जशपुर जिले में पत्थलगड़ी तोड़ने संबंधित तथ्य खोज रिपोर्ट (पी.यू.सी.एल. एवं छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयुक्त दल द्वारा)

जशपुर जिले में पत्थलगड़ी तोड़ने संबंधित तथ्य खोज रिपोर्ट (पी.यू.सी.एल. एवं छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयुक्त दल द्वारा)

जशपुर जिले में पत्थलगड़ी तोड़ने संबंधित तथ्य खोज रिपोर्ट (पी.यू.सी.एल. एवं छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयुक्त दल द्वारा)

 

26.07.2018

चींटी की हाथी को चुनौती
जशपुर जिले में पत्थलगड़ी तोड़ने संबंधित तथ्य खोज रिपोर्ट
(पी.यू.सी.एल. एवं छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयुक्त दल द्वारा)

दिनाँक 11 एवं 12 मई 2018 को पी.यू.सी.एल. एवं छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के एक संयुक्त दल द्वारा जशपुर जिले के बगीचा विकासखण्ड के ग्राम बुटंगा, कलिया एवं सिहरडाड़का दौरा किया गया। गाँववासियों के द्वारा निम्नलिखित जानकरी प्राप्त हुई।

प्रस्तावना

जशपुर जिले के बछरांव, कलिया, सिहरडाड़ व बुटंगा गाँवों में ग्रामवासियों ने पत्थलगड़ी स्थापना करने की शुरूआत की, जिसमें उन्होंने आदिवासियों को संविधान प्रदत अधिकारों के प्रावधानों को तथा माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए आदेशों को भी लिखा। 22 अप्रैल को बछरांव में ग्रामवासियों ने रूढ़िगत विधि द्वारा इसका उद्घाटन किया। 28 अप्रैल को स्थानीय भाजपा नेताओं के द्वारा बछरांव से गैयलुंगा होते हुए कलिया गाँव तक सद्भावना यात्रा (वाहनद्वारा) की गई। यात्रा के दरमियान बुटंगा के पत्थलगड़ी को तोड़ा गया। उसके बाद कुछ ग्रामवासी एवं पत्थलगड़ी आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लोगों के उपरएफ.आई.आर. दर्ज कर गिरफ्तारी की गई। राज्य सरकार के द्वारा पत्थलगड़ी कार्यक्रम को देशद्रोह एवं गैर-कानूनी के रूप में परिभाषित किया गया तथा माओवादी एवं मिशनरियों के द्वारा आंदोलन का परिचालित होना बताया गया। दूसरी ओर भाजपा नेताओं के द्वारा बड़े पैमाने पर पत्थलगड़ी कार्यक्रम को अखबारों व टी.वी. चनलों के माध्यम से संविधान विरोधी बताया गया।

ग्रामवासियों ने बताया कि 28 जनवरी 2018 को श्री फिलमोन एक्का की अध्यक्षता में बुटंगा में ग्राम सभा की गई और पत्थलगड़ी करने का निर्णय किया गया। इसकी सूचना एस.डी.एम. बगीचा को दी गई। उन्होंने बताया कि पत्थलगड़ी करने के पीछे लम्बी कहानी है। जब जंगली जानवरों द्वारा कई बार जानमाल की हानि हुई तो मुआवजा तक नहीं मिला था। बिजली, स्वास्थ्य सुविधा व सड़क आज तक नहीं है। शासकीय योजनाओं को भेदभावपूर्ण लागू किया जाता है, ईसाइयों के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है। वन अधिकार के दावाओं का निराकरण नहीं किया गया है या तो उसमें भी भेदभाव किया गया है। पेसा कानून व 5वीं अनुसूची के प्रावधानों का अनुपालन ही नहीं हुआ है। एक उरांव लड़की की गैर-उरांवों द्वारा हत्या करके उसे पेड़ पर लटका दिया और गणेश राम भगत की मिली भगत से उसे आत्महत्या करार देकर, बिना पोस्टमार्टम के दफना दिया गया। पुलिस व गणेश राम भगत की मिली भगत से केस को रफा-दफा कर दिया गया। उन्होंने कहा कि उदाहरण के लिए यहाँ कुछ ही बातों का जिक्र किया जा रहा है। अन्याय, भेदभाव, अत्याचार, शोषण, अव्यवस्था, असुविधा व अवहेलना की लम्बी दास्ताँ है।

घटना का विवरण

दिनाँक 14.04.2018 को बुटंगा में अम्बेडकर जयंती मनाई गई। लोगों को अपने संवैधानिक अधिकारों की जानकारी दी गई और जागृति हेतु पत्थलगड़ी करने के लिए चारों गाँवों (कलिया, बुटंगा, सिहरडाड़ और बछरांव) में स्थान का चयन किया गया।

