उनका क्या जो 13 बरस बाद बेगुनाह साबित किए गए हैं ….

उनका क्या जो 13 बरस बाद बेगुनाह साबित किए गए हैं ….

उनका क्या जो 13 बरस बाद बेगुनाह साबित किए गए हैं ….
[ज़ुलेख़ा जबी की पोस्ट से ]
 उप्र के रामपुर की एक अदालत में मुल्क से गद्दारी के इल्ज़ाम में क़ैद मुमताज़ मियां पर 13 बरस तक मुक़दमा चलाया गया और पर्याप्त सुबूत न होने की बिना पे 3 दिन पहले बाइज़्ज़त बरी कर दिया गया….. ग़ौरतलब बात ये है कि 13 अगस्त 2002 में थाना गंज इलाक़े में छापा मार कर 3 नौजवानों “एसटीएफ” की टीम ने गिरफ़्तार किया था और पुलिसिया पूछताछ के दौरान (बक़ौल एस टी एफ) उनकी ही 
 तथाकथित निशानदेही पे मुमताज़ मियां को मोहल्ला मुल्लाज़रीफ़ से हिरासत में लिया था पुलिस ने उनके क़ब्ज़े से फ़ौजी ठिकानों के नक़्शों के साथ ही कॉल डिटेल्स और कॉम्प्युटर मिलने का दावा भी किया था और मुमताज़ पे ये भी इलज़ाम धरा गया था कि वो मुल्क के खिलाफ जंग की तैयारी कर रहा है और उसका ताल्लुक़ पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के साथ ह….
मगर गुज़रे 13 बरसों में रामपुर पुलिस और “एसटीएफ” मिलकर भी मुमताज़ मियां और उन 3 नौजवानों के ख़िलाफ़ मुल्क से गद्दारी का कोई भी सुबूत नहीं जुटा पाए – आख़िरकार पिछले हफ्ते अदालत ने मुमताज़ मियां को बेगुनाह बताते हुए बाइज़्ज़त बरी कर दिया (उनके साथ के 3 तीन नौजवान पहले ही बाइज़्ज़त बरी किया जा चुके हैं)…… एक तरफ़ ये या इस जैसी सैंकड़ों ऐसी शर्मनाक घटनाएं जो इस मुल्क की ख़ुफ़िया एजेंसियां “हिन्दू आतंकी” संगठनों के इशारे पे अंजाम देते हुए अपने ही नागरिकों के संवैधानिक, इंसानी हक़ों का घोर उल्लंघन कर रही हैं…..
दूसरी तरफ़ ऐसे ही 13 बरस की अनथक मेहनत के बाद सलमान ख़ान आख़िरकार गुनाहगार साबित होते हैं- मगर फिर भी (एक मिनट जेल में गुज़ारे बग़ैर) “ज़मानत” पर जेल से बाहर हैं जबकि ये 13 बरस उन्होंने गवाहों को तोड़ने, सबूतों को ख़त्म करने और अदालत को गुमराह करने में लगाये हैं
भारतीय न्यायप्रणाली, सरकारें, सेना, पुलिस प्रशाषन और मिडिया किस तरह अपने देश के मुस्लिम अल्पसंख्यक नागरिकों के साथ ग़ैर क़ानूनी और ग़ैर संवैधानिक तौर पे बर्बर हो सकती हैं इसके हज़ारों उदाहरण गुज़रे 67 बरसों में बार बार देखने को मिले हैं……
पिछले बरस जिस दिन (16 मई 2014) आज के प्रधानमंत्री की जीत का जश्न उरूज (चरम) पे था उसी दिन अहमदाबाद के सेशन कोर्ट से “फांसी” की सजा पाये मुफ़्ती अब्दुल क़य्यूम, मुफ़्ती अब्दुल्लाह व 4 अन्य मुस्लिम नौजवान बेगुनाह होते हुए भी 11 बरस जेल की सज़ा काटकर बाहर किये गए, वे गुजरात पुलिस के झूठे 2002 के अक्षरधाम मंदिर पे हुए तथाकथित आतंकी हमले के तहत “ज़बरदस्ती” आरोपी बना दिये गए थे – मगर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 16 मई 2014 को अक्षरधाम पे हुए “फ़र्ज़ी आतंकी” हमले के सभी आरोपों से बाइज़्ज़त बरी कर दिया गया था ———–लेकिन किसी भी सरकार को इन बेगुनाह मुसलमानों के लिए शर्म का एहसास और मीडिया को इनके नागरिक हक़ों की हक़तल्फ़ी के ज़िम्मेदार सफ़ेदपोशों में से किसी पे भी “सवाल” उठाने का अपना “फ़र्ज़” याद नहीं रहा ———–सलमान की ज़मानती धाराओं पे भी कोहराम बरपा करने वाले मिडिया की मुमताज़ मियां की रिहाई पे ख़मोशी कातिलाना चुप्पी ही कही जाएगी जो चहुँ ओर पसरी पड़ी है…. (Roznama Khabren- Urdu)

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