एक लोक कलाकार जो कथा बन गया . : चमरु यादव का नाम सुना है आपने ? : नाचा थिएटर के निसार अली से बातचीत पर आधारित : ‘नाचा की कहानी, निसार की जुबानी’ का एक अंश. ◼️ दिनेश चौधरी

29.07.2018

चमरू यादव की कथा रोंगटे खड़े कर देने वाली है। सुनते-सुनते जिस्म में सिहरन-सी होने लगती है। झुरझुरी उठती है रीढ़ की हड्डी में! बहुतेरे कलाकारों की अदाकारी आपने देखी होगी। कुछ के बारे में फकत सुना होगा। चमरु यादव कोई ऐसा नाम नहीं है, जिससे वाक़िफियत की उम्मीद एक बड़े तबके से की जा सके। दुर्भाग्य से उनकी पहचान मुल्क में चंद लोगों के बीच भी नहीं है, सिवाय उनके जो उनके हल्के में उनकी अदाकारी के इस कदर दीवाने थे कि यदि वे उन दिनों में निर्दलीय चुनाव लड़ते तो पार्टी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो जाती। वो एक ऐसा सितारा था जिसकी चमक कम लोग देख पाए थे। वो किसी काली-अंधेरी रात में बस टूटकर गिर गया। उसे गिरते हुए किसी ने न देखा। उन लम्हों में उनके लबों पर उन्हीं का लिखा यह गीत मचलता रहा होगा :

तोर ताजमहल ह रे संगी
होगे भूत परेत के डेरा ।

अजगर कस अंटीयावत सुते
मीठा नींद परे हे …
अमराजा ह मोदगर धरके
मुड्सरिया म खड़े हे ….

झकना के तयं उठ जाबे
जब बेत के परही सोटा…

(यह जो तुम्हारा ताजमहल है साथी, भूत-प्रेत का डेरा हो गया है/ तुम इसमें अजगर की मानिंद मीठी नींद में पड़े हो/उधर गदा पकड़े हुए यमराज ऐन तुम्हारे सिर पर खड़ा है/ जब वक्त की लाठी चलेगी, तुम एक झटके में रुखसत हो जाओगे…)

खुद चमरु अजगर की मानिंद सोने वाले नहीं थे। कैसे सोते भला? वे तो नाचा-गम्मत के आर्टिस्ट थे जो खुद भी जागता है और अपने दर्शकों को भी जगाता है। नींद से नहीं, जागती आंखों से। जागती आंखों में ख्वाब भरने वाले नाटकों से। वे नाटक जो उन्मुक्त हास्य और तीखे तंज से प्रारम्भ होकर किसी गहरी बात पर जाकर थमते थे और हरेक दर्शक को उनमें से कहीं अपनी कोई कथा दिख जाती थी। चमरु के दर्शक ठहाके लगाकर हँसते थे और बिलखकर रोते थे। उनके और दर्शकों के बीच एक गहरा नाता था। दर्शक कहते थे चमरु ने उन्हें मोहनी खिला दी है।

नाचा के दर्शकों को मोहनी खिलाने वाला यह कलाकार खुद नाचा-गम्मत के मोह से ग्रसित था। रायपुर के पास भुरखा गाँव का यह बाशिंदा कोई 15 साल की उम्र में ही नाचा के साथ जुड़ गया था। भूमिका जोक्कड़ (जोकर) की। जोकर दर्शकों को खूब हँसाता है। दर्शक अपने गम भूल जाते हैं। वे जिन्हें भरपेट भोजन न मिला हो, अपनी भूख भी भूल जाते हैं। बिछुड़े हुए साथी पूरन हार्डी कहते थे, नाचा भूख को भुलाने की कला है। भूखा कलाकार और भूखे दर्शक आपस में मिलकर खूब हँसते हैं। हँसने से बचे हुए भोजन की कैलोरी-मात्रा की क्षतिपूर्ति हो जाती है।

चमरु के सहायक जोक्कड़ नत्थू थे। दोनों मिलकर नाचा के आरम्भ में ही समाँ बाँध देते थे। नत्थू चमरु के कटे हुए पैर के नीचे से कोई चीज आर-पार निकालता और दर्शकों को बताता कि यह जोक्कड़ तो ‘खोरवा’ (लंगड़ा) है। खोरवा अपने कटे हुए पैर से नत्थू पर भरपूर प्रहार करता और वह चारों खाने चित्त हो जाता। चमरु कहता कि वह भले ही खोरवा है पर उसके पैरोँ में दम है। वह अपंग है पर उसकी अपंगता का मजाक सिर्फ वही उड़ा सकता है। किसी और ने उड़ाया तो उसे वैसी ही लात पड़ेगी, जैसी अभी-अभी नत्थू खा चुका है।

