विस्तारीकरण बनाम विस्थापन : बारनवापारा की फेक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट : पीयूसीएल छत्तीसगढ़ .

( मूल रिपोर्ट का हिन्दी अनुवाद )

28.07.2018

बारनवापारा अभ्यारण्य छत्तीसगढ़ राज्य के महासमुन्द जिले मे स्थित है। बारनवापारा अभ्यारण्य के आस-पास के इलाकों से विस्थापन और वहां रह रहे स्थानीय आदिवासियों द्वारा विस्थापन के विरोध की खबरें लगातार स्थानियअखबारों मे आ रही थी। ग्रामिणों को उनके घरो से हटाए जाने व उनके जंगल व जमीने छीने जाने तथा राजकुमार जो कि स्थानिय आदिवासी है,उसपर अत्याचार व उसके गिरफतारी की जांच करने के लिए पी.यू.सी.एल. की एक टीम 6 फरवरी2018 को सबंधित गांव गई.
इस जांच टीम में रिनचिन, निकिता और पुष्पा शामिल थे.

जांच टीम का मकसद था कि वे इस पूरें मुददे की जांच कर निम्न बातों पर प्रका डालें .

▪ बारनवापारा मे विस्थापन के जटिल मुददे को विस्तृत रूप सें समझना.
▪ राजकुमार जो कि रामपुर गांव का आदिवासी रहने वाले है उसके साथ मार-पिटाई और उसकी गिरफतारी की जांच।
▪. विस्थापन कहां हो रहा है और विस्थापन का वेदांता खदान से क्या संबंध है?
▪ संजय राहोतियां जो कि एक मैहर जाति का वन कर्मचारी है,वो लगातार गांव वालों को डरा व धमका रहा था, जिसका झगड़ा गांव के एक आदिवासी राजकुमार के साथ हो गया था. संजय राहोतियां ने राजकुमार के परिवार के साथ मार-पिटाई की व राजकुमार की पत्नी के साथ लैगिंक शोषण भी किया।गांव वालों की राहोतियां के खिलाफ मांग है कि उसपर कड़ी कारवाई किया जाए, वन विभाग के कर्मचारियों ने इस मुददे को जातिवाद का एक षड़यंत्र प्रचारित किया है उसकी जांच करना.
▪ ग्रामीणो की स्थिति को समझते हुए उनको सहयोग देने के लिए आगे की रणनीति तैयार करना.

बारनवापारा वन्य अभ्यारण्य.

पत्य अभयारण्य छत्तीसगढ़ राज्य के महासमुन्द जिले मे 245 स्क्वायर किलोमीटर की दूरी मे फैला हुआ है। 1972 के वन्य संरक्षण एक्ट के पास होने के बाद 1976 मे यह अभ्यारण्य बना था. बारनवापारा अभ्यारण्य मे विभिन्न प्रकार के वन्यजीव है और इसके अंतर्गत 24 गांव है.

विस्थापन की प्रकिया-

महासमुन्द जिले के गांव रामपुर मे 2012 मे विस्थापन की प्रक्रिया शुरू हुई थी,विस्थापन की पहली मांग यहां 1972 से शुरू हुई थी। वन्य एक्ट,1980 और वन्यजीव एक्ट के तहत वन्य अभ्यारण्य व वन्य प्राणियों को संरक्षित करने के नाम पर 6 गांवो के विस्थापित करने का काम किया जा रहा है। आसपास के गांव को खाली करने का कोई आदेश पारित नही हुआ था। इसलिए गांव वालो को आशवस्त किया गया था कि वे अगर शांतिपूर्ण ढ़ंग से वन अभयारण्य को संरक्षित करने के लिए गांव छोड़ना चाहते है तो छोड़ सकते है, उनसे जबरदस्ती कोई गांव खाली नही करवाएगा। इस अभ्यारण्य के अंतर्गत आने वाले 6 गांवों मे से 3 गांवो ने पुर्नवास की प्रकिया को स्वीकार किया था। ज्यादातर ग्राम वासी गोंड और दूसरे आदिवासी है, जो कि मुख्यत अनुसुचित जाति के लोग है। वे आर्थिक रूप से गरीब आदिवासी है, जिनका जीवन मुख्य रूप से जंगल व जंगल के उत्पादों पर ही निर्भर है।

पुर्नवास स्थल श्रीरामपुर की स्थापना

वन विभाग वालो ने रामपुर से लगभग 45 किलोमीटर की दूरी पर एक नया गांव बसाकर दिया जिसका नाम श्रीरामपुर रखा गया। इसके अलावा ग्रामीणों को लाटेदादर,नयापारा नामक और दो गांवों मे पुर्नवासित किया गया है। ये तीनो गांव कसडोल जिले मे स्थित है, जहां पर उन्हें सामाजिक कल्याण योजना का लाभ जो कि महासमुन्द के हर जिले को दिया जा रहा है,वो भी नही मिल रहा है.

