विनोद रायना की स्मृति में ” हम ख़वातीन ” की प्रस्तुति 21 को भोपाल में. मप्र भारत ज्ञान विज्ञान समिति .

भोपाल / 19.07.2018

जानेमाने शिक्षाविद, जनविज्ञानी और हम सभी के अज़ीज़  विनोद रायना की स्मृति में इस वर्ष रंगकर्मी विनोद कुमार के निर्देशन व पूर्वा भारद्वाज के संयोजन में “हम ख़वातीन” की प्रस्तुति में आप सादर आमंत्रित हैं ।

भारत ज्ञान विज्ञान समिति द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले लोगों व संगठनों को विनोद जी की स्मृति में इस वर्ष से सम्मानित करने का भी निर्णय लिया गया है। अतः इस अवसर पर पहला विनोद रायना स्मृति शिक्षा सम्मान डॉ. सी. रामकृष्णन (शिक्षाविद व अध्यक्ष, भा. ज्ञा. वि. स.) प्रदान करेंगे । 

दिनांक –   21 जुलाई 2018, शनिवार शाम 06:00 बजे से
स्थान –   मोहनिया हाल, गांधी भवन, भोपाल
ज़रूर आयें ।
आयोजक : म. प्र. भारत ज्ञान विज्ञान समिति

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हम ख़वातीन…

ये तक़रीबन सौ साल पुरानी आवाज़ें हैं । औरतों की, मुसलमान औरतों की, उर्दू में । मुसलमान और उर्दू, जो आज हिन्दुस्तान में हाशिए पर हैं । लेकिन ये उस वक़्त की आवाज़ें हैं, जब न तो मुसलमान दबा हुआ महसूस करते थे और न हीं उर्दू ।

ये मुसलमान औरतें हैं, जो अपनी दुनिया को देख रही हैं, उसके मज़े ले रही हैं, उसकी नुक्ताचीनी भी कर रही हैं । इनमें हिचकिचाहट भी है तो कहीं वे बेखौफ़ नज़र आती हैं । ये ख़ुदमुख्तार औरतें हैं, लेकिन कई बार अपने नाम तक नहीं लिख पाती हैं । फिर भी लिखती हैं, बोलती हैं ।

जिन पुराने उर्दू रिसालों से इनके मज़ामीन लिए गए हैं, उनमें से “तहज़ीब ए निस्बां” लाहौर से निकलती थी, “उस्तानी” दिल्ली से और “ख़ातून” अलीगढ़ से । हालांकि छोटे-छोटे क़स्बों से भी कई रिसाले निकलते थे । उनका एक संकलन “कलाम ए निस्वां” नाम से निरंतर संस्था ने प्रकाशित किया है । उसी से चुनिन्दा रचनाएं “हम ख़वातीन” लेकर आई हैं ।

ख्वाजा बानो का लिखा “उस्तानी का तारूफ़” 1919 में “उस्तानी” में शाया हुआ था । वहीं से 1919 में ही अलीगढ़ की अज़ीज़ा ख़ातून का पर्चा “गवर्मेन्ट हौव्वा नहीं है” आया था । “जिन्स ए लतीफ़ की सरगर्मियां” नामक रिपोर्ट “उस्तानी” में ही 1920 में छपी थी । लेखिका की जगह लिखा था नामालूम । “फट पड़े वो सोना जिससे टूटें कान” की लेखिका थीं आलिया बेगम बिन्त मुजीब अहमद तमन्नाई और यह 1911 में “ख़ातून” में छपा था । ज़फ़र जहां बेगम की जो राय थी वह “स्कूल की लडकियां” नाम से 1927 के “तहज़ीब ए निस्वां” में सामने आई । “खद्दरपोशी” भी उन्ही की रचना है और उसी साल उसी रिसाले में छपी थी ।

अलग-अलग मसले पर अलग-अलग अंदाज़ ए बयां के साथ ये सब ख़बातीन जो एक ही बात कहती जान पड़ती हैं वह है “बोलने के लिए आज़ादी चाहिए और आज़ादी के लिए बोलना” ।

