📽📽 अतीत का सिनेमा और प्रेमचंद-  शरद कोकास

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31.07.2018

यह बात अधिकांश लोगों को ज्ञात नही है कि उपन्यास सम्राट प्रेमचंद के अनेक उपन्यासों और कहानियों पर विभिन्न निर्माताओं द्वारा विगत में फिल्मों का निर्माण किया गया है। इस अनभिज्ञता का कारण यह भी हो सकता है कि यह फिल्में उस तरह लोकप्रिय नही हो पाईं जैसे कि उनके उपन्यास और कहानियाँ लोकप्रिय हुईं ।

प्रेमचंद जी के बारे में बताया जाता है कि वे सन 1934 में फिल्मों की कहानी लिखने के लिए मुंबई गए थे । उन्होंने सर्वप्रथम अजंता सिनेटोन नामक सिनेमा कंपनी में कहानी लेखक की नौकरी भी की और उन्हें मासिक वेतन प्राप्त होता था। उन दिनों फिल्मों में अभिनेता भी एक अनुबंध के साथ मासिक वेतन पर ही रखे जाते थे । लेकिन प्रेमचंद जी का फिल्मी दुनिया और मुंबई का अनुभव काफी कटु रहा और वे एक साल का अनुबंध पूरा करने के पहले ही वाराणसी वापस आ गए । वास्तव में मुम्बई का भीड़ भरा दमघोटू वातावरण और वहां की फिल्मी दुनिया का हवा पानी उन्हें रास नहीं आया.

मुम्बई में रहते हुए उन्होंने मिल *मजदूर* फिल्म के संवाद और पटकथा भी लिखी । मोहन भगनानी के निर्देशन में बनी यह फिल्म नाकाम रही हालाँकि पंजाब दिल्ली ,उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश आदि स्थानों पर इसका प्रदर्शन हुआ । यह एक देशी मिल मालिक और मजदूरों की कहानी थी ।प्रेमचंद ने इसमें मिल मालिकों और मजदूरों के बीच पंच की भूमिका भी अदा की थी । यह फ़िल्म मज़दूरों में लोकप्रिय हो ही रही थी कि अंग्रेज सरकार को यह पसंद नही आई और मजदूर आंदोलन पर न उतर आये इस डर से उसने इस पर बैन लगा दिया और यह फ़िल्म पेटी में बंद हो गई । *दुर्भाग्य से इसका एक भी प्रिंट अब उपलब्ध नही है वरना हम लोग प्रेमचंद जी को अभिनय करता हुआ भी देख पाते ।*

उसके बाद प्रेमचंद की कहानियों पर 1934 में फ़िल्म *नवजीवन* बनी ।

के सुब्रमण्यम ने 1938 में *सेवासदन* उपन्यास पर इसी नाम से फिल्म बनाई जिसमें सुब्बा लक्ष्मी ने मुख्य भूमिका अदा की थी.

उसके बाद ए आर कारदार ने 1941 में त्रिया चरित्र पर फ़िल्म  स्वामी बनाई जो नहीं चली ।

सन 1946 में *रंगभूमि* पर इसी नाम से फिल्म ब नी ।

मृणाल सेन ने 1977 में *कफन* कहानी पर बांग्ला में ‘ओका ऊरी कथा’ बनाई ।

साल 1963 में *गोदान* तथा 1966 में *गबन* का निर्माण हुआ ।

दूरदर्शन ने उनके उपन्यास *निर्मला* पर इसी नाम से धारावाहिक का निर्माण किया जो सालों चलता रहा ।

प्रेमचंद के उपन्यास या कहानी पर बनी किसी फिल्म ने *शतरंज के खिलाड़ी* के रूप में आखिरकार सफलता का मुंह देखा । निर्देशक सत्यजित रे 1977 में इसका निर्माण किया. शतरंज के खिलाड़ी को तीन फिल्म फेयर अवार्ड मिले इनके अलावा 1978 में बर्लिन महोत्सव में गोल्डन बीयर अवार्ड भी मिला ।उपन्यास में कहानी 1856 के अवध नवाब वाजिद अली शाह के दो अमीरों के जीवन की कथा है ।