पुर्नवासित स्थल श्रीरामपुर की कुल जनसंख्या 435 है,जिसमे से 212 लोग आदिवासी है। गांव कें अंदर प्रवेश करतें ही एक मंदिर बनाया गया है जो कि बहुत बड़े इलाके मे फैला हुआ है। गांव की जमीन बंजर है और आसपास के इलाके मे जंगल भी नही है।

विस्थस्पित गांव के घर वन विभाग के घरों की तरह बने एक लाईन में बने हुए है,और हरे रंग से पुते हुए है। गांव के आंगनवाडी के सामने सोलार पंप लगा हुआ है जिससे सारा गांव पानी पीता है।

श्रीरामपुर मे कृषि की हालत-

जांच दल को गांव वालों ने बताया कि उनको 1 के बदले 6 एकड़ जमीन देने की का आशवासन देकर पर श्रीरामपुर गांव मे लाया गया था, जमीन तो दिया गया है मगर गांव की जमीन बंजर एंव गडढों भरी है। वन विभाग के द्वारा 5-5.5 हेक्टेयर जमीन गांव के व्यस्क(18 वर्ष) लड़को को दिया गया, यहां पर यह बात विचारणीय है कि गांव की व्यस्क लड़कियों को जमीन नही दिया गया।
गांव मे खेती की जमीन भी बंजर है और सिंचाई के लिए पानी नही है। ग्रामवासी अपने पुराने गांव मे साल भर मे दो रवि व खरीफ फसल बोते थे मगर यहां वे बड़ी मुश्किल से एक ही फसल की बोआई कर पा रहे है। इस गांव से कुछ दूरी पर एक जंगल स्थित है, जिस पर लगभग 50 गांव आश्रित है। मगर इस जंगल से गांव वाले कुछ भी नही ला पा रहे है। गांव वाले बहुत गुस्से मे है क्योंकि उन्हें अपनी सपाट,खेती योग्य और अत्यंत ऊपजाऊ जमीन को इस बंजर जमीन के लिए छोडनी पडी। वहां पर इस गांव की अपेक्षा 6 गुना उत्पादन होता था।

आवास

वन विभाग ने गांव वालो को श्रीरामपुर मे प्रत्येक परिवार को साढ़े 12 डिसमिल जगह मे घर बना कर दिया गया है, मगर घरों की जमीन धसने लगी है। अटल आवास के तहत गांव वालो को घर बना कर नही दिया जा रहा उनसे कहा गया की आप लोगो को पक्का मकान बना कर पहले ही दिया जा चूका है। गांव के लोगो का मानना है कि उनके पुराने पटटे निरस्त नही हुए है तो वो वापस रामपुर चले जायेंगें।

मूलभूत सुविधाएं.

.यहां पर जीने के लिए मूलभूत सुविधाएं जैसे पानी की कमी,रोजगार कार्ड आदि प्राप्त नही है। गांव का स्कूल प्राथमिक स्तर का है जिसमे शिक्षकों की कमी है, स्कूल मे एक ही हैंडपंप है, जिसका पानी पीने लायक नही है। पूरे गांव मे एक ही बोरवेल है जिससे सारा गांव पानी पीता है। सौर उर्जा वाला नल खुदवाया गया था जोकि तेज हवाओं के कारण खराब हो गया जिसे सुधरवाने के लिए गांव वालो ने अर्जी दी है,उन नलों को आज तक नही सुधारा गया है।
गांव वाले वनोपज का उपभोग भी नही कर पा रहे है,क्योकि वन विभाग वाले उन्हें जंगल से कोई भी सामान जैसे जलाउ लकड़ी,तेंदूपत्ता,महुआ आदि लाने नही देते,उन्हे ये बोलकर रोक दिया जाता है कि ये वन संपत्ति है। यह गांव मुख्यता अनुसुचित जाति बाहुल्यता वाला गांव है।

