कल प्रधानमंत्री ने कहा भीड़ द्वारा हत्या बर्दाश्त नहीं,: आज अलवर में गौतस्करी के शक में अकबर को मौत के घाट उतारा जावेद अख्तर.

कल प्रधानमंत्री ने कहा भीड़ द्वारा हत्या बर्दाश्त नहीं,: आज अलवर में गौतस्करी के शक में अकबर को मौत के घाट उतारा जावेद अख्तर.

सलाम छत्तीसगढ़ / 
अलवर (21 जुलाई 2018)
राजस्थान के अलवर शहर के रामगढ़ इलाके के लल्ला वण्डी गांव में मात्र गौतस्करी की अफवाह के नाम पर फिर एक मुस्लिम युवक अकबर को कथित गोरक्षकों की भीड़ ने पीट- पीटकर मौत के घाट उतार दिया। गौ तस्करी के संबंध में न तो युवक से कोई पूछताछ की गई और ना ही ऐसी कोई संदिग्ध वस्तु अथवा दस्तावेज़ थे जिसके चलते गौ तस्करी की संभावना प्रतीत हो रही थी। 


   गौ तस्करी के शक में भीड़ ने एक युवक अकबर की पीट- पीटकर हत्या कर दी तो वहीं अन्य एक साथी ने भागकर जान बचाई। मॉब लिंचिंग का ये मामला ऐसे समय हुआ हैं, जब कल ही देश के प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी जी लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बोलते हुए कहा कि ‘भीड़तंत्र की हिंसा बिल्कुल स्वीकार्य नहीं की जायगी। ये राज्य सरकारों की जिम्मेदारी हैं कि इसको रोकने के लिए कड़े कदम उठाये। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी मॉब लिंचिंग पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि भीड़तंत्र की हिंसा स्वीकार्य नहीं।

 




    नपुंसकतावादी विचारधारा से उपजता भीड़तंत्र –
राष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक़, प्रत्यकदर्शी लोग चुपचाप तमाशाबीन बने रहे क्योंकि भीड़ जय श्रीराम के नारे लगा रहे थे, इसीलिए कोई साहस नहीं कर पाया। नपुंसकता कई प्रकार की होती है, यह भी नपुंसकता का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि एक व्यक्ति को दो तीन दर्जन नपुंसक पराक्रमी भीड़ के रूप में उसका सामना करती है और अपनी नपुंसकता का परिचय देते हुए तीन दर्जन कथित गौ रक्षक एक व्यक्ति पर टूट पड़ती है, तब तक पीटती है जब तक कि अकेला व्यक्ति अधमरा अथवा मर ना जाए, पीटने के दौरान अपने नपुंसक साहस का परिचय देते हुए जय श्रीराम का नारा लगाती रहती है। ठीक वैसे ही जैसे कि अफगानिस्तान में पचासों कट्टरपंथी एक व्यक्ति के हाथ पैर बांधकर अल्लाहू अकबर का नारा बुवंद करते हुए अकेले व्यक्ति की हत्या कर देतें हैं

 नपुंसकतावादी विचारधारा वाले कट्टरपंथी चाहे अफगानिस्तान में अल्लाहो अकबर का नारा लगाएं या फिर भारत में जय श्रीराम का नारा लगाएं, इनका उद्देश्य एक ही होता है आम नागरिकों के दिलों में भय व्याप्त करना। इस तरह के कट्टरपंथी धार्मिक नारों की आड़ में खुद की क्रूरता और नपुंसकता को छिपाने का प्रयत्न करते हैं। वास्तविक रूप में लोकतंत्र के लिए यह दोनों ही खतरा है। 

