फिल्म क्या, वह तो संजय दत्त को बियॉन्ड कोर्ट, कचहरी नायक पेश करने का किस्सा है… फिल्म रिव्यूः  संजू : बरुण सखाजी 

4.07.2018

 
परेश रावल जब सुनील दत्त की भूमिका में आए तो पता चला कि वे वास्तव में मोदी के सांसद हैं। मोदी के सांसद चाहे कितना भी अपने आपको छिपाएं वे पकड़े ही जाते हैं। परेश रावल मामा ठाकुर के बाद से जिन कॉमिक भूमिकाओं में नजर आए हैं उनने परेश के अभिनय पर विपरीत असर डाला है। सुनील दत्त के कैरेक्टर को वे सिवाए लुक के अलावा कुछ भी न दे सके। बहुत संभलकर भी डायलॉग डिलेवरी में उनका गला हेरा-फेरी के डायलॉग के लिए अधिक अभ्यस्त नजर आया। इसके उलट रणबीर के काम ने एक बात सिद्ध कर दी कि वे आम अभिनेता या सिर्फ स्टार-पुत्र नहीं हैं, बल्कि अपने अभिनय में वैविध्य के धनी और श्रेष्ठतम देने में बॉलीवुड की इकलौती च्वाइस बनते जा रहे हैं। मनीषा कोइराला ने नर्गिस की भूमिका में जबरदस्त काम किया, इसमें कोई दो राय नहीं। अनुष्का विराट शर्मा के बारे में यह कहना न्यायोचित होगा कि वे जितना करियर में आगे बढ़ रही हैं उतनी ही सौंदर्यहीन होती जा रही हैं। अपनी एक्टिंग में वे पीके की जगतजननी के कैरेक्टर जैसी ही लगी हैं। 
संजू फिल्म देश की इकलौती ऐसी फिल्म भी कही जा सकती है जो किसी व्यक्ति को स्थापित करने के लिए बनाई गई है।

 

फिल्म को देखकर एक ख्याल जरूर आया कि अब से सेंसर बोर्ड को किसी यथार्थ व्यक्तित्व पर फिल्म बनाने के लिए भी अपनी गाइडलाइंस मजबूत करनी चाहिए। चूंकि संजू एक नई परंपरा डालती है। कल सौ-पचास करोड़ खर्च के चक्कर में कोई फिल्म मेकर अपने क्रिएशन को ओसामा बिन लादेन के प्यार के किस्से भी बना सकता है। 52 बीवियों और ओसामा के दिल की धड़कनों को केंद्र में रखकर ख्यात, सिद्ध अपराधी को भी नायक बना सकता है। और उसके लिए अमरिका को दोषी बताना एक मजबूत आधार हो सकता है, जैसा कि संजू में मीडिया को बताया गया।

पूरी फिल्म कभी सुनील दत्त की लकड़ी पर संजू बाबा को महान बनाने की बेल जैसी चढ़ाई जाती है। संजू बाबा अपने पिता से डरते थे और उनका आदर करते थे, लेकिन बिगड़ते बराबर जा रहे थे। ऐसे बच्चों को जस्टीफाइ किया जाना थोड़ा संदेहास्पद है। 

फिल्म बार-बार ऐसा साबित करने की कोशिश करती है कि संजू बाबा मासूम हैं, सिर्फ मीडिया ने उन्हें खलनायक बनाया। उन सारे तथ्यों को ताक पर रखकर जो पुलिस, कोर्ट, टाडा कोर्ट तक में करीब 20 साल तक सत्य के रूप में स्थापित रहे। एक शक्तिशाली सांसद, एक धनाड्य एक्टर को इतना लाचार बताकर बीच-बीच में पुलिस सिस्टम और कोर्ट सिस्टम को भी खींचा गया। बीच में तो ऐसा लगता है जैसे संजू बाबा से पूरा देश बदला ले रहा है और वे मासूम बनकर ड्रग्स लिए जा रहे हैं।

हथियार वाले तथ्य को चूंकि फिल्म मेकर हटा नहीं सकता था, इसिलए जस्टीफाइ किया गया। एक मोब से मुकाबला करने के लिए एके-56 रायफल की जरूरत भी गजब है। 1992 में अयोध्या बाबरी ध्वंश के बाद वास्तव में देश में हालात नाजुक थे, लेकिन संजू बाबा के लिए नहीं। फिल्म एक कुतर्क भी करती है कि संजू बाबा अगर आतंकवादियों से जुड़ा होता तो मॉरीशस से भारत क्यों आता, जबकि सच है कि वे अपने सामने पूरे जीवन के बड़े करियर को दरकिनार करके जाते कहां? फिल्म टाइगर मेमन, अबु सलेम जैसों से संजय दत्त के रिश्तों पर मौन हो जाती है और बंडू दादा (काल्पनिक गुंडा) पर मुखर। यहीं से इसमें पक्षपात की हल्की बदबू भयानक रूप धारण करती है। वो भी गणेश विसर्जन के नाम पर।
फिल्म एक लेखिका को भी स्थापित करती है। उन्हें हद से ज्यादा रीयलिस्टक बायोग्राफी राइटर साबित किया है। यह इसिलए नहीं कि वह ऐसी होंगी या नहीं होंगी बल्कि इसलिए ताकि किताब भी पुनर्जीवित होकर लोगों तक उस विश्वास के साथ पहुंचे। लेखिका ने ऐसे ही किताब नहीं लिखी। संजू बाबा ने बहुत मिन्नतें की तब जाकर सच सामने आया। यह किताब की विश्वसनीयता के लिए किया गया, वास्तविकता में थोड़ा संदेह है।

एक और बात फिल्म बहुत ही चालाकी से प्रिया दत्त या दत्त परिवार की उस लोकसभा सीट (मुंबई-उत्तर-मध्य) को भी संरक्षित करने की कोशिश करती है जहां मुस्लिम बाहुल्य है। इसीलिए सुनील दत्त के ट्रक्स इस इलाके में रिलीफ का काम कर रहे थे। फिल्म बहुत ही धीरे से यह भी जस्टीफाई करती है कि 1993 के दंगे 1992 के बाबरी विध्वंश की प्रतिक्रिया थे। अगर ये सिर्फ प्रतिक्रिया थे, तो बाबरी बार-बार नहीं गिरी फिर आतंकी हमले क्यों बार-बार हो रहे हैं।

फिल्म इन शॉर्ट सारे फसाद की जड़ मीडिया को बताते हुए बलात संजू को नायक सिद्ध करने की क्रिएटिव कवायद है।

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