राफेल डील: समझौते से 12 दिन पहले बनी रिलायंस कंपनी के पास न लाइसेंस था और न ही जमीन और बिल्डिंग : आइये पूरे विस्तार से मामले को समझते हैं.: जनचौक ब्यूरो

राफेल डील: समझौते से 12 दिन पहले बनी रिलायंस कंपनी के पास न लाइसेंस था और न ही जमीन और बिल्डिंग : आइये पूरे विस्तार से मामले को समझते हैं.: जनचौक ब्यूरो

  • मोदी जी सचमुच चमत्कारी हैं जानिये कैसे ?

ख़ास रपट , नई दिल्ली, शुक्रवार ,

27-07-2018
जनचौक ब्यूरो 

नई दिल्ली। मोदी सरकार द्वारा फ्रांस से किए गए राफेल समझौते में झोल ही झोल है। ये देश में क्रोनी कैपिटलिज्म का सबसे जीता जागता उदाहरण है। सरकार ने गोपनीयता का हवाला देकर सौदे के बारे में भले ही न बताया हो लेकिन जो चीजें सामने आ रही हैं वो किसी को भी चौंकाने के लिए काफी हैं।

मसलन रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहती हैं कि किसी तरह का आफसेट समझौता नहीं हुआ है। लेकिन रिलायंस प्रेस रिलीज जारी कर न केवल समझौते के बारे में विस्तार से बताता है बल्कि सरकार द्वारा छुपायी जा रही राफेल की कीमतों का भी खुलासा कर देता है।

पूरी डील अंतरविरोधों से भरी पड़ी है। अनिल अंबानी की जो कंपनी फ्रांसीसी कंपनी डसाल्ट से डील करती है वो समझौते से महज 12 दिन पहले बनाई जाती है। और सबसे खास बात ये है कि एयरक्राफ्ट बनाने का लाइसेंस तक उसके पास नहीं था। और न ही जमीन, बिल्डिंग और जरूरी ढांचा। ऊपर से कंपनी का जो पता दिया गया था उसका मालिकाना भी उसके पास नहीं था। नतीजे के तौर पर एक झूठ को छिपाने के लिए सरकार को अब हजार झूठ बोलने पड़ रहे हैं। 

अब आइये पूरे विस्तार से मामले को समझते हैं। यूपीए सरकार के शासन में 13 मार्च 2014 को फ्रांस की डसाल्ट कंपनी के साथ सौदा हुआ था। जिसमें 18 विमान खरीदे जाने थे और बाकी भारत सरकार की कंपनी एचएएल द्वारा बनाए जाने थे। और उसके साथ 36,000 करोड़ का आफसेट समझौता हुआ था। लेकिन पीएम मोदी ने सत्ता में आते ही इस समझौते को रद्द कर दिया। और 10 अप्रैल 2015 को डिफेंस आफसेट कांट्रैक्ट एक निजी कंपनी रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को चला गया। जिसे लड़ाकू विमान बनाने का जीरो अनुभव था। यहां तक कि पीएम द्वारा 10 अप्रैल 2015 को 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद की घोषणा से 12 दिन पहले (28 मार्च 2015) रिलायंस डिफेंस लिमिटेड कंपनी का निर्माण हुआ। खास बात ये है कि इस कंपनी के पास लड़ाकू विमान बनाने का कोई लाइसेंस नहीं था.

दिलचस्प बात ये है कि लाइसेंस रिलायंस की उस कंपनी को मिलता है जो राफेल सौदे में कहीं दूर-दूर तक सीन में नहीं थी। *रिलायंस एरोस्ट्रक्चर लिमिटेड* नाम की इस कंपनी को *22 फरवरी 2016 को लाइसेंस मिलता है। लेकिन उस समय न तो उसके पास अपनी जमीन थी न ही बिल्डिंग समेत कोई इंफ्रास्ट्रक्चर।* इससे भी ज्यादा चकित करने वाली बात ये है कि *रिलायंस एरोस्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी का निर्माण सौदा घोषित होने के 14 दिन बाद यानी 24 अप्रैल 2015 को हुआ। सौदे की घोषणा पीएम द्वारा 10 अप्रैल 2015 को की गयी थी।*

और उससे भी ज्यादा चकित करने वाला खुलासा तब होता है जब रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन बाकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर 30,000 करोड़ के डिफेंस ऑफसेट कांट्रेक्ट के होने से इंकार कर देती हैं।

जबकि रिलायंस खुद अपनी वार्षिक रिपोर्ट में इस पूरे सौदे का खुलासा करता है। रिलायंस डिफेंस लिमिटेड डसाल्ट एविएशन के साथ न केवल 30,000 करोड़ रुपये के आफसेट कांट्रेक्ट की बात करता है बल्कि 1 लाख करोड़ रुपये के लाइफसाइकिल कॉस्ट कांट्रेक्ट की भी जानकारी देता है।  

रिलायंस ने ये जानकारी 16 फऱवरी 2017 को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में दी थी।

यहां तक कि डसाल्ट एविएशन भी अपनी वार्षिक रिपोर्ट में रिलायंस के साथ आफसेट समझौते की बात बतायी है।
इसके विपरीत  रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन ने 7 फरवरी 2018 को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में डसाल्ट एविएशन के साथ आफसेट कांट्रेक्ट की बात को खारिज कर दी थी। अब इसमें सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि कौन झूठ बोल रहा है। निर्मला सीतारमन या रिलायंस या फिर डसाल्ट एविएशन?

