नामुराद होश में आओ! पुलिस अधिकारों के लिए लड़ रही महिलायें – उत्तम कुमार ,दक्षिण कोसल 

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सैकड़ों जवानों के पहरों के बावजूद भी आखिरकार 200 से ज्यादा की संख्या में पुलिस परिवार 11 सूची मांगों के साथ अपने छोटे-छोटे बच्चों को हाथ में लेकर महिलाएं मांगे पूरी करने के लिए नारेबाजी करते हुए धरना स्थल पर पहुंच गई। रायपुर से पत्रकार प्रफुल्ल ठाकुर कहते हैं कि लाखेनगर धरना स्थल में कड़ी पुलिस व्यवस्था है। महादेव घाट पुल पर चेकिंग चल रही है। धरना स्थल लाखेनगर मैदान में एक पंडाल लगा हुआ है लेकिन यह किसका है कोई जानकारी नहीं है यहां से किसी राहगीर को भी गुजरने नहीं दिया जा रहा है। एक एक वाहन को रोका जा रहा है महिलाओं के स्कार्फ निकाल कर चेहरा पहचाना जा रहा है। इन सब से मजदूर ज्यादा परेशान हो रहे हैं। अमलेश्वर से आने वाले वाहनों की चेकिंग हो रही है। पुलिस के बड़े अधिकारी भी लगातार भ्रमण कर रहे हैं। आंदोलन को समर्थन देने वाले अजीत जोगी निवास के सामने भी खाकी और सादी वर्दी में पुलिस बल तैनात हैं। शहर के एंट्री वाले हर इलाके में चेकिंग हो रही है। भिलाई-बिलासपुर की तरफ से आने वाले मार्ग पर कुम्हारी टोल नाका, नंदनवन एंट्री मार्ग, टाटीबंध चौक के तीनों मार्ग में चेकिंग, इधर विधानसभा इलाके रिंग रोड तीन के चौक के पास भी बल तैनात। हर सवारी बस की जांच की सूचना मिल रही है। पंडरी बस स्टैण्ड और रेलवे स्टेशन में भी तलाशी ली जा रही है। खबर यहां तक आ रही है कि आंदोलन में शामिल कुछ आरक्षकों को रात में ही पुलिस उठाकर कहीं गुप्त स्थान ले गई है। स्टेशन में बल तैनात हैं।

मुझसे कोई व्यक्तिगत पूछे तो मैं कहूंगा कि पुलिस आंदोलन का समर्थन करता हूं लेकिन पुलिसिया रवैये का नहीं। आखिर पुलिस को पता तो चला होगा कि लोकतंत्र में असहमति, विरोध, आंदोलन, धरना, प्रदर्शन का कोई मतलब भी है। पुलिस की मानसिकता ऐसा बन गया है कि लोगों के हालतों, सामाजिक परिस्थितियों और उनके मानवाधिकार से उनका कोई वास्ता ही नहीं। सबसे ज्यादा संविधान, कानून व्यवस्था और मानवाधिकार का उलंघन पुलिस ही करती है। जबकि ये जानते हैं कि तनख्वाह के साथ देशभक्ति और जनसेवा नहीं बल्कि गरीब, मजदूर, किसान, एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के खिलाफ इनका गुस्सा ड्यूटी के नाम पर उतरते रहता है। गिरफ्तारी के साथ मारना पिटना और हत्या तक पुलिस कर देती है। इन्हें अब बाज आ जाना चाहिए। इनके अधिकार को लेकर सहानुभूति है लेकिन यह क्या कि आप अपने औरतों को लड़ाई के मैदान में झोंक दे। जबकि शिक्षाकर्मी आंदोलन के दौरान पुलिस ने महिलाओं पर बर्बरता के साथ व्यवहार किया था नारीशक्ति की जानकारी अब जाकर पुलिस को हुई है और अब वर्तमान में खुद घरेलु हिंसा और आत्महत्या जैसे कृत्यों के लिए मजबूर किए जा रहे हैं।

सरकार द्वारा नक्सल वारदातों के समय पुलिस के मानवाधिकार को लेकर लगातार कठघरे में खड़े किए जान वाले पीयूसीएल ने छत्तीसगढ़ पुलिस को विरोध प