श्रीरामपुर के ग्रामिण इस आशा मे है कि उनके जीवन का विकास होगा। उन्हे अपने निर्णय पर पछतावा है उनका कहना है कि वो ज्यादा बंजर जमीन लेकर क्या करेंगे। ग्रामिणों के परिवार के अधिकांश सदस्य को अपनी जीविका चलाने के लिए काम करने कही और जाना पड़ रहा है। इसी कारण बहुत से ग्रामिण रामपुर वापस जाना चाहते है उन गांव वालों के पास जो 12-13 परिवार रामपुर मे ही रह गए थे। गांव वालो ने जांच टीम के सामने अपना गुस्सा व नाराजगी जाहिर की,वे लोग वन विभाग और छत्तीसगढ सरकार से भी बातचीत कर चुके है कि यदि उनको मुलभूत सुविधांए उपलब्ध नही करवाया गया तो वो वापस अपने गांव रामपुर चले जाएंगे।

रामपुर गांव

जो परिवार रामपुर गांव मे रूक गये थे उनसे जांच दल मिलने गई और उन्होने देखा कि गांववाले बहुत प्रताड़ित है। उनको वन विभाग वालो के तरफ पिछले 3 सालो से डराया-धमकाया जा रहा है, ये कहकर कि गांव खाली कर दो नही तो जेल मे डाल देंगें।
सामुदायिक वन अधिकारों और जन कल्याण अधिकारों से वंचित-ग्रामीणो को तालाब मे नहाने नही दिया जा रहा,उन्हें जंगलो से तेन्दू पत्ता,महूआ कुछ भी लाने नही दिया जा रहा है। अगर वो छुप कर ला भी रहे है तो उनसे छीन लिया जाता है और उनको मारा-पीटा जा रहा है। तेन्दू पत्ता ना तोड़ने के लिए जो मुआवजा प्रति परिवार 2000 रू मिलता है वो भी गांव वालो को नही दिया जा रहा है। और ना ही वृद्धा-पेशन,विकलांग-पेशंन,विधवा-पेशंन कुछ भी नही दिया जा रहा है। इस गांव मे ना तो कोई आंगनवाड़ी है और ना ही कोई प्राथमिक स्वास्थ केन्द्र.

वन विभाग वालो ने गांव वालो के घरों मे नोटिस लगा दिया कि आपको 15 दिनो के भीतर घर खाली करना है।ग्रामिणों के सामुदायिक भवन पर कब्जा तथा उनके देवी स्थल व स्कूल को वन विभाग के द्वारा तोड़ दिया गया है,जिसके कारण वन विभाग के एक रेंजर संजय राहोतियां से गांव वालों मे से एक आदिवासी ग्रामीण जिसका नाम राजकुमार था, उसका झगड़ा हो गया। राजकुमार ने छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री रमन सिंह को गाली दे दी थी। जिसका रेंजरों ने विडियो बना कर रख लिया था। राजकुमार और रेंजर दोनो ही आदिवासी है.

राजकुमार की कहानी

14 जनवरी के दिन संजय राहोतियां नाम का रेंजर शाम के करीब 3-4 बजे कुछ लोगो के साथ मिलकर राजकुमार के घर उसे मारने आ गए। राजकुमार अपने घर की बाड़ी मे जोताई कर रहा था,उन्होने उसे लात घुसों से मारा गाली-गलोज दिया। उसकी पत्नी और बच्चों राजकमार को बचाने गए तो उनको भी मारा गया। जिसके कारण वो बहुत डर गया है। इस मार-पीट से उसे बुरी तरह सिर और पीठ पर चोट लगी उसने बताया जो कि आज तक दर्द से कराहता है। राजकुमार के खिलाफ एफ.आई.आर. कर उसे ही गिरफतार कर लिया गया, जब उसे घायल अवस्था मे अस्पताल ले जाया जा रहा था। थाने मे उससे कोरे कागज पर दस्खत करवा लिया गया,व काफी डराया-धमकाया, गालियां भी दी गई।
जब राजकुमार की पत्नी अमरीका ने छुड़वाने की कोशिश की तो उसको भी मारा, उसे धक्का मारा गया जिससे वो जमीन पर गिर पडी , अमरीका ने जांच टीम को बताया कि संजय राहोतिया जो कि वन विभाग रेंजर ने मेरे कपड़ा फाड़ा गया,उसने मुझे प्रताड़ित किया,डराया-धमकाया और कहा कि अभी तो सिर्फ राजकुमार को अंदर किया है बाद मे सबको अंदर कर देंगे। राजकुमार के बुजुर्ग मां-बाप ने जब राजकुमार को छुड़व़ाने की कोशिश की तो उनको भी मारा,उसकी बहन जो कि बोल व सुन नही सकती उसको और उसके 10-12 वर्ष के बच्चो को भी बहुत मारा-पीटा। राजकुमार की पत्नी ने मदद के लिए जब गांव के सरपंच को बुलाया तो रेंजर और चपरासी ने मिलकर सरपंच को भी मारा।इस घटना के बाद राजकुमार की पत्नी और गांव के सरपंच घटना की एफ आई आर दर्ज करवाने बया थाने पहूचे,तो पहले तो थाना वालो ने एफ आई आर दर्ज नही किया मगर बाद मे गांव वालो के दबाव के कारण एफ.आई.आर.कर लिया गया।
अगली सुबह एफ.आई.आर. करवाकर राजकुमार की पत्नी सुबह 5 बजे जब घर आई, तो उसने देखा की घर की आलमारी का ताला टूटा हुआ है और उसमे से 5000 रुपये , 8ग्राम सोना, 2 नाक की फुल्ली गायब थी । इस प्रकार उनकी जितनी जमा पूंजी थी, चोरी कर ली गई