इसके पश्चात सत्यजित रे ने 1981 में *सदगति* का भी निर्माण किया ।

किसी साहित्यिक कृति पर फ़िल्म निर्माण बहुत जोखिम का काम है । अक्सर उस कृति की तरह फिल्में लोकप्रिय नही हो पातीं । प्रेमचंद के उपन्यास और कहानियों ने पाठकों को आकर्षित किया किन्तु उन पर बनी फिल्में दर्शकों को अधिक पसंद नहीं आईं ।

हिन्दी कथा साहित्य को कल्पना लोक से बाहर लाकर उसे यथार्थ का धरातल प्रदान करने का कार्य प्रेमचंद ने किया । उन्होंने साहित्य में यथार्थवादी परम्परा की नींव रखी ।

साहित्यिक कृतियों पर जब फ़िल्म निर्माण का कार्य प्रारम्भ हुआ उस समय सिनेमा और साहित्य की भूमिका अलग अलग हो चुकी थी । प्रारम्भिक दौर में सिनेमा और साहित्य दोनों का उद्देश्य केवल मनोरंजन ही था । साहित्य के रूप में तिलिस्मी कहानियां , अरब के किस्से , अलीबाबा चालीस चोर, हातिमताई जैसी कहानियां आदि मशहूर थीं और इन पर बनी फिल्में भी खूब चलीं ।

उसके अलावा धार्मिक साहित्यिक कृतियों पर भी फिल्मों का निर्माण हुआ जैसे भारतेंदु हरिश्चंद्र की कहानी पर दादासाहेब फालके ने हरिश्चंद्र फ़िल्म का निर्माण किया लेकिन वह भी लोकप्रिय नही हुई हालाँकि आज उसे क्लासिक फ़िल्म की श्रेणी में रखा जाता है ।

प्रेमचंद ने यथार्थवादी कहानियां लिखीं सो उन पर वैसी ही फिल्मों का निर्माण सम्भव था । फिल्मी मसाले , लटके- झटके और नृत्य आदि के लिए उनमे कोई स्थान नही था । इसलिए उनमे तत्कालीन स्थितियों में मनोरंजन का अभाव था जो उन फिल्मों के लोकप्रिय न होने का कारण बना ।

हालाँकि उन फिल्मों में भारत की जनता और उसकी परिस्थितियों का भावनात्मक चित्रण था इसलिए वे फिल्में चली अवश्य और संगीत पक्ष भी उनका प्रबल रहा । इन फिल्मों में अच्छे अच्छे अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने भी भूमिकाएं कीं ।

मुझे लगता है कि फिल्मों के मामलों में आज जनता की समझ पहले से बहुत ज़्यादा विकसित हो चुकी है । नई सोच के फ़िल्म निर्माता और निर्देशक फिल्मी दुनिया मे हैं । संगीतकार भी अच्छे हैं । आज यदि कोई निर्देशक प्रेमचंद की कहानी पर फ़िल्म बनाता है तो वह बिल्कुल अलग तरह से उसका ट्रीटमेंट करेगा ।

यद्यपि प्रेमचंद उस समय की मुम्बई की फिल्मी दुनिया , उसके क्रियाकलाप और कार्यव्यवहार से बहुत दुखी थे । वे गाँव की मिट्टी से जुड़े हुए लेखक थे और ग्लैमर के लिए मुंबई नही गए थे । उनका उद्देश्य अर्थोपार्जन तो था ही लेकिन वे देश की पीड़ित शोषित जनता की स्थिति अपनी कहानियों के माध्यम से रखना चाहते थे । अफसोस यह कि वे खुद मुम्बई जैसे शहर में शोषण का शिकार हुए । उनकी फिल्म *मजदूर* पर सरकार ने बैन लगा दिया और उनका स्वप्न चूर चूर हो गया । उसके बाद 1936 में उनका निधन हो गया और फिर किसी स्वप्न की भी गुंजाइश नही रही ।

आज उनकी कृतियों पर फ़िल्म निर्माताओं को फिल्में बनाना चाहिए ताकि किताबों से दूर भागने वाला यह युवा वर्ग फ़िल्म के माध्यम से ही सही देश के सामाजिक और राजनैतिक अतीत से परिचय प्राप्त कर सके और वर्तमान समाज के निर्माण में अपने पुरखों के योगदान को रेखांकित कर सके ।

शरद कोकास 

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