निर्देशन – विनोद कुमार
प्रस्तुति में भागीदार : अलका रंजन, रश्मि सिन्हा,पूर्वा भारद्वाज, वंदना राग, रिज़वाना फ़ातिमा और श्वेता त्रिपाठी

परिचय :

विनोद कुमार

विनोद कुमार पटना, बिहार के वरिष्ठ रंगकर्मी हैं। लगभग चार दशकों की अपनी अभिनय यात्रा में उन्होंने देश के अलग अलग हिस्सों में सैंकड़ों प्रदर्शन किए हैं। पिछले कुछ सालों से वे गैर-कथात्मक लेखन की पाठात्मक प्रस्तुति को लेकर अभिनय और निर्देशन में नया प्रयोग कर रहे हैं.

रश्मि सिन्हा

इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर रश्मि सिन्हा ने ओनिडा, एल.जी.,टाटा ग्रुप जैसी कंपनियों में काम किया है। उन्होंने अभिनय की शुरुआत लगभग 35 वर्ष पूर्व की। पटना के इप्टा, कला संगम और एक्ट वन ग्रुप से वे सक्रिय रूप से जुड़ी रही हैं। हाल के दिनों में उन्होंने फिल्म में भी अभिनय किया है.

वंदना राग

वंदना राग मूलतः कथाकार हैं। उनके दो कहानी संग्रह ‘यूटोपिया’ और ‘हिजरत से पहले’ प्रकाशित हैं। उनके द्वारा किया गया इतिहासकार हाब्सबॉम की किताब का अनुवाद भी छप चुका है। फिलहाल वे अपना पहला उपन्यास लिखने में जुटी हैं। फिर भी कला-संस्कृति के हर मोर्चे पर डटी रहती हैं.

पूर्वा भारद्वाज

पूर्वा भारद्वाज संस्कृत की छात्रा रही हैं। जेंडर, भाषा और शिक्षा के मसले पर तकरीबन डेढ़ दशक से वे गैर-सरकारी और सरकारी संस्थाओं के साथ काम कर रही हैं। लेखन, संपादन, अनुवाद, प्रशिक्षण, दस्तावेजीकरण आदि उनके अनुभव और दिलचस्पी का क्षेत्र है।  

पूर्णिमा गुप्ता 

महिला अधिकारों पर काम करती हैं। पूर्णिमा 1998 से निरंतर ट्रस्ट में कार्यरत हैं।  2002 से  वे निरंतर के महिला शिक्षा तथा महिला सशक्तीकरण के कार्यक्रम –  सहजनी शिक्षा केन्द्र, ललितपुर ( अब स्वतंत्र संस्था) की अगुवाई कर रही हैं। सक्रिय कार्यकर्ता पूर्णिमा की रुचि कला में भी है.

श्वेता त्रिपाठी

हिन्दी साहित्य पढ़नेवाली श्वेता त्रिपाठी की अभिनय और गायन में गहरी दिलचस्पी है। फिलहाल श्वेता गैर-सरकारी संगठन श्रुति की सह-निदेशक हैं। वे लगभग 15 सालों से मुख्य रूप से जल, जंगल, ज़मीन, घरेलू श्रम और किसानों, शहरी गरीबों व बेघर लोगों के मुद्दों पर काम कर रही हैं। 

रिज़वाना फ़ातिमा

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में स्त्री लेखन में यात्रा के सन्दर्भ पर शोध कर रही हैं। कॉलेज के दिनों से वे मंच पर सक्रिय हैं। हाल ही में उन्होंने उमा चक्रवर्ती द्वारा निर्देशित डॉक्युमेंट्री फिल्म ‘एक इन्क़लाब और आया’ (documentary film) में भी काम किया है। 

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निर्देशक के नोट:

हम ख़वातीन का सफर : निर्देशक विनोद कुमार

पूर्वा भारद्वाज  के द्वारा :