चमरु ने अपने पैर की आहुति नाचा करते हुए ही दी। नाचा करते हुए एक पैर में कंकड़ चुभ गया होगा जो घाव में तब्दील हो गया। गाँव में दवाएँ देसी ही मिल पाती हैं और डॉक्टर झोला-छाप। ठीक-ठाक इलाज नहीं हो पाया। जख्म फैल गया और पैर को काटना पड़ा। कटे हुए पैर को लेकर जोक्कड़ भला घर में कैसे पड़ा रहा सकता था। उसने बैसाखी उठाई और नाचा के मैदान में कूद पड़ा। अब जोक्कड़ खोरवा हो चुका था। मैनेजर, स्क्रिप्ट राइटर, गीतकार और म्यूजिशियन भी वही खोरवा था। नाचा पार्टी की पहचान भी उसी से थी सो उसका नाम ‘खोरवा नाचा पार्टी’ पड़ गया।

‘सूरदास’ खोरवा नाचा पार्टी का प्रमुख नाटक था। सूरदास की भूमिका चमरु ही करते थे। सूरदास की पत्नी गुजर जाती है तो वह एक विधवा से ब्याह रचा लेता है। सौतेली माँ उसके लड़के और लड़कियों को खूब सताती है। अंधे सूरदास की आँखे खुलती हैं और वह अपनी संतानों के साथ अलग हो जाता है। उधर पत्नी की अनब्याही लड़की गर्भवती हो जाती है तो उसकी आँख खुलती है और औलाद के प्रति कर्तव्य-बोध जागृत होता है। चमरु ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे पर अपने समाज-देस-काल के लिए चिंतित रहते थे।

खोरवा नाचा पार्टी की लोकप्रियता चरम पर थी। नियति को उनकी प्रसिद्धि से ईर्ष्या हो आई। उसने कुछ ऐसा षड्यंत्र रचा कि चमरु का दूसरा पैर भी कट गया। एक पैर घुटनों के थोड़ा नीचे बचा था और दूसरा घुटनों के ऊपर होकर रह गया। चमरु को घर में बैठना पड़ा। तकलीफ बढ़ गई। तकलीफ यह नहीं थी कि दोनों पैर कट गए हैं। तकलीफ यह थी कि नाचा छूट गया था। चमरु ने अपने दर्शकों को नाचा की मोहनी दी थी और खुद भी खाई थी। उसने कहा कि वह नाचा के बगैर मर जाएगा पर उसके साथी सोचते कि इस इंसान का करें क्या जो अब दोनों पैरों से हाथ धो बैठा है।

चमरु ने साथियों को धमकाया कि वह नाचा के बगैर घर में बैठकर मरा तो प्रेत योनि में जाएगा और सबसे पहले उन्हें ही सताएगा। वे डर तो गए पर करते क्या? हल खुद चमरु ने निकाला। एक दिन घर में बैठे-बैठे साइकिल के पुराने टायर-ट्यूब और कपड़ों की सहायता से कटे हुए पैरों के ‘जूते’ तैयार किए और बैसाखी के सहारे फिर से नाचा के मैदान में कूद पड़े। कटे हुए पैरों में घुँघरू बदस्तूर सजे रहे। कहते हैं कि इन्हीं घुँघरुओं के खरोचों की वजह से ही उनके जिस्म को नुकसान पहुँचा था पर वे कतई इसे त्यागने के फेर में नहीं रहे।

किसी ठाकुर नाम के कलाकार से प्रेरणा ग्रहण करते थे। कहते थे कि ठाकुर नाचा करते-करते मरा। बहुत बढ़िया गवैया था। एक बार ऐसा ऊँचा आलाप लिया कि सुर के साथ साँसे भी उसी ऊँचाई पर लटक कर रह गईं, वापस नहीं लौटीं। चमरु ठाकुर की तरह नाचा करते हुए मरना चाहते थे। चमरु ठाकुर की तरह नाचा करते हुए मर गए।

इन दिनों बायोपिक का चलन है। चमरु को ढूंढने वाले निसार अली कहते हैं चमरु को पहली बार देख-सुनकर उन्हें पृथ्वीराज कपूर के लहजे की याद हो गई थी। उनका अद्भुत कला-प्रेम और संघर्ष बॉयोपिक बनाने वालों के लिए एक चुनौती है। वे चाहें तो उन्हें पर्दे पर उकेर कर बताएँ, बाकी उन्हें ढूंढने-जानने-समझने की जेहमत तो उठानी ही पड़ेगी।

(नाचा थिएटर के निसार अली से बातचीत पर आधारित। शीघ्र- प्रकाश्य पुस्तक ‘नाचा की कहानी, निसार की जुबानी’ का एक अंश।)

◼️दिनेश चौधरी

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