दिनाँक 19.04.2018 को एस.डी.एम. बगीचा के द्वारा फिलमोन एक्का को द.प्र.क्र.03/2018 के अंतर्गत द.प्र.स.की धारा 107, 118(3) (118) के तहत नोटिसभेजा गया कि उसके माध्यम से असंवैधानिक लेख कराया जा रहा है। इसके एवज में छह माह के लिए 50,000/- जमानत भरें।

22 अप्रैल 2018 को हजारों आदिवासियों की उपस्थिति में बड़े धूमधाम से विधिवत पत्थलगड़ी का उद्घाटन बछरांव में किया गया। इसी मौके पर कुछ गाँव से बाहरी लोग भी मौजूद थे। समारोह जन सभा में तब्‍दील हुआ। आदिवासियों के लिए प्रदत संवैधानिक प्रावधानों की चर्चा हुई और समारोह का शांतिपूर्वक समापन हुआ।

इसके बाद पत्थलगड़ी जंगल में आग की तरह फैल गया, मीडिया का केन्द्रबिन्दु बन गया। आरोप-प्रत्यारोप जोरों पर चलने लगा। प्रशासन और भाजपा ने इसे गैर-संवैधानिक, अलगाववाद बताया और इसके पीछे मिशनरियों का हाथ होने की बात कही। मिशनरियों ने इस आरोप को सिरे से खारिज करके लिखित में पेश किया कि इसमें उनका कोई हाथ नहीं है, जिसे मीडिया ने प्रकाशित भी किया।

28 अप्रैल को भाजपा नेताओं के द्वारा सदभावना यात्रा की गई और भड़काऊ भाषण दिया गया। रायमुनी भगत, राज्य महिला आयोग सदस्य, ने पत्थलगड़ी तोड़ने का अहवान किया जिसका समर्थन विष्णुदेव साय, केन्द्रीय इस्पात एवं खनन राज्य मंत्रीने किया और काफिला ने बुटंगा जाकर पत्थलगड़ी को तोड़ दिया, जिस पर अब तक कुछ भी नहीं लिखा गया था। तोड़ने के लिए औजारों (सब्बल, हथौड़ा, घन, इत्यादि) का जुगाड़ पूर्व-नियोजित था, जिन्हें वाहनों के अंदर रखा गया था और लाकर उपयोग किया गया।
पत्थलगड़ी तोड़ने वालों का विरोध प्ररम्भ में कुछ (15-20) महिलाओं ने किया। दोनों दलों में धक्का-मुक्का भी हुई। अंततः सदभवना यात्रियों की जीत हुई, उन्होंने पत्थलगड़ी को ध्वस्त कर दिया। ध्वस्त करने के बाद उस पर नाचने लगे और जय श्री राम, जय जूदेव, आदि नारे लगाए गए। इन सारी घटनाओं को पुलिस मूक दर्शक बनकर देखती रही और भाजपा के नेता भी अपने वाहनों से देखते रहे। पुलिस की संख्या सौ से अधिक थी।

पत्थलगड़ी तोड़ने के बाद पुलिस वापस गई लेकिन उस रास्ते से गई जो कच्ची थी और जंगल के पास पहुँचकर समाप्त हो गई। इस पर पुलिसवालों ने अपने आला अधिकरियों को फोन करके बतलाया कि उन्हें गाँववालों ने घेर लिया है, जब कि वहाँ कोई गाँववाले नहीं थे। पुलिस के आला अधिकारी बुटंगा गाँव आए और जहाँ पत्थलगड़ी को तोड़ा गया था वहीं रके। पुलिस व प्रशासन के अधिकारियों को देखकर गाँववासी भी वहाँ पहुँच गए। पूछताछ और बातचित होने लागी। गाँववासियों ने माँग की कि पत्थलगड़ी ध्वस्त करने वालों पर एफ.आई.आर. दर्ज करें, ध्वस्त पत्थलगड़ी का निर्माण कराया जाए, लोगों पर लगा केस क्र.03/2018 वापस लिया जाए। लोगों ने अपनी माँगें लिखित में पेशकीं जिसकी पावती नहीं दी गई। एस.डी.एम., बगीचा ने दूसरे दिन सुबह आकर माँग पूरी करने का आश्वांसान दिया और कहा कि किसी को बंधक नहीं बनाया गया था, बातचीत हो रही थी।