बात पिछले साल यानी 2015 के अक्टूबर की है। मैं और अपूर्वानंद, अली जावेद साहब के यहाँ शाम की चाय पर यूँ ही कुछ गप शप कर रहे थे। तभी इस्मत चुगताई, जिनका यह जन्मशती वर्ष है , पर विशेषांक निकालने को लेकर बात शुरू हुई। अपूर्वानंद ने जावेद साहब से यह जानना चाहा कि इस्मत चुगताई पर कैसे कैसे और कितने मौलिक काम या शोध उपलब्ध हैं। मालूम  हुआ कि कुछ भी खास काम उपलब्ध नहीं है, जबकि इस्मत के समय के दूसरे सभी अफसानानिगार, जिनमें से कई तो उनके करीबी दोस्तों में रहे हैं, पर बहुत से मौलिक शोध मिल जाएँगे। यह अपने आप में काफी आश्चर्यजनक है कि अपने समय के काफी चर्चित अफसानानिगारों में रहने के बावजूद इस्मत पर किसी ने इतने  सालों में किसी किस्म के ठोस काम की ज़रूरत महसूस नहीं की। यह महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं हो सकता। दूसरी, एक और बात जिसका यहाँ ज़िक्र करता चलूँ कि इस्मत चुगताई के इस जन्म शताब्दी वर्ष पर हमारे सांस्कृतिक हलके में भी कोई बड़ी हलचल नहीं नज़र आ रही थी। हाँ, यहाँ यह ज़िक्र ज़रूरी है कि अभिनेता नसीरुद्दीन शाह वर्षों से “इस्मत आपा” नाम से उनकी कहानियों का मंचन करते आ रहे हैं। 

बस, यही कुछ बातें दिल को लग गईं और बहाना बना ‘हम ख़वातीन’ की प्रस्तुति करने का। अपनी दोस्त पूरब के कुछ शोध,जैसे “भय नाही खेद नाही” और “कलामे निस्वाँ” मैंने पहले से पढ़ रखे थे, और कई बार उनके अंशों या लेखों ( मज़ामीन ) को मंचीय प्रस्तुति में ढालने को लेकर हम चर्चा भी करते रहे थे। और अब हम इस मौके को आज़माना चाहते थे। 

सबसे पहली चीज़ थी, लेखों का  चुनाव। यह हमारे लिए सबसे खास था क्योंकि उसी पर हमारी प्रस्तुति का पूरा कथ्य निर्भर करनेवाला था। यहाँ हमारे लिए कोई भी दुविधा नहीं थी। हमें जो कहना या दिखाना था उसी के नज़रिए से हमने चुनाव किया।  यहीं से शुरुआत होती है इस प्रस्तुति की असली भूमिका। इसमें सबसे ज़्यादा किसी ने साथ दिया तो वो भी पूरब ही थीं। चाहे लेखों के चयन से लेकर उनके क्रम को तय करना हो और फिर इस प्रस्तुति को नाम, उन्वान देने में सहयोग करना हो, पूरब हर जगह मौजूद रहीं। 

अब बारी थी उन्हें प्रस्तुत करनेवालों की, जिसमें यह तो पहले से तय था कि सभी ख़ातून ही रहेंगी। थोड़ी बहुत बातचीत के बाद टीम के लगभग सभी नाम तय हो गए। इनमें से शुरुआत में जो नाम तय हुए वो थे – अलका रंजन, पूनम गिरधानी, श्वेता त्रिपाठी,बारान इजलाल और पूरब। बाद में एक और नाम पर गौर किया गया, वो था रक्षंदा जलील का । ये सभी दिल्ली के लोग थे। हमारे शहर पटना में भी थोड़ी बहुत चर्चा दोस्तों के बीच हुई और उनमें से एक पुरानी अभिनेत्री नूतन ने इसमें शामिल होने की इच्छा ज़ाहिर की। अपनी व्यस्तताओं और कतिपय कारणों से कुछ लोग आगे उपलब्ध नहीं हो सके। इसी बीच एक ज़बरदस्त हादसा हम सबके सामने आया, जिसने उस वक़्त कुछ ऐसी स्थिति ला खड़ी की कि हमें लगा कि हम शायद यह प्रस्तुति नहीं कर पाएँगे। हमारे मित्र शाहिद अनवर का इंतकाल हो गया। यह हमारे और हमारी टीम दोनों के लिए भारी सदमा था। हमारी टीम की पूनम जो उनकी बेगम हैं और जो टीम में एकमात्र परफार्मिंग आर्टिस्ट थीं और जिनसे प्रस्तुति के दौरान हम सब काफी सहारे की अपेक्षा भी रखते थे, उनका प्रस्तुति में शिरकत कर पाना अब नामुमकिन हो गया।  

