फ्रिडा_काहलो_दि_रिवेरा : चित्रकारी की दुनिया की अनोखी शख्सियत थी फ्रिडा. : बादल सरोज.

फ्रिडा_काहलो_दि_रिवेरा : चित्रकारी की दुनिया की अनोखी शख्सियत थी फ्रिडा. : बादल सरोज.

 

13 .07.2018

कभी कभार अपनी पसंदीदा स्त्रियों को याद कर लेने में कोई समस्या नहीं है । सार्वजनिक रूप से याद करने में तो और भी कोई हर्ज नही है । आज ऐसी ही स्त्री फ्रिडा काहलो रिवेरा के बारे में कुछ साझेदारी 6जुलाई 1907 जन्मी फ्रिडा का निधन आज ही के दिन 13 जुलाई 1954 को हुआ था ।

● चित्रकारी की दुनिया की अनोखी शख्सियत थी फ्रिडा। उन्हें सेल्फ पोर्ट्रेट के लिए जाना जाता है । वे जितनी बड़ी चित्रकार थी उतनी ही बड़ी एक्टिविस्ट और टिप्पणीकार भी थीं । यहाँ दिए चित्रों में से एक उस प्रदर्शन में उनकी हिस्सेदारी का है जो वेनेज़ुएला में सीआईए के हस्तक्षेप के विरुद्ध मैक्सिको में हुआ था । यह उनकी आख़िरी सार्वजनिक उपस्थिति थी । चन्द दिन बाद मात्र 47 साल की उम्र में वे नहीं रही ।
● बचपन में पहले पोलियो -जिससे अपने पिता की प्रेरणा और देखरेख से वे बाहर आईं – उसके बाद एक सड़क दुर्घटना का शिकार हुयी फ्रिडा ने अपनी चित्रकला शैली खुद ही तय की । पाब्लो पिकासो और Marcel Duchamp ने भी इस सिद्दहस्ता की मौलिकता को दर्ज किया है ।

● चित्रों की खासियत उनमे चित्रकार की खुद कि मौजूदगी होती है और यह केवल उसके हस्ताक्षर भर से नहीं होती । लैंडस्केप हो या पोर्ट्रेट, एब्सट्रेक्ट हो या मिनिएचर कभी कर्व, कभी शेड तो कभी पंक्तियों के विन्यास तो कभी आकारों के प्रकार की भाषा में कलाकार – जाहिर है मौलिक कलाकार – अपना नाम बताता है । फ्रिडा ने तो अपना पूरा व्याकरण ही रचा था 

● स्त्री के व्यक्तित्व के प्रति वे कथित सामाजिक मान्यताओं के दबाब में नहीं आईं, उन्हें चुनौती दी । नया नैरेटिव दिया । उसे जीया भी । अपने परिचित कलाकार (म्यूरलिस्ट) दिएगो रिवेरा के साथ उन्होंने विवाह किया । बीच में कुछ समय के लिए तलाक हुआ, फिर दोनों ने आपस में शादी कर ली ।

● फ्रिडा उस जमाने मे “फैमिनिस्ट” (नारीवादी) कही जाती थीं जिस जमाने मे इस शब्द के मायने समझ नही आते थे (हम सरीखे अज्ञानियों को तो आज तलक समझ नही आये 😉😉) – मगर फ्रिडा मार्क्सवादी थी । मार्क्सवाद से प्रभावित इस कूंची-सिद्धा ने 20 वर्ष की आयु में ही मैक्सिको की कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले ली थी । वे आजन्म कम्युनिस्ट रही थीं । इसलिए उन्हें किसी अतिरिक्त तमगे की आवश्यकता नही थी ।

● ये फैमिनिस्ट का फुंत्रू उनके साथ शायद इसलिए जुड़ा होगा कि वे व्यक्तित्वों के स्वातंत्र्य की हामी थी । एक दूजे के लिए होना एक दूजे की निजता मिटाकर एक दूजे पर हावी होना नही होता । फ्रिडा और दिएगो के सम्बंध इसी तरह के थे । वे अगल बगल के मकान में रहे – अपने अपने स्टूडियोज में रचते हुए ।
● फ्रिडा और रिवेरो के साथ एक दिलचस्प किस्सा जुड़ा है । अमरीका के सबसे बड़े धनपशु नेल्सन रॉकफेलर ने इन दोनों को न्यूयार्क के रॉकफेलर सेन्टर की चित्र-सज्जा का काम सौंपा । रिवेरा ने उस म्यूरल की थीम रखी : चौराहे पर आदमी Man at the Crossroads और इस विशाल म्यूरल में उन्होंने व्लादिमीर लेनिन का भी पोर्ट्रेट लगा दिया । रॉकफेलर ने उसे हटाने के लिए कहा । रिवेरा के ना करने पर वे ऐसे बिचके कि उन्होंने उस प्रोजेक्ट के अधबीच में ही रिवेरा का कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया । बाद में लेनिन की छवि पोत कर म्यूरल पूरा करवाया ।

(देखिये फ्रिडा के कुछ आत्मचित्र और पेंटिंग्स)

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