⭕ काज़ी नज़रुल इस्लाम की चार कविताएं  : दस्तक के लिए प्रस्तुति : अंजू शर्मा

अनुवाद : सुलोचना

साभार हिंदी समय से

एक

||तरुण प्रेमी ||

तरुण प्रेमी, प्रणय वेदना
बताओ बताओ बे-दिल प्रिया को
ओ विजयी, निखिल हृदय
करो करो जय मोहन माया से।

नहीं वो एक हिया समान
हजार काबा, हजार मस्जिद
क्या होगा तुम्हारे काबा की खोज से
आश्रय ढूँढ़ो तुम्हारे हृदय की छाँव में।

प्रेम की रोशनी से है जो दिल रोशन
जहाँ हो समान उसके लिए
खुदा की मस्जिद, मूरत मंदिर
ईसाई गिरिजा, यहूदीखाना।

अमर है उसका नाम प्रेम के पन्नों पर
ज्योति से जिसे जाएगा लिखा
दोजख का भय नहीं होता है उसे
नहीं रखता है वह जन्नत की आशा।

दो.

|| विजयनी ||

ओ मेरी रानी ! हार मानता हूँ आज अंततः तुमसे
मेरा विजय-केतन लूट गया आकर तुम्हारे चरणों के नीचे।
मेरी समरजयी अमर तलवार
हर रोज थक रही है और हो रही है भारी,
अब ये भार तुम्हें सौंप कर हारूँ
इस हार माने हुए हार को तुम्हारे केश में सजाऊँ।

ओ जीवन-देवी
मुझे देख जब तुमने बहाया आँखों का जल,
आज विश्वजयी के विपुल देवालय में आंदोलित है वह जल!
आज विद्रोही के इस रक्त-रथ के ऊपर,
विजयनी ! उड़ता है तुम्हारा नीलांबरी आँचल,
जितने तीर है मेरे, आज से सब तुम्हारे, तुम्हारी माला उनका तरकश,
मैं आज हुआ विजयी तुम्हारे नयन जल में बहकर।

तीन

|| किसानों की ईद ||

बिलाल ! बिलाल ! हिलाल निकला है पश्चिम के आसमान में,
छुपे हुए हो लज्जा से किस मरुस्थल के कब्रिस्तान में।
देखो ईदगाह जा रहे हैं किसान, जैसे हों प्रेत-कंकाल
कसाईखाने जाते देखा है दुर्बल गायों का दल ?
रोजा इफ्तार किया है किसानों ने आँसुओं के शर्बत से, हाय,
बिलाल ! तुम्हारे कंठ में शायद अटक जा रही है अजान।
थाली, लोटा, कटोरी रखकर बंधक देखो जा रहे हैं ईदगाह में,
सीने में चुभा तीर, ऋण से बँधा सिर, लुटाने को खुदा की राह में।

जीवन में जिन्हें हर रोज रोजा भूख से नहीं आती है नींद
मुर्मुष उन किसानों के घर आज आई है क्या ईद ?
मर गया जिसका बच्चा नहीं पाकर दूध का महज एक बूँद भी
क्या निकली है बन ईद का चाँद उस बच्चे के पसली की हड्डी ?
काश आसमान में छाए काले कफन का आवरण टूट जाए
एक टुकड़ा चाँद खिला हुआ है, मृत शिशु के अधर-पुट में।
किसानों की ईद ! जाते हैं वह ईदगाह पढ़ने बच्चे का नमाज-ए-जनाजा,
सुनते हैं जितनी तकबीर, सीने में उनके उतना ही मचता है हाहाकार।
मर गया बेटा, मर गई बेटी, आती है मौत की बाढ़
यजीद की सेना कर रही है गश्त मक्का मस्जिद के आसपास।

कहाँ हैं इमाम? कौन सा खुत्बा पढ़ेंगे वह आज ईद में ?
चारों ओर है मुर्दों की लाश, उन्हीं के बीच जो चुभता है आँखों में
जरी वाले पोशाकों से ढक कर शरीर धनी लोग आए हैं वहाँ
इस ईदगाह में आप इमाम, क्या आप हैं इन्हीं लोगों के नेता ?
निचोड़ते हैं कुरआन, हदीस और फिकह, इन मृतकों के मुँह में
क्या अमृत कभी दिया आपने? सीने पर रखकर हाथ कहिये।
पढ़ा है नमाज, पढ़ा है कुरआन, रोजे भी रखे हैं जानता हूँ
हाय रट्टू तोता ! क्या शक्ति दे पाए जरा सी भी?
ढोया है फल आपने, नहीं चखा रस, हाय री फल की टोकरी,
लाखों बरस झरने के नीचे डूबकर भी रस नहीं पाता है बजरी।

अल्लाह-तत्व जान पाए क्या, जो हैं सर्वशक्तिमान?
शक्ति जो नहीं पा सके जीवन में, वो नहीं हैं मुसलमान।
ईमान ! ईमान ! कहते हैं रात दिन, ईमान क्या है इतना आसान?
ईमानदार होकर क्या कोई ढोता है शैतानी का बोझ ?

सुनो मिथ्यावादी ! इस दुनिया में है पूर्ण जिसका ईमान,
शक्तिधर है वह, बदल सकता है इशारों में आसमान।
अल्लाह का नाम लिया है सिर्फ, नहीं समझ पाए अल्लाह को।
जो खुद ही अंधा हो, वह क्या दूसरों को ला सकता है प्रकाश की ओर?
जो खुद ही न हो पाया हो स्वाधीन, वह स्वाधीनता देगा किसे?
वह मनुष्य शहद क्या देगा, शहद नहीं है जिसके मधुमक्खियों के छत्ते में ?

कहाँ हैं वो शक्ति-सिद्ध इमाम, जिनके प्रति पदाघात से
आबे जमजम बहता है बन शक्ति-स्रोत लगातार ?
जिन्होंने प्राप्त नहीं की अपनी शक्ति, हाय वह शक्ति-हीन
बने हैं इमाम, उन्हीं का खुत्बा सुन रहा हूँ निशिदिन।
दीन दरिद्र के घर-घर में आज करेंगे जो नई तागिद
कहाँ हैं वह महा-साधक लाएँगे जो फिर से ईद ?
छीन कर ले आएँगे जो आसमान से ईद के चाँद की हँसी,
हँसी जो नहीं होगी खत्म आजीवन, कभी नहीं होगी बासी।
आएँगे वह कब, कब्र में गिन रहा हूँ दिन ?
रोजा इफ्तार करेंगे सभी, ईद होगी उस दिन।

चार

|| क्षमा कीजिए हजरत ||

आपकी वाणी को नहीं किया ग्रहण
क्षमा कीजिए हजरत
भूल गया हूँ आपके आदर्श
आपका दिखाया हुआ पथ
क्षमा कीजिए हजरत।
विलास वैभव को रौंदा है पाँव तले
धूल समान आपने प्रभु
आपने नहीं चाहा कि हम बनें
बादशाह, नवाब कभू।
इस धरणी की धन संपदा
सभी का है उस पर समान अधिकार,
आपने कहा था धरती पर हैं सब
समान पुत्रवत
क्षमा कीजिए हजरत।

आपके धर्म में नास्तिकों से
आप घृणा नहीं करते,
आपने उनकी की है सेवा
आश्रय दिया उन्हें घर में

भिन्न धर्मियों के पूजा मंदिर
तोड़ने का आदेश नहीं दिया, हे वीर!
हम आजकल सहन
नहीं कर पाते दूसरों का मत
क्षमा कीजिए हजरत।

नहीं चाहा आपने कि हो धर्म के नाम पर
ग्लानिकर हत्या-जीवन हानि
तलवार आपने नहीं दिया हाथ में
दी है अमर वाणी
हमने भूल कर आपकी उदारता
बढ़ा ली है धर्मान्धता,
जन्नत से नहीं झरती है अब
तभी आपकी रहमत
क्षमा कीजिए हजरत।

आपकी वाणी को नहीं किया ग्रहण
क्षमा कीजिए हजरत
भूल गया हूँ आपके आदर्श
आपका दिखाया हुआ पथ
क्षमा कीजिए हजरत।

काज़ी नज़रुल इस्लाम

अनुवाद : सुलोचना

साभार हिंदी समय से

⭕ दस्तक के लिए प्रस्तुति : अंजू शर्मा

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