जब से हमने योजना शुरू की थी, तब से लेकर अब तक कोई 4महीने गुज़र चुके थे। हम 2016 की फ़रवरी के अंत में आ चुके थे। 

मेरा पटना में होना, मेरी टीम का दिल्ली में होना, टीम के सदस्यों का मिलकर साथ लगातार रिहर्सल नहीं कर पाना (सब बहुत व्यस्त रहनेवाली पेशेवर महिला हैं) और फिर शाहिद भाई का हादसा। ये सब कुल मिलाकर हमें उस मोड़ तक ले आया कि हमने तय किया अब यह प्रस्तुति सम्भव नहीं है। यहाँ मैं अपने इस बिल्कुल नए बन रहे दल के उन दो साथियों का खासतौर पर शुक्रिया अदा करना चाहूँगा जिन्होंने यह हौसला और भरोसा दिया कि हम इसे करेंगे।

हमारी टीम की सभी साथी अलग अलग क्षेत्र में काम कर रही हैं और सफल हैं, लेकिन performing art के लिहाज़ से वे गैर पेशेवर हैं। उनके मुख्तलिफ़ अनुभव और अलहदा किस्म की जीवन शैली प्रस्तुति में ताज़गी और रवानी लाने में बहुत काम आई। दरअसल हमारा सांस्कृतिक क्षेत्र में काम करने का अब तक का यही अनुभव रहा है कि गैर पेशेवर या शौकिया दल हमेशा ही उत्साह और ताज़गी भरा होता है और कुछ भी कर गुज़रने को तैयार रहता है। यह टीम का उछाह ही था कि अपनी तमाम व्यस्तताओं से वक़्त निकालकर सबने मेहनत की और आखिर में यह प्रस्तुति हो पाई। 

डिज़ाइन को लेकर शुरू से यह बात लगभग स्पष्ट थी मेरे मन में कि इस Non – Fictional Text को नाटक जैसा तो नहीं ही होना है, पर इसे प्रस्तुति की शक्ल तो देनी ही है। इसीलिए मैंने तय किया कि इन मज़ामीन को पढ़ने के अंदाज़ से इतर कुछ किया जाए। यह ख़याल भी इनके लिखे जाने के अंदाज़ यानी इनके अंदाज़े बयाँ से ही मुझे मिला। यों कहें तो यह मदद खुद ये मज़ामीन कर रहे थे। इसलिए इन्हें हम पढ़ने नहीं, बल्कि कहने के अंदाज़ में प्रस्तुत करेंगे। यहाँ पढ़ने और कहने का फर्क क्यों ज़रूरी है, इसे समझना पड़ेगा। दरअसल हम जब किसी भी रचना को प्रस्तुत करते हैं और उस प्रस्तुति में उसके अपने रूप (फॉर्म) से अलग कोई चीज़ या रूप सामने नहीं आता तो देखनेवालों के लिए उसमे कोई सृजनशीलता या नयी बात घटित नहीं होती है। यह मेरे और हमारी टीम के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। फैसला दर्शकों के हाथ में है। दर्शक ही बताएँगे कि हम किस हद तक सफल हुए। 

मैंने टीम के सामने यह भी रखा कि इसे रिले रेस की तरह पेश किया जाए। मतलब, एक कलाकार जब अपनी बात कह ले तो वो अगली साथी का और साथ ही साथ उसके मज़मून का भी परिचय देती चले। मानो रिले रेस की मशाल आगे बढ़ाई जा रही हो। एक मज़मून (‘गवर्मेंट हौव्वा नहीं है ‘) ऐसा भी चुना गया, जिसकी प्रस्तुति पूरी टीम ने मिलकर की। उसका प्रभाव कुछ ऐसा हुआ मानो बिल्कुल एक स्वर उभर रहा हो। यह इस प्रस्तुति का एक अनूठा प्रयास था जिसके बारे में रिहर्सल के दौरान खुद टीम ने तय किया और इसे सफलता से अंजाम दिया। 