     सुप्रीम कोर्ट के सख्त कदम, राज्य की सरकारें आज भी सो रहीं –
अगर लिंचिंग का कोई वाक्या पेश आ जाए तो स्पेशल ट्रायल अदालतों में छः महीने के अंदर मामले की सुनवाई मुकम्मल की जाए और ट्रायल अदालतें ऐसे मामलात में ज्यादा से ज्यादा सजा दें और लिंचिंग का शिकार हुए लोगों के घर वालों को तीन दिन के अंदर सरकारें माली मदद करें। अदालत ने कहा इनके अलावा मरकजी और रियासती सरकारें रेडियो, टीवी, सोशल मीडिया समेत तमाम जराए अबलाग (संचार माध्यमों) के जरिए आम लोगों तक यह खबर पहुचाए कि लिंचिंग करने वालों और उसमें शामिल लोगों को सख्त से सख्त नतायज भुगतने होगे। गौरक्षा के नाम पर लिंंचंग संगीन क्राइम है। यह बात प्रदेश सरकार को सभी को बताना चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा, वह केंद्र सरकार के लिए शर्मनाक – 
अदालत ने महात्मा गांधी के पोते तुषार गांधी और कांग्रेस लीडर तहसीन पूनावाला की पीआईएल पर सुनवाई करते हुए मॉब लिंचिंग रोकने के लिए गाइड लाइन्स जारी की। अदालत ने सीधे तौर पर यह तो नहीं कहा कि गाय के बहाने होने वाली लिंचिंग के लिए मरकज की नरेन्द्र मोदी और बीजेपी हुकूमत वाली रियासतें ही जिम्मेदार हैं मगर जो कहा वह इनडायरेक्ट तौर से यही बताता है कि लिंचिंग को रोकने के लिए बीजेपी की प्रदेश सरकारें संजीदा नहीं हैं बल्कि वह ऐसे लोगों के तहफ्फुज कर रही हैं। अदालत ने कहा कि कानून के राज में किसी जुर्म के लिए सड़क पर जांच और सुनवाई नहीं हो सकती न ही सजा दी जा सकती है।अदालत ने कहा कि लगता है कि मुल्क में रवादारी (सहिष्णुता) की कद्र ओ कीमत कम होती जा रही है। तभी लोग सोशल मीडिया पर फैली झूटी खबरों के जरिए भड़क जाते हैं। बढती हुई अदम रवादारी (असहिष्णुता) और पोलराइजेशन की वजह से मॉब लिंचिंग के वाक्यात बढते जा रहे हैं। उन्होने कहा कि इसे जिंदगी का हिस्सा नहीं बनने दिया जा सकता। अगर इसे रोका नहीं गया तो वह हरकतें शैतानी शक्ल अख्तियार कर लेंगी। अदालत ने कहा कि प्रदेश में नज्म व नस्क (कानून व्यवस्था) बनाए रखना और भीड़ के जरिए हिंसा को रोकना और अवाम की हिफाजत करना रियासतों की जिम्मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट ने पार्लियामेंट से अपील की है कि वह मॉब लिंचिंग के लिए अलग से कानून बनाने पर गौर करे। अदालत ने बड़े साफ लफ्जों में कहा कि कोई शख्स खुद में काननू नहीं है और कानून को हाथ में लेने का हक किसी को नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने रियासती सरकारों से सख्ती से कहा कि वह संविधान के मुताबिक काम करें। रियासती सरकारें मॉब लिंचिंग के बढ़ते वाक्यात पर बहरी नहीं हो सकती।

   सुप्रीम कोर्ट ने बनाए नियम व लागू किए आदेश –
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2 शासन व्यवस्था, संविधान, शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध 

(खंड-01 : संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय)
गो-रक्षकों और भीड़ द्वारा हिंसा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कठोर टिप्पणियाँ करते हुए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को दिशा-निर्देश जारी किये हैं। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए.एम. खानविलकर और जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूडकी बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि भीड़तंत्र को किसी भी सूरत में क़बूल नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने हाल के दिनों में बढ़ रही माब लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) को ‘भीड़तंत्र का भयानक कृत्य’ बताया है।