दूसरे दिन यानी29 अप्रैल 2018 को एस.डी.एम. गाँव वापस नहीं आए। इससे गाँववासियों का प्रशासनिक अधिकारियों पर विश्वास उठ गया। 29 अप्रैल को ही अम्बिकापुर में सर्व आदिवासी समाज का एक सम्मेलन हुआ जिसमें पत्थलगड़ी से संबंधित कुछ लोग भी भाग लेने गए थे। वापसी के दौरान श्री हेरमन किण्डो और श्री जोसेफ तिग्गा को गिरफ्तार किया गया। दूसरे दिन अन्य चार लोगों (दाउद कुजूर, मिलियन मिंज, पीटर खेस्स व फुलजेन्स एक्का) को गिरफ्तार किया गया। सिहरडाड़ के दो लागों (जगदेव भगत व सुधीरएक्का) को पुराने केस के बहाने बगीचा थाना बुलाकर उन्हें गिरफ्तार किया गया। इन सभी लोगों को अपने गाँव के बाहर से गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी की सूचना उनके परिवार के लोगों को नहीं दी गई।

तथ्य खोजी दल ने कलेक्टर जशपुर, पुलिस अधिक्षक जशपुर, अनुविभागीय अधिकारी बगीचा, थाना प्रभारी बगीचा व नारायणपुर से पूछताछ के लिए सम्पर्क करने का प्रयास किया पर सफलता नहीं मिली। कलेक्टर जशपुर और अनुविभागीय अधिकारी बगीचा ने कांसाबेल में मिलने की सूचना फोन द्वारा दी। शाम को कांसाबेल रेस्ट हाउस में मिलने का प्रयास किया गया तो विषय की जानकारी होने पर व्यस्तता का बहाना बनाकर चलते बने। अनुविभागीय अधिकारी बगीचा से 12 अप्रैल 2018 सुबह फोन द्वारा सम्पर्क किया गया तब भी उन्होंने समय न दे सकने की बात कही। थाना प्रभारी बगीचा से समय देने के लिए निवेदन किया गया तो उसने भी समय न दे सकने की बात की। उन्होंने तो इतना भी कह दिया कि पत्थलगडी के संबंध में वे कुछ नहीं कर रहे हैं, सब कुछ ’हाई लेवल’ से हो रहा है। इस प्रकार जाँच दल की प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात न हो पाई, कोई बात करना सम्भव नहीं हुआ।

प्रमुख खोज एवं माँगें

1. आदिवासियों द्वारा पत्थलगड़ी करना पौराणिक परम्‍परा है। गाँव, जमीन के सीमांकन, पुरखों कीयाद, कोई विशेष घटना की याद में पत्थलगड़ी किया जाता था और अब भी जारी है। 5वीं अनुसूची, पेसा कानून और वन अधिकार मान्यता कानूनों के अनुसार भी पत्थलगड़ी संवैधानिक है।
2. गाँववासियों के द्वारा पत्थलगड़ी करने के पीछे वर्षों से संकलित रोष, आक्रोश, अन्याय, अव्यवस्था, उपेक्षा, भेदभाव भी रहा है, जो पत्थलगड़ी के रूप में फूटकर सामने आया है। उनपर किए गए अन्याय, अत्यचार, भेदभाव की छतिपूर्ति तत्काल की जाए। सभी शासकीय योजनाओं को नियमतया बिना भेदभाव लागू किया जाए।
3. गाँववासियों ने स्वयं उपर्युक्त भावनाओं से प्रेरित होकर अपनी समस्या समाधान हेतु प्रतीक केरूप में पत्थलगड़ी किया। जानकरी उन्होंने जरूर किसी से ली है पर किसी के बहकावे में आकर उन्होंयने पत्थलगड़ी नहीं की है। अतः बाहरी लोगों पर बहकावे का आरोप लगाना गलत है। जिन पर यह आरोप लगाकर गिरफ्तार किया गया है, उन्हें निःशर्त रिहा किया जाए।
4. पत्थलगड़ी गाँववासियों ने किया है, मिशनरियों पर दोष लगाना दुर्भावनापूर्ण है, जिस पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
5. भाजपा के नेताओं द्वारा पत्थलगड़ी क्षेत्रों में सद्भावना यात्रा करना दुर्भावना ग्रसित था। यह पत्थलगड़ी को ताड़ने की पूर्व-नियोजित कूटनीति थी। इस पर कानूनी कार्रवाई करते हुए पत्थलगड़ी को तोड़ने वालों और उकसाने वालों को तत्काल गिरफ्तार किया जाए।
6. गाँववासियों के द्वारा शासकीय कर्मचारियों को बंधक नहीं बनाया गया था। वे स्वयं दुबारा गाँव आये थे, उनसे पूछताछ की जा रही थी। अतः उनपर शासकीय कर्मचारियों को बंधक बनाने का आरोप गलत है। इसके बारे में गिरफ्तार लोगों को निःशर्त रिहा किया जाए। जिन्होंने इस प्रकार का दुष्‍प्रचार किया है, उन पर कानूनी कार्रवाई की जाए।
7. गिरफ्तार लोगों को तत्काल निःशर्त रिहा किया जाए और जिनके नाम एफ.आई.आर. किया गया है, उसे निरस्त किया जाए।
8. भाजपा नेताओं के द्वारा जिले के आदिवासियों को राजनीतिक लाभ के लिए जाति व धर्म के नाम पर बाँटने का कुत्शित प्रयास किया जा रहा है, जिस पर तत्काल रोक लगाई जाए।
9. पत्थलगड़ी से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों और कानूनों की सही एवं आधिकारिक व्याख्या की जाए। गाँववालों ने अपनी जानकारी और समझ के अनुसार पत्थलगड़ी में संविधान और संबंधित कानूनों व माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णयों को सूचना के लिए लिखा है। आज तक न किसी कोरोक गया है न ही अलगावाद जैसा कोई काम हुआ है। यह तो शासन-प्रशासन को अपने संवैधानिक दायित्वों को निभाने के लिए एक आहवान है। इसे एक संकेत के रूप में देखा जाए।
10. श्रीमान महामहिम राष्ट्रपति महोदय, भारत सरकार एवं श्रीमान महामहिम राज्यपाल महोदय, छ.ग. ने 5वीं अनुसूचित क्षेत्रों के प्रति अपने दायित्वों का अब तक निर्वाहन नहीं किया है। अतः उनसे विनम्र निवेदन है कि अपने संवैधानिक दायित्वों का ईमानदारी व निष्पक्षता से निर्वाहन करें।