मज़ामीन से, उनकी ज़ुबान से परिचय स्थापित करना हमारा अगला पड़ाव था। आज से लगभग सौ साल पुरानी उर्दू और साथ में ऐसे ऐसे फ़ारसी और अरबी शब्द, जिनसे हमारा कभी सामना नहीं हुआ था। अव्वल तो उनको ज़ुबान पर चढ़ाना मुश्किल, फिर उनके अर्थ को समझने की माथापच्ची। और सबसे मुश्किल था तलफ्फ़ुज़ का पूरा ख़याल रखते हुए, उसकी अदायगी के साथ लेखों को दर्शकों तक पूरी तरह सम्प्रेषित कर पाना। यही हमारा लक्ष्य था। इन चुनौतियों के साथ टीम को text को याद करना था। प्रस्तुति के बाद मैं मुतमइन हूँ कि हमारी टीम लक्ष्य के करीब थी। 

इस सफर का एक अनोखा पहलू है इसका रिहर्सल लेने का हमारा तरीका। अनोखा पहलू था कि हमारी टीम साथ बैठ कर रिहर्सल करती और व्हाट्सऐप्प पर मुझे उसकी रिकॉर्डिंग भेजती और मैं जवाबी खत की तरह उस पर अपनी निर्देशकीय टिप्पणी भेजता। कभी कभी टुकड़े में एक आध वीडियो भी मिलते थे देखने को। चूँकि यह प्रस्तुति प्रदर्शनकारी कला का एक फॉर्म है, मैं अक्सर इसका आग्रह करता था। वैसे वो बहुत काम का होता नहीं था। हर महीने दो महीने पर मैं अक्सर दिल्ली जाता रहता था और उस दौरान हम कभी तो साथ में और कभी टुकड़ों में रिहर्सल किया करते थे। दूरस्थ टीम के साथ काम करने का फैसला नई तरकीबों और जुगत को लेकर आया।  

इन दुश्वारियों से गुजरते हुए हम पहुँचे इसके प्रदर्शन का दिन तय करने के मुकाम पर और थोड़ी सी बातचीत के बाद आखिर हमने1 मई, 2016 की तारीख पक्की की।  फिर दिल्ली के ही साथियों की मेहनत से इसका प्रदर्शन स्थल भी तय हुआ। और अप्रैल के अंत में दस दिनों का अवकाश लेकर मैं दिल्ली पहुँचा। दल के सभी साथियों से भरपूर सहयोग दिया और हमने जम कर रिहर्सल किया। 

यहाँ एक साथी का ज़िक्र नहीं हो पाया, वो हैं दिल्ली विश्वविद्यालय की शोध छात्रा रिज़वाना फातिमा। वे टीम में बिल्कुल आखिर में जुड़ पाईं और उन्होंने बहुत लगन से काम किया। सभी ने मिल बैठ कर costume तय करने, उसे मुहैय्या कराने और साथ ही साथ दूसरे तमाम संसाधन जुटाने में भरपूर मदद की। सही मायने में यह प्रस्तुति एक सामुदायिक कला के प्रदर्शन का उदाहरण बनी। यहाँ प्रदर्शन को सफल बनाने के आखरी मोड़ पर जिन दो तीन साथियों ने मदद की उनका ज़िक्र किए बगैर यह  प्रस्तुति पूरी नहीं हो पाएगी। उनमें अपूर्वानंद और नासिरूद्दीन हैदर खान, जिन्हें हम प्यार से कब्बू बुलाते हैं, का नाम उल्लेखनीय है। नासिरूद्दीन ने आधी रात तक बैठकर चाव से इसका पोस्टर और ब्रोशर तैयार किया।

अंत में एक और बात जो कहना बहुत ज़रूरी समझता हूँ वह यह है कि भाषा के जिस संस्कार की ज़रूरत हमारे रंगमंचीय और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए अपेक्षित रहती है, उसका आनंद इस प्रस्तुति में कम से कम मुझे तो मिला। 

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