|| अनिल करमेले की कविताएं || दस्तक़ में प्रस्तुत अमिताभ मिश्र .

20.07.2018

बड़ी मुद्दत, बड़ी मिन्नत, बहुत तगादे, बहुत संकोच के साथ जिस शख्स ने मुझे कविताएं दीं वो हैं अनिल करमेले. अनिल करमेले की कविताएं हमारे आसपास की दुनिया की कविताएं हैं, हमारी ही कविताएं हैं ये। एक शेर याद आ रहा है
“मेरी दास्तां को ज़रा सा बदल कर
मुझे ही सुनाया सवेरे सवेरे”
तो ये जो ज़रा सा बदलना है यहां अनिल की कविता है जो उन्हें हिन्दी कविता में एक खास जगह प्रदान करती है। तो आज मैं इस दौर के महत्त्वपूर्ण कवि और दस्तक के साथी एडमिन अनिल करमेले की कविताएं प्रस्तुत कर रहा हूं। पढ़ें और इन पर बात जरूर करें.

अनिल करमेले की कविताएं

1  || तस्वीर ||

अख़बार के चौथे पेज़ पर
कितने दिनों से आ रही है यह तस्वीर
उठावने और तेरहवीं वाले संदेशों के बीच

इसी पेज पर नए मकानों के विज्ञापन हैं
नए रोज़गार के अवसरों के लुभावने प्रस्ताव
सरकारी कामों की निविदाएँ
पुलिस थानों के नंबरों सहित
फरार अपराधियों की तस्वीरें भी
इसी के आसपास हैं

पता नहीं वह किस काम से निकला था घर से
या बेकाम यूं ही टहलने
क्या पता किसी रोजगार का पता खोजने निकला
या नए घर के सपने के साथ
किसी मृतक की अंतिम यात्रा के लिए तो नहीं निकला..?

कौन होगा उसके घर में राह देखता
अपने आँसू रिक्त कर चुकी उसकी पत्नी
या दरवाज़े से ताकती नन्हीं बेटियाँ
बूढ़े पिता घर के बाहर थके पैरों और
उम्मीदी आँखों से बेचैन टहलते हुए
माँ होगी तो वह भरोसा रखकर
उसकी पसंद का कुछ बचा कर रख रही होगी

पड़ोसी दिलासा देकर थक चुके होंगे
मित्र क्या कहें इसके सिवा कि कुछ नहीं होगा
वह लौट आएगा किसी दिन
भाई बहन होंगे तो कब से पड़े कामों को
अब धीरे धीरे सँभाल रहे होंगे
आखिर कब तक कोई रोता हुआ साथ रह सकता है

काम तो उसके भी रहे होंगे
नौकरी होगी तो पता नहीं उसका क्या हुआ
दूसरा रोज़गार तो कब का मिट गया होगा

कोई नहीं जानता वह कौन है
क्या पता वह कौन था
उसके होने और नहीं होने के बीच
रोज़ अखबार के चौथे पेज पर
छपी दिखती है यह तस्वीर

कई महीनों से आ रही
यह गुमशुदा की तस्वीर
अब बेचैन करने लगी है

अब तो मैं रोज़ अख़बार लेकर
सबसे पहले चौथा पेज़ देखता हूँ.

2  || सपनों की लड़कियां ||

मैंने प्‍यार किया उन लड़कियों से
जिनके नाखून लगातार बर्तन मांजने से
काले पड़ गए थे
और काटने की उन्‍हें फुर्सत नहीं थी
जिनकी एड़ियां फटी हुई थीं
और वे बरसों एक ही चप्‍पल में कीलें ठुकवातीं
पार करती थीं कठिन रास्‍ते

मैंने प्‍यार किया उन लड़कियों से
जिनकी अंतिम इच्‍छा
किसी भी तरह किसी की भी चादर बन जाना थी
जो जिस तरह चाहे ओढ़े-बिछाए
या रंग उतर जाने के बाद फाड़ कर
हैसियत के अनुसार
जूते या स्‍कूटर साफ करने में इस्‍तेमाल करे

मैंने उन लड़कियों से प्‍यार किया
जो अपनी प्रार्थना में
अपने हिस्‍से का आदमी सुरक्षित रखने की कामना लिए
सैकड़ों बरस गुज़ारती रहीं

मैं लगातार सपने झुठलाता रहा
और उनसे प्‍यार करता रहा

मैंने प्‍यार किया उन लड़कियों से
जो नहीं जानती थीं उत्‍तराखण्‍ड किस चिड़‍िया का नाम है
कि मस्‍ज़‍िद ढहाने का मतलब क्‍या होता है
वे मोदी धागा जानती थीं
ढाई लाख के मोदी सम्‍मान के बारे में
कुछ नहीं जानती थीं

वे ज्‍़यादा से ज्‍़यादा भोपाल या पटना या लखनऊ तक
नौकरी की परीक्षाएं देने जाती रहीं
और लौटती रहीं रात की पैसेंजर से
अपने जर्जर पिताओं के साथ

वे फिल्‍मी पत्रिकाएं पढ़ती रहीं
और देखती रहीं ताज़ा फ़‍िल्‍मों के नायक का चेहरा
बहुत देर तक

वे माँग कर लाई गई पत्रिकाओं से
स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं का समाधान करती रहीं

मेरे सपनों में आती रहीं आसमानी परियां
ठक-ठक करतीं दफ़्तर जाती लड़कियां
शैंपू से धुले बाल और पहली तारीख़ को
भरा-भरा पर्स

मैं सपनों की नहीं
हक़ीकत की दुनिया चाहता था
इस हक़ीकत की दुनिया में
नहीं चाहता था सपनों की लड़कियां.

