ाई करवाते हैं।

वैश्विक बाजार की ताकतें चाहती हैं कि शिक्षा, खरीद-फरोख्त की वस्तु बन जाए ताकि इससे मुनाफा कमाया जा सके। यदि वे सफल हो जाती हैं तो फिर शिक्षा के अधिकार के क्या मायने रह जायेंगे। आज जरूरत इस बात की है कि साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण के एक हिस्से के रूप में ताबड़तोड़ तरीके से लागू किए जा रहे शिक्षा के निजीकरण/व्यवसायीकरण तथा सांस्कृतिक अधःपतन के खिलाफ अखिल भारतीय स्तर पर एक क्रांतिकारी विद्यार्थी आंदोलन छेड़ा जाय।

एक सच्ची क्रांतिकारी विद्यार्थी राजनीति का मतलब केवल फीस-बढ़ोतरी के विरूद्ध लड़ना, कक्षाओं में सीटें घटाने के विरूद्ध लड़ना, मेस में खराब खाने को लेकर लड़ना, छात्रावासों की संख्या बढ़ाने के लिए लड़ना और कैम्पस में जनवादी अधिकारों के लिए लड़ना मात्र नहीं हो सकता। हालांकि ये प्रगतिशील विधार्थी आंदोलन के लिए फौरी और जरूरी कर्तव्य हैं। लेकिन क्रांतिकारी विद्यार्थी राजनीति वही हो सकती है जो कैम्पसों की बाड़बन्दी को तोड़कर विद्यार्थियों को व्यापक मेहनतकश जनता के जीवन और संघर्षों से जुड़ने के लिए तैयार करे और उन्हें इसका ठोस कार्यक्रम दे। ऐसा किए बिना क्रांतिकारी विद्यार्थी आंदोलन मध्यवर्गीय अवसरवाद, अराजकतावाद, व्यक्तिवाद और मजदूर वर्ग के प्रति तिरस्कार भाव की प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हो सकती है।

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तुहिन
महासचिव
क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच (कसम)
मो.- 095899-57708, 94255-60952
ईमेल- tuhindebchhattisgarh@gmail.com

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