गांव के अन्य लोग.

फकीर बिसाल

रामपुर गांव के निवासी फकीर बिसाल जो कि सौर आदिवासी है,से बातचीत करने पर उन्होने बताया कि मै यही रहना चाहता हूॅं। जांच टीम ने उनसे पूछा आप यहां क्यो रहना चाहते हो? आपको तो उस गांव मे और अधिक जमीन मिलेगी? इस पर उन्होने कहा कि मेरे भाई की मौत हो चूकी है मरते समय वो 18 वर्ष का नही हुआ था, 18 वर्ष मे उसको 2 दिन बाकि था(वन विभाग की योजना के तहत गांव का कोई भी व्यक्ति जिसकी उम्र 18 वर्ष से कम है,उसे जमीन नही मिलेगा)। जिसके कारण उसके भाई की पत्नी को उस गांव मे जमीन नही मिली। तो वे वहां जाकर क्या करेंगे, उसके भाई का परिवार कैसे अपनी जीविका चलायेगा। उन्होने बताया कि वन विभाग वाले रामपुर मे भी उन्हे जंगलो से तेन्दू पत्ता,महुआ कुछ भी लाने नही दे रहे है यदि वे किसी तरह ला भी रहे है तो उनसे छीन कर उन्हें मारा व घर छोड़ने के लिए धमकाया जा रहा है। वन विभाग वालो ने कहा कि अगर तुमने 15 दिन के अंदर घर खाली नही किया तो तुम्हे मार-मार कर निकालेंगे। उन्होने कहा कि वो साल भर मे केवल एक ही फसल उगा पा रहे है,वो भी ठीक से नही उग पा रहे क्योंकि हमें पर्याप्त पानी नही मिल पा रहाऔर ना ही हम किसी भी प्रकार के वनोपज का इस्तेमाल नही कर पा रहे है। जिसके कारण परिवार का पोषण करने मे परेशानी हो रही है,इसलिए मैने अपने दो बच्चो को काम करने के लिए उत्तर प्रदेश भेज दिया है.

उर्मिला सांवरा

ये राजकुमार के घर के सामने अपने पति और 4 बच्चो के साथ रहती है। इनके 2 बच्चे उत्तर प्रदेश गए है कमाने क्योकि इनके खेतो की फसल से जीविका नही चल पा रही। इनके घर को वन विभाग वालो ने तोड़ दिया है। उर्मिला सांवरा विकलांग महिला है जो ठीक से चल भी नही पाती,उन्हे वन विभाग के रेंजर प्रताड़ित करते है , गालियां देते है,और घर छोड़ने की धमकी देते है। उन्होने बताया कि उनका विकलांग पेंशन व तेंदू पत्ता भत्ता भी रूकवा दिया गया है ऐसे मे मेरा परिवार कैसे चलेगा? इसके बावजूद वो अपने गांव मे ही रहना चाहती है, गांव छोड़कर नही जाना चाहती।