   निरोधात्मक, सुधारात्मक और दंडात्मक दिशा-निर्देश –
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने अपने 45 पेज के फैसले में आश्चर्य व्यक्त किया है कि क्या “भारत जैसे महान गणराज्य की जनसंख्या ने विविध संस्कृति को बनाए रखने के लिये सहिष्णुता का मूल्य खो दिया है?”
गोरक्षा या बच्चा चोरी के नाम पर लगातार हो रही हिंसक घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने तीखी प्रतिक्रिया जताते हुए निरोधक, उपचारात्मक और दंडात्मक दिशा-निर्देश जारी किये हैं और कहा है कि 
– राज्य सरकार हर ज़िले में एसपी स्तर के अधिकारी को नोडल अफसर नियुक्त करे जो स्पेशल टास्क फोर्स बनाए।
डीएसपी स्तर का अफसर भीड़ द्वारा की गई हिंसा और लिंचिंग को रोकने में सहयोग करेगा। एक स्पेशल टास्क फोर्स का गठन किया जाए और यह उन लोगों की खुफिया सूचना इकट्ठा करेगी जो इस तरह की वारदात को अंजाम देना चाहते हैं या फेक न्यूज  या हेट स्पीच दे रहे हैं। 
– राज्य सरकार ऐसे इलाकों की पहचान करे जहां ऐसी घटनाएं हुई हों और पांच साल के आंकडे इकट्ठा करे। केंद्र और राज्य आपस में समन्वय रखें। सरकार भीड़ द्वारा हिंसा के खिलाफ जागरूकता का प्रसार करे।
ऐसे मामलों में आईपीसी की धारा 153 A या अन्य धाराओं में तुरंत केस दर्ज हो और वक्त पर चार्जशीट दाखिल हो तथा नोडल अफसर इसकी निगरानी करें। 
राज्य सरकार दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 के तहत भीड़ हिंसा से पीड़ितों के लिये मुआवज़ा योजना बनाए और चोट के मुताबिक मुआवज़ा राशि तय करे। ऐसे मामलों की सुनवाई फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में हो और संबंधित धारा में ट्रायल कोर्ट अधिकतम सज़ा दे। लापरवाही बरतने पर पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई हो
– सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से चार हफ्ते में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने को कहा।

   रहें सावधान –

लिंचिंग और भीड़ हिंसा को “खतरे में डालने” के रूप में वर्णित करते हुए, अदालत ने चेतावनी दी कि फर्जी खबरों, आत्म-घोषित नैतिकता और झूठी कहानियों द्वारा फैलाया गया उन्माद देश के लोगों को “टाइफून-”  की तरह बर्बाद कर देगा। न्यायालय ने कहा कि
– वंश, जाति, वर्ग या धर्म के बावजूद सभी व्यक्तियों की रक्षा करना सरकार का प्राथमिक दायित्व है। अपराध का कोई धर्म नहीं होता और न ही अपराधी का।
इस संबंध में  मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि संयुक्त राज्य अमेरिका में लिंचिंग की घटनाएँ इतनी अनियंत्रित हो गई थीं कि मार्क ट्वेन ने अमेरिका को “लिंचरडम संयुक्त राज्य” कहा था। उनका यह कटाक्ष स्पष्ट है
– जनवरी में गोरक्षकों द्वारा की गई हिंसा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिवों को नोटिस जारी कर पूछा था कि क्यों न उनके खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला चलाया जाए।
याचिकाकर्त्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंहने कोर्ट में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद ये राज्य हिंसा रोकने में नाकाम रहे हैं और इन राज्यों में गोरक्षा के नाम पर हिंसा की कई घटनाएँ हुई हैं।
    गौरतलब है कि 6 सितंबर, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा था कि गो-रक्षा के नाम पर हिंसा रूकनी चाहिये। घटना के बाद ही नहीं उससे पहले भी रोकथाम के उपाय किये जाने ज़रूरी हैं।

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