सीजी नेट स्वर की पहल – शुरू हुई हिंदी और गोंडी के बीच दूरी खत्म करने की शुरुवाद

सीजी नेट स्वर की पहल 

शुरू हुई हिंदी और गोंडी के बीच दूरी खत्म करने की शुरुवाद 

Posted:2015-05-31 10:05:46 IST   Updated: 2015-05-31 10:05:46 ISTRaipur : began initiative to eliminate distance between Hindi and Gondi

सीजीनेट स्वर (वैकल्पिक मीडिया का समूह) में कार्यकर्ता रविकांत पेन्द्रे तथा कमल गौड़ ने भी उच्च शिक्षा हासिल करने के बावजूद नौकरी को न कहा है।
रायपुर. माओवादी प्रभावित कुछ इलाके में बच्चों का रोजाना स्कूल पहुंचना ही बड़ी बात मानी जाती है। मगर विपरीत परिस्थितियों में बड़ी डिग्रियां लेने के बावजूद वे नौकरी को न कह दें। कम ही होता है। ऐसे ही कुछ आदिवासी नौजवान बदलाव की इबारत लिखते हुए नया रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन में एकत्रित हुए हैं।
पत्रकारिता और वकालत की डिग्रियां लेने वाले और अंग्रेजी जैसी कुछ भाषाओं के अच्छे जानकार लालसू नोगोटी ने हर तरह की नौकरी को न बोला है। छत्तीसगढ़ से सटे महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में जुब्बी जैसे मारिया गौड़ जनजाति बहुल गांव के यह होनहार युवा असल में आदिवासी बिरादरी के लिए बदलाव की बारहखड़ी लिखना चाहते हैं।
वे पुलिस और नक्सलियों की लड़ाई को मिटाने के लिए गोड़ी बोली की दोस्ती हिंदी से कराना चाहते हैं। मगर नौकरियों को न कहने और संवाद से समाधान कराने के लिए आगे आने वाले वे अकेले युवा नहीं है। सीजीनेट स्वर (वैकल्पिक मीडिया का समूह) में कार्यकर्ता रविकांत पेन्द्रे तथा कमल गौड़ ने भी उच्च शिक्षा हासिल करने के बावजूद नौकरी को न कहा है।
युवा सीख रहे गोंडी
कमाल की बात है कि रविकांत पेन्द्रे और कमल , गौड़ होने के बावजूद अपनी गोंडी बोली नहीं जानते। इसलिए उन जैसे कई आदिवासी सीजीनेट स्वर द्वारा आयोजित नाट्य संगीत कार्यशाला में इन दिनों गौड़ी सीख रहे है। कमल बताते हैं कि कई गौड़ इलाकों में गोंडी विलुप्त हो चुकी है। वजह है कि युवाओं में अपनी ही बोली को लेकर हीनभावना है। इसलिए वे अपनी संस्कृति की अच्छी बातों का प्रसार करने के लिए फिर से अपनी ही बोली सीखेंगे।
गोंडी से ही समाधान
लालसू नोगोटी के मुताबिक हिंसा प्रभावित इलाकों में पुलिस, वकील और अधिकारी जनजातियों की जुबान नहीं जानने के चलते न तो उनकी समस्या से परिचित है, न संवेदनओं से। लिहाजा गोंडी बोली के जानकार शिक्षित युवा जंगल में रहते हुए यदि आदिवासी अधिकारों की लड़ाई लड़ेंगे और प्रचार-प्रसार के लिए आगे आएंगे तभी बदलाव संभव है। सुंभ्राशु चौधरी मानते हैं कि मध्य भारत में माओवाद की समस्या की जड़ में भी गोंडी और हिन्दी बोलने वालों के बीच एक तरीके की दूरी जिम्मेदार है। आदिवासी जमात की बोली और संवाद से बड़ी से बड़ी समस्याएं आसानी से सुलझ सकती हैं। हिन्दी और आदिवासी जमात के बीच 36 का आंकड़ा है। जरूरत है संवाद के जरिए इसे 63 में बदला जाए।
नया रायपुर से निकलेगी यात्रा
पत्रकार गोंडी नहीं बोल पाते, इसलिए उनकी बातें दबी रह जाती हैं। लिहाजा इस कार्यशाला में जनपत्रकारिता यात्रा की तैयारी चल रही है। इसमें छत्तीसगढ़ और अन्य आदिवासी राज्यों में उनके मुद्दों को नाटकों के जरिए दिखाया जाएगा। इसमें गोंडी, हिंदी और शहरी समूहों ने परस्पर मिलकर न केवल एक-दूसरे की जुबान सीखी बल्कि हिन्दी गौड़ी के फ्यूजन से नाटकों की नई सीरीज तैयार की है।

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