जशपुर : ईसाई आदिवासियों के आरक्षण के खिलाफ़ कौन हैं .: आरक्षण तो संविधान के अनुसार आदिवासियत, अनुसूचि के अनुसार मिलता है.

 

याकूब कुजूर

जशपुर / 18.07.2018

आज जशपुर में ईसाई जनजातियों के आरक्षण बन्द के नारे लगाए जा रहे हैं । उसी समाचार में जोड़ने के लिए-
लोकतंत्र का अर्थ है जनता का जनता के लिये और जनता द्वारा शासन। जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा शासन। प्रतिनिधयों का चयन ही भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी समस्या बन गई है। प्रतिनिधयों का चयन चुनाव यानि मतदान द्वारा होता है। सबसे अहम सवाल है, क्या मत का यहाँ दान होता या खरीद-फ़रोख्त होता है? अगर मत का दान होता तो यहाँ चुनाव से संबंधित कोई समस्या नहीं होती। कोई राजनीतिक पार्टी को मत खरीदने का साहस नहीं होता। सैद्धान्तिक तौर स्वीकार्य नहीं कि मत को खरीदा या बेचा जाता है। लेकिन व्यवहार में ऐसा ही दिखाई देता है। राजनीतिक पार्टियां बहुमत पाकर शासन सत्ता हासिल करने के लिए मतदान को प्रभावित करने का अथक प्रयास करती हैं। इसी तारतंय में जाति, धर्म का कार्ड भी खेला जाता है। जशपुर में आज जो हो रहा है वह भी राजनीति से ही प्रेरित है। धर्म का ध्रुवीकरण कर राजनीतिक खेल खेला जा रहा है। कहा जाता है आदिवासियों का कोई “धर्म” नहीं होता, वे प्रकृति पूजक होते हैं। कालांतर में कोई आदिवादी ईसाई बन गए तो कोई और अन्य। जो लोग अपने को हिन्दू उरांव कहते हैं उन्हें ईसाई उरांवों से इतनी छिड़ क्यों? आखिर दोनों तो उरांव ही हैं.

दोनों एक ही नश्ल और वंश के हैं। उनका कोई “धर्म” नहीं तो आज धर्म की इतनी चिंता क्यों? अगर कोई अपने को हिन्दू या ईसाई कह रहा है तो दोनों तो धर्मान्तरित हुए। क्योंकि उनका धर्म तो प्रकृति धर्म था। अगर धर्मान्तरण आरक्षण बन्द का आधार है तो दोनों का बंद होना चाहिए।

 

रही बात दोहरी लाभ लेने की तो दोनों वर्ग तो ले रहा है। एक ईसाई से तो दूसरा हिंदुओं से। आरक्षण तो संविधान के अनुसार आदिवासियत, अनुसूचि के अनुसार मिलता है। उच्चन्यायालय के फसलों ने तो धर्म को नहीं जाति, नश्ल, वंश को आरक्षण का आधार माना है। कुछ उच्चन्यायालयों ने तो यह भी माना है जो अनुसूचित जनजाति के लोग अपने को हिंदू मानते हैं वे हिन्दू लॉ से शासित होंगें, तो उनकी जतजतीयता समाप्त।

इसलिए जशपुर की जनजातियां विचार करें धर्मिक लड़ाई लड़ने में भलाई है या आदिवासियत, जनतातीयता को बचने में जो उन्हें संवैधानिक अधिकार प्रदान करता है? क्या धर्म और राजनीति आदिवासियों को विभाजित नहीं कर रहे? चिंचन करें, भाई-भाई बने रहने में भलाई है या धर्म, राजनीति के नाम विभाजित होने में? याद रखें आरक्षण जनसंख्या के प्रतिशत के आधार पर निर्धारित होता है, ईसाई आदिवासी को अनुसूचित जनजाति न माना जाए तो क्या जनजातियों की संख्या कम नहीं होगी? और अगर कम हुई तो यह क्षेत्र भी आरक्षित नहीं रह जायेगा। सामान्य घोषित हो तो किसको लाभ होगा? राजनीति के नाम आदिवासियों का विभाजन बन्द हो। स्वयं आदिवासी भी इस खेल को समझने का प्रयास करें।

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