 3 || सुरक्षित रास्‍ता ||

ज्‍़यादा दिन नहीं हुए हैं अभी
पच्‍चीस बरस पहले
कहते थे दादा पिता से
जा रहा हूं नहीं कहते
कहो आता हूं
और देखो भीड़-भीड़ जाना भीड़-भीड़ आना

मेरे छलकते लाल दिनों में
पिता कहते थे मुझसे
देखो, ज़रा जल्‍दी आ जाना
और भीड़-भाड़ का अब भरोसा नहीं
देर हुई तो सिविल लाइन से होते हुए आना
इन दिनों सबसे सुरक्षित
यही एक रास्‍ता बचा है

और मैं हंसकर
पिता की चिंता में शामिल हो जाता था
जैसे शामिल होते थे पिता दादा की सलाह में

रवीश के प्राइम टाइम के बाद
मेरा बेटा कपड़े बदलता है बाहर जाने के लिए
वापसी के लिए मैं नहीं बता पाता उसे एक भी सुरक्षित रास्‍ता
कहता हूं
क्‍या जाना ज़रूरी है ?

बेटा मुस्‍कराकर
निकल जाता है घर से
और पूरा घर बेटे के पीछे-पीछे चलता है.
***

4 . || कैलेण्‍डर||

मंजीत बावा नहीं हैं यहां
सूज़ा के रंग भी नहीं हैं
यहां नहीं है हुसैन का कोई घोड़ा
चूने से पुती दीवारों पर

बु‍द्धिजीवी कहते हैं
कि रंगों के अर्थों को सुनिश्‍चित करने वाले
बहुत गहरे और तीखे रंग यहीं पर हैं

शिवाकाशी की जनसुलभ कला
फ़कत हिस्‍सा नहीं है ड्राइंग रूम का
जीवन है पूरी दुनिया का इसके पीछे
और शिवाकाशी का बयान
कलाकारों के चमकदार रंगों से
दब कर भी उभर आते हैं
जीवन के तमाम धूसर रंग

मिसाल के तौर पर यहां कैलेण्‍डरों में
कुछ महिलाएं बैठी हुई हैं
वे बहुत खुश दिखाई दे रही हैं

एक बालक साफ कपड़े पहन कर स्‍कूल जा रहा रहा है
मध्‍यप्रदेश के आदिवासी अपनी मस्‍ती में करमा कर रहे हैं
सिनेमा की एक अभिनेत्री झरने के नीचे
नहाने का आनंद ले रही है
एक किसी उपग्रह का चित्र है
जिसमें केवल अंडा दिखाई देता है
जिसमें नीचे लिखा है अवर ग्रेट इंडिया

कुछ झुर्रियों भरे चेहरे हैं
जो फोटोग्राफी के कमाल से हैरान करते हैं

यहां एक बिस्‍कुटों का कैलेण्‍डर है
बच्‍चे अपनी-अपनी पसंद के
बिस्‍कुट खा रहे हैं
कहते हैं डिज़ाइन पर इसकी
बहुत खुश हुई थी कंपनी
कलाकार की तारीफ़ हुई
और समय पर भुगतान

कैलेण्‍डर छापने वाली प्रेस में
सब बिस्‍कुट खाने की उम्र को बहुत पीछे छोड़ चुके थे
मगर उनके बच्‍चे बिस्‍कुट खाने वाली उम्र के थे
उन्‍हें याद आए थे अपने-अपने बच्‍चे
वे चाहते थे धूसर कर देना बिस्‍कुटों का रंग
छापते-छापते
उन्‍हें लगता था कि इससे
पूरी दुनिया के बच्‍चे मचलेंगे नहीं
इनके लिए आगे कभी

मगर रोज़ी ने रोक लिया था उनका रास्‍ता
हर बार की तरह उन्‍हें फिर लगा
कि बड़ा कठिन है रोटी को पार करना

मगर बच्‍चे तो बच्‍चे हैं
देखते हैं और मचलते रहते हैं लगातार
बिस्‍कुटों के लिए

कहते हैं यहां की सफेद दीवारें
जब हो जाती हैं स्‍याह
ये कैलेण्‍डर एक-एक कर उतरते हैं
बच्‍चों बूढ़ों और जवानों के स्‍वप्‍नों में
और बच्‍चे तो खुश होकर पूरे बिस्कुट खा जाते हैं

इन तमाम कैलेण्डरों ने
ढँक लिया है ज़ाहिर दुनिया को

ये इक्‍कीसवीं सदी से कुछ पहले के कैलेण्‍डर
तय कर‍ेंगे इक्‍कीसवीं सदी
और साबित करेंगे इतिहास के मायने

और हो सकता है बार-बार के स्‍वप्‍नों से झुंझला कर
लोग फाड़ डालेंगे कैलेण्‍डर.
***

अनिल करमेले 

*दस्तक के लिए प्रस्तुति अमिताभ मिश्र*

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