धरना स्थल

राजकुमार वाली घटना और वन विभाग के बढ़ते दबाव के कारण लोगो मे आक्रोश मे आ गए है और अपनी मांगो को पूरा करवाने के लिए गांव वाले अनिश्चितकालीन कालिन धरने पर बैठे हुए है। यह धरना 25 जनवरी 2018 से शूरू हुआ और 28 फरवरी को समाप्त हुआ है। धरने पर बैठे लोगो से मिलने के लिए भी जांच टीम गई। धरना स्थल पर बैठे लोगो से बातचीत पर उन्होने बताया कि वो इस गांव को छोड़कर नही जाना चाहते,उन्होने बताया कि उनके बाप -दादाओ ने मिलकर भूखे-प्यासे रहकर इस गांव को बनाया,यहां कि सड़के बनाई है। उन्होने कहा कि जंगल उनका अपना है,वे अपना जंगल अपनी जमीन वन विभाग को नही लेने देंगे।
गावं के लोग स्थानीय विधायक के साथ मिलने मुख्यमंत्री से मिलने गए थे, मगर मुख्यमंत्री उनसे नही मिले। विधायक ने गांव वालो के भरोसा दिलाया है कि वो कोई शांति पूर्ण रास्ता निकाल लेगा जिसके आसार भी गांव वालो को नजर नही आ रहा। हालातो के बुरे होते जाने के कारण आसपास के गांव के सरपंचो ने भी कहा कि वे अपने पदों से इस्तीफा दे देंगे, मगर गांव छोडकर नही जाएंगे। गांव मे चल रहे धरना का लोग बड़ी संख्या मे समर्थन कर अपना विरोध प्रदर्षन कर रहे है,क्योकि अभ्यारण के आसपास के सभी गांव की स्थिति यही बनी हुई है, सभी गांव को धीरे-धीरे करके खाली करवाया जा रहा है।
धरने मे लोगो ने संजय राहोतियां के खिलाफ कड़ी कारवाई की मांग रखी है। लोगो ने कहा कि संजय राहोतियां और राजकुमार के झगड़े को जातिगत मामला बनाया जा रहा है। जबकि लोगो का कहना है कि राहोतियां के मैहर जाति का होने से उन्हे कोई दिक्कत नही है,उसने जो किया वो गलत था जिसके लिए उसे सजा मिलनी चाहिए। धरने पर बैठे लोगो का मानना है कि इस मामले को जातिगत मसला बना कर 22 गांव के विस्थापन जैसे बड़े मुददे को दबाया जा रहा है। इस धरने को रामपुर व श्रीरामपुर से लेकर सभी आसपास के गांव के लोग समर्थन दें रहे है

यह विरोध प्रदर्शन 28 फरवरी 2018 से षुरू हुआ था,जिसके बाद कसडोल के एस.डी. एम.अंजोर सिंह पैतरा धरना स्थल पर आए। प्रदर्शन कारियों ने उन्हें ज्ञापन सौंपा। एस.डी. एम. के द्वारा दिये गए आश्वशन को पूरा ना करने के लिए पूरे छत्तीसगढ से राजनीतिक कार्यकर्ता और दिग्गजों की एक बैठक बुलाई गई। इस बैठक मे दृढ संकल्प लिया गया,कि यदि उनकी मांगे पूरी नही हुई और जब तक दमनकारी लोग रहेंगे आदिवासी इसी तरह अपना विरोध प्रदर्शन करेंगे .

बैठक मे सबसे ज्यादा उन ग्रामिणों की संख्या थी जिन्होने पुर्नवास स्वीकार किया था। उन ग्रामिणों को बताया कि कैसे राज्य सरकार व विभाग द्वारा उनसे झूठ बोला व उनको ठगा गया। पुर्नवास स्वीकार किए ग्रामिणों ने अन्य गांववालो को पुर्नवास स्वीकार ना करने,लडाई को आगे बढाने और उनके संघर्ष का समर्थन करने का भरोसा दिलाया। ग्रामिणो के विरोध के बाद बरनवापारा वन्यजीव अभ्यारण्य का टोल उनके लिए खोल दिया गया। कई गांवो मे ग्रामसभा का पुर्ननिर्माण किया गया तथा 9 गांवो ने अपने समुदाय के वन्य अधिकारो के लिए आवेदन भी दिया है।
संजय राहोतियां के खिलाफ, ग्रामिणों के मांग अनुसार संशोधन कर उसका स्थानान्तरण कर कही और भेज दिया।
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