खास बात ये है कि इस मामले में  रक्षा संबंधी सभी नियमों को ताक पर रख दिया गया। जिस सुरक्षा और गोपनीयता के नाम पर सरकार बचने की कोशिश कर रही है खुद सरकार ने उनकी धज्जियां उड़ा दी। किसी भी आफसेट कांट्रेक्ट के लिए रक्षा मंत्रालय ने बाकायदा नियम बना रखे हैं और उसकी बहुत सारी पूर्व शर्तें हैं। जिसको बगैर पूरा किए कोई भी समझौता नहीं हो सकता है।

रक्षामंत्रालय की वेबसाइट पर मौजूद डिफेंस आफसेट मैनेजमेंट विंग के तहत इस गाइड लाइन को कोई भी पढ़ सकता है। जिसमें निम्न बातें कही गयी हैं:

1– सभी आफसेट प्रस्ताव रक्षामंत्री द्वारा पारित किए जाएंगे। साथ ही आफसेट कांट्रैक्ट पर रक्षामंत्रालय के एक्वीजीशन मैनेजर का भी हस्ताक्षर होगा।

2- आफसेट कांट्रैक्ट की प्रगति की हर छह महीने पर डिफेंस आफसेट मैनेजमेंट विंग द्वारा नामित किसी अफसर से आडिटिंग होगी।

3- एक्वीजीशन विंग डिफेंस एक्वीजीशन कौंसिल के सामने इसकी वार्षिक रिपोर्ट पेश करेगी। और इस मामले में किसी तरह की नाकामी पर कंपनी के ऊपर जुर्माना लगेगा।
अब इसमें सवाल उठता है कि क्या रिलायंस और डसाल्ट एविएशन के बीच हुआ 30,000 करोड़ का आफसेट कांट्रैक्ट बगैर रक्षामंत्री की संस्तुति के किया गया? क्या उस पर एक्वीजीशन मैनेजर के हस्ताक्षर हुए थे? छह महीने में आडिट की खानापूर्ति क्यों नहीं की गयी? क्या एक्वीजीशन कौंसिल ने कोई वार्षिक रिपोर्ट पेश की थी?

 अब बात करते हैं रिलायंस को मिले लाइसेंस पर.

भारत में डिफेंस प्रोडक्शन के लिए लाइसेंस इंडस्ट्रियल (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट 1951, रजिस्ट्रेशन एंड लाइसेंस आफ इंडस्ट्रियल अंडरटेकिंग रूल्स 1952 और न्यू आर्म्स रूल्स 2016 के तहत मिलते हैं।

दरअसल रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड और उसकी सहयोगी कंपनियों रिलायंस डिफेंस लिमिटेड और रिलायंस एरोस्ट्रक्चर लिमिटेड को *लड़ाकू विमान बनाने का जीरो अनुभव है।*
वास्तव में *समझौते से 12 दिन पहले रिलायंस डिफेंस लिमिटेड* का निर्माण हुआ। जबकि *रिलायंस एरोस्ट्रक्चर का समझौते के 15 दिन बाद 24 अप्रैल 2015* को निर्माण हुआ। फिर कंपनी ने 2015 में लड़ाकू विमान बनाने की खातिर जरूरी लाइसेंस के लिए आवेदन किया और उसे वाणिज्य मंत्रालय ने 22.02.2016 को दे दिया। गौरतलब है कि उस समय निर्मला सीतारमन ही वाणिज्य मंत्री थीं।

आईये कब लायसेंस मिलने के फ्राड की बात करते हैं 

लड़ाकू विमान निर्माण के लाइसेंस के लिए दिए गए अपने आवेदन में रिलायंस एरोस्ट्रक्चर लिमिटेड ने कंपनी का पता और लोकेशन “सर्वे नंबर-589, तालुका जाफराबाद, गांव लुंसापुर, जिला अमरेली, गुजरात” दिया था। उस समय इस जमीन का मालिकाना रिलायंस एरोस्ट्रक्चर लिमिटेड के पास नहीं था। ऊपर बताया गया पता “पिपावाव डिफेंस एंड आफशोर इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड” के नाम से दर्ज था। यहां तक कि लाइसेंस मिलने के दिन यानी 22 फरवरी 2016 तक इसका मालिकाना रिलायंस एरोस्ट्रक्चर लिमिटेड के पास नहीं था। रिलायंस डिफेंस लिमिटेड ने इस कंपनी को 18 जनवरी 2016 को अधिग्रहीत कर इसका नाम रिलायंस डिफेंस एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड कर दिया। ये रिलायंस के 2015-16 की वार्षिक रिपोर्ट में देखा जा सकता है।

बाद में रिलायंस एरोस्ट्रक्चर लिमिटेड को 28 अगस्त 2015 को महाराष्ट्र के नागपुर में स्थित मिहान सेज में 104 एकड़ जमीन आवंटित की गयी। जिसमें उसकी कीमत तकरीबन 63 करोड़ बतायी गयी है। और मजेदार बात ये है कि इस रकम को जुलाई 2017 में अदा किया गया।

इन सारे मसलों पर कांग्रेस ने मोदी सरकार से जवाब मांगा है। और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक दूसरे तरीके से चुटकी ली है।

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