निष्कर्ष

गाँववासियों ने अपनी समझदारी व सूझबूझ से अपनी व्यवथा को प्रकट करने के लिए पत्थलगड़ी किया है। लम्बे अर्से से दबी अन्याय, शोषण, अत्याचार, भेदभाव, शासकीय उपेक्षा, आदि की पीड़ाओं को उन्होंने पत्थगलड़ी के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास किया है। लोकतंत्र के लिए यह एक अच्छा ही संकेत है कि अब गाँववासी भी संविधान और अन्य कानून का अध्ययन कर रहे हैं और स्वयं को याद दिलाने के लिए, जो उनके पक्ष में है, उन्हें पत्थरों पर लिख रहे हैं। उसमें लिखी बातें संविधान सम्बएद्ध हैं। सिर्फ गलत व्याख्या का उन पर आरोप लगाया जा रहा है, जिसे सही व आधिकारिक व्याख्या द्वारा दूर किया जा सकता है। गाँव के बाहरी लोग, जिन पर भड़काने का आरोप है, वे घटना के कुछ ही दिन पहले वहाँ गए थे, गाँववासियों के निमंत्रण पर।पत्थलगड़ी के बारे जो कुछ किया गया है, गाँववासियों के द्वारा ही किया गया है। किसी से जानकारी उन्होंने जरूर ली है। इस घटना में हमें कहीं मिशनरी का हाथ नजर नहीं आया। अलगाववाद का कोई काम या संकेत नजर नहीं आया। स्वप्रशासन व नियंत्रण की बात तो पेसा कानून व वन अधिकार कानून भी करते हैं, जिन्हें इस पूरे क्षेत्र में अब तक लागू ही नहीं किया गया है। हमें ऐसा लगता है कि अधिकार की बातें करने वालों को देशद्रोही, अलगाववादी, माओवादी, मिशनरी की संज्ञा देने का दौर जोरों पर चला है और इस चुनावी महौल में तो और ही अधिक नजर आ रहा है। राजनीति के नाम पर लोगों को जाति-धर्म में बाँटने का बाजार गर्म है। अतः राजनीति, जाति-धर्म, भेदभाव की संकीर्णता से ऊपर उठकर निष्पक्षता व संवेदनापूर्ण भाव से इस पर तत्काल विचार करने की आवश्यकता है। ताकि लोकतंत्र और प्रशासन में लोगों का विश्वास बना रहे।

दल के सदस्य
श्री विजय भाई, सुश्री रिनचिन, सुश्री नेहा राणे, श्री वी.एम.प्रसाद राव, श्री जुनस तिर्की, श्री के.डी.कुर्रे, श्रीमती मालती तिर्की, श्री क्लेमेंट लकड़ा, श्री दिनेश भगत।

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