आज 26 जून ःः आपातकाल से फासीवाद तक – सीमा आज़ाद

दस्तक जुलाई -अगस्त 2018 अंक का सम्पादकीय 

26 जून 2018

25 जून 1975 की आधी रात, यानि 26 जून की सुबह, भारत के नागरिकों के सभी मौलिक, नागरिक और संवैधानिक अधिकार निरस्त कर दिये गये। सरकार का किसी भी रूप में विरोध करने वालों को पकड़-पकड़ कर जेल में डाल दिया गया। सारे कानून इन्दिरा गांधी सरकार की मर्जी में सिमट गये। मौलिक और नागरिक अधिकारों का छिनना क्या होता है, पहली बार लोगों को इसका एहसास हुआ। हलांकि हमारे देश में वर्णव्यवस्था के कारण दलित समुदाय तो सदियों से ही मौलिक और नागरिक अधिकारों से वंचित था, लेकिन कम से कम संविधान निर्माण के समय उनके इन अधिकारों को कानून में ही सही, लेकिन सुरक्षित किया गया था, जिसके एहसास में एक पीढ़ी जवान हो चुकी थी।

26 जून से इन अधिकारों के छिनने से लोगों को इसकी वंचना का एहसास हुआ। इंसानी इतिहास में ये ऐसे अधिकार हैं, जिसे किसी एक या कुछ व्यक्तियों ने संविधान में लिखकर नहीं परोसा है, बल्कि इंसान के सदियों के संघर्षों का नतीजा है, जिसे आपातकाल लगाकर एक झटके में खत्म कर दिया गया। इसका मतलब था, सरकारी एजेन्सियां जब चाहे तब आपके किसी भी कृत्य को गैरकानूनी ठहराकर आपको जेल में डाल सकती हैं, आपकी हत्या कर सकती है। इसके लिए उसके खिलाफ कोई मुकदमा तक नहीं दर्ज हो सकता। आपातकाल के समय के ऐसे भयानक किस्से आज भी सुनने को मिलते रहते हैं। यह सीधी तानाशाही थी, जो कि उस समय उभरे तमाम जनआन्दोलनों से घबराकर सरकार द्वारा अपनाई गयी थी। चूंकि यह घोषित तानाशाही थी, इसलिए लोगों ने इसका माकूल जवाब दिया। विरोध शान्त होने की बजाय आपातकाल के खिलाफ केन्द्रित हो गया, विरोध का स्थल सड़क न होकर जेल का अहाता हो गया। तानाशाह सरकार विरोधी विचार-विमर्श का स्थान खुला आसमान न सही घरों की चारदीवारियां हो गयी। लेकिन विरोध का स्वर ज़िन्दा रहा। परिणाम स्वरूप इसके बाद हुए चुनावों में इन्दिरा गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी को जबर्दस्त हार का सामना करना पड़ा। हालांकि जल्द ही उन्होंने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा देकर फिर से जनता को ठग लिया।

इस आपातकाल ने लोगों को संविधान की इस सीमा का भी एहसास कराया, कि सरकार को आपातकाल लगाने का अधिकार देकर इसने सारी शक्तियां उनके हाथ में ही केन्द्रित कर रखी हैं, लोकतन्त्र के आधार स्तंभ जनता के पक्ष में नहीं, इसलिए संविधान, और राजकीय कानूनों के साथ विरोध-प्रदर्शनों पर भरोसा रखना अधिक जरूरी है। सरकार ने भी देश की जनता द्वारा जज्ब कर लिये गये नागरिक और मौलिक अधिकारों से उन्हें वंचित करने का मतलब समझ लिया, इसलिए उसके बाद कई बार देश में वैसी ही, बल्कि सरकारों के लिए उससे भी जटिल परिस्थितियां आने पर भी उसने आपातकाल की औपचारिक घोषणा का सहारा नहीं लिया, लेकिन वह दूसरे तरीके से लोगों के हासिल अधिकारों में लगातार कटौती करती गयी। उस दौरान और उसके बाद लगातार बनते मीसा, टाडा, पोटा, विभिन्न राज्यों के सिक्युरिटी एक्ट, कॉरपोरेट सिक्युरिटी एक्ट, जमीन अधिग्रहण करनेे के लिए बने कानून, अफ्स्पा और यूएपीए जैसे कानून इसके उदाहरण हैं, जो कि जनता को नहीं बल्कि सरकार और उसे चंदा देकर ऐश कराने वाले पूंजीपतियों की सुरक्षा के लिए लगातार बनाये जा रहे हैं। इन कानूनों का इतना असर है कि अब सरकार को जनता के मौलिक अधिकारों के दमन के लिए आपातकाल की घोषणा करने की कोई जरूरत ही नहीं है।

जनद्रोही कानूनों के माध्यम से इस रास्ते पर चलती हुई सरकारें आज तो लोकतन्त्र की हत्या के चरम संवैधानिक रूप ‘फासीवाद’ तक पहुंच गयी है, जबकि जनता बिना इसका एहसास किये अपने सारे अधिकार एक-एक कर खोती जा रही है। आज देश में सत्ता पक्ष की सुरक्षा के लिए इतने सारे जनद्रोही कानून मौजूद हैं कि जनता के हर एक विरोध प्रदर्शन को गैरकानूनी बता कर और हर राजनैतिक सामाजिक संगठन को यूएपीए के तहत प्रतिबंधित करके बिना आपातकाल लगायेे और बिना तानाशाह घोषित हुए जनता पर दमन किया जा सकता है, विरोध की हर आवाज को कुचला जा सकता है। यहां तक पहुंचने के बाद भी अभी भी ऐसे कानूनों का बनना और विभिन्न जन संगठनों को प्रतिबंधित करना जारी है। हाल ही में उप्र में योगी की सरकार ने यूपीकोका तमाम विरोध के बावजूद ‘संवैधानिक तरीके से’ पास करा लिया और झारखण्ड की सरकार ने वहां 30 सालों से काम करने वाले पंजीकृत ‘मजदूर संगठन समिति’ को प्रतिबंधित कर दिया, क्योंकि उन्होंने वहां की पुलिस की एक फर्जी मुठभेड़ की कथित ‘बहादुरी’ को उजागर कर दिया था। यह सिलसिला इतना तेज हो गया है, कि लगभग हर दिन एक ऐसे व्यक्ति की गिरफ्तारी या सरकारी हत्या की खबर आ रही है, जो किसी भी रूप में सरकार की नीतियों का विरोध कर रहा था। आदिवासियों प्रदर्शनकारियों को माओवादी बताकर मार देने का सिलसिला सालों से जारी ही था, अब यह सिलसिला और इसे जायज ठहराने की बेहयायी तेज हो गयी है।

 

किसी को भी सिर्फ माओवादी, अलगावादी नाम देकर सरकारी एजेन्सियां उनके साथ कुछ भी गैरकानूनी कार्यवाही करने की स्वीकृति हासिल कर ले रही है, इस मानसिकता ने आम जन ही नहीं न्यायपालिका को भी अपनी जद में ले लिया है, यह बेहद खतरनाक है, परन्तु चंूकि आपातकाल की औपचारिक घोषणा नहीं की गयी है, इसलिए अप्रभावित लोगों को हर ऐसी तानाशाही ‘विकास’ का विस्तार लगती है।

लेकिन आज जब हम भाजपा के फासीवादी दौर में कांग्रेस के आपातकाल को याद कर रहे हैं, तो दोनों के बीच के अन्तर पर बात करना भी जरूरी है। क्योंकि यह मात्र ‘अघोषित आपातकाल’ नहीं, बल्कि ‘फासीवाद’ है। फासीवाद यानि वित्तीय संकट को हल करने की सरकारी-प्रशासनिक अराजकता, जिसका मुख्य पहलू आर्थिक है। यह देश और दुनिया की पूंजी का मुट्ठी भर लोगों के हाथों में सिमटने और ज्यादातर लोगों से और ज्यादा छीनने की प्रक्रिया है, यानि यह पूंजी के एकाधिकारी होने की कवायद है। इस प्रक्रिया में पीड़ित असंतुष्ट लोगों के गुस्से को शांत करने का दो तरीका है- राजकीय दमन को बढ़ाना, और दूसरा साम्प्रदायिकता, नस्लवाद को बढ़ाकर इंसान के एक समुदाय को दूसरे समुदाय के खिलाफ खड़ा कर देना। बहुसंख्यक धर्म के समुदाय को छुपा हुआ समर्थन देना और अल्पसंख्यक धर्म के समुदाय से सारे अधिकार गुप्त तौर पर छीन लेना। गुप्त तौर पर या कभी-कभी घोषित तौर पर सत्ता द्वारा अपना धर्म (भारत के सन्दर्भ में वर्ण भी) तय कर लेना और उसके पक्ष में कानून बनाना या सामाजिक, प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था को संचालित करना।

कांग्रेस के आपातकाल से भाजपा के फासीवाद में यही फर्क है कि आपात काल में राजकीय दमन हुआ, यानि यह स्पष्ट तौर पर सत्ता बनाम जनता की लड़ाई थी, लेकिन आज के फासीवाद में राजकीय दमन तो अघोषित और घोषित तौर पर है ही, इसके साथ ही जनता को साम्प्रदायिक आधार पर बांटकर एक समुदाय को दूसरे समुदाय के खिलाफ खड़ा करने की खतरनाक कार्यवाही भी शामिल है। इसीलिए फासीवाद आपातकाल से अधिक खतरनाक है, यह उसका विस्तार तो है साथ ही दमन का अधिक बर्बर रूप है। क्योंकि आपातकाल में जनता को अपने दमन करने वाले की स्पष्ट पहचान थी, लेकिन फासीवाद के दौर में जनता के बीच से उसने शातिराना तरीके से इस पहचान को गायब कर दिया है। जैसे तूतीकोरिन प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी राजकीय दमन का स्पष्ट रूप है, लेकिन अखलाक, जुनैद को धार्मिक आधार पर ‘भीड़ द्वारा’ मार देना, राजकीय दमन का छिपा हुआ रूप है। यही फासीवाद है।

सामंती शक्तियों और कॉरपोरेटों के मुनाफे की हवस ने लोगों का जीवन मुश्किल कर रखा है, लेकिन लोगों को सबसे बड़ी समस्या यह लग रही है कि किसी के घर में कौन सा मांस खाया जा रहा है, या कोई व्यक्ति गाय या किस पशु को लेकर जा रहा है, किस वर्ण का युवक शादी में घोड़ी चढ़ा, किस जाति की युवती ज्यादा पढ़-लिख गयी या किस धर्म के युवक ने किस धर्म की युवती से प्रेम या विवाह किया, यहां तक कि बलात्कार या हत्या के अभियुक्त किस धर्म के हैं, उसी के अनुरूप यह समूह उन्हें बचाता या पीटता है। वंचित जन समूहों को ‘पावर’ के नशे में चूर करने के लिए सरकारों ने उन्हें मारपीट से लेकर हत्या तक करने के सारे अधिकार सौंप दिये हैं, उनके खिलाफ कभी भी कोई कार्यवाही नहीं होती और वे हमेशा ‘अज्ञात’ या ‘भीड़’ बने रहते हैं। उनका कृत्य ‘राष्ट्रभक्ति’ या ‘राष्ट्रीय कर्म’ माना जाता है। राजकीय दमन का यह तरीका लोगों को कई-कई समूहों में बांट देता है और अपने खिलाफ एकजुट नहीं होने देता। इस रूप में फासीवाद अधिक खतरनाक है और जनता का बड़ा दुश्मन है। यह अघोषित आपातकाल से भी अधिक खतरनाक है, लेकिन इसकी जड़ें आपातकाल तक घुसी हुई है, इसलिए आपातकाल के दौर के दमन को याद करते हुए वर्तमान राजकीय दमन के नये रूप फासीवाद को पहचानना आन्दोलनकारी शक्तियों की एकजुटता के लिए बहुत जरूरी है।
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सीमा आज़ाद

दस्तक जुलाई -अगस्त 2018 अंक का सम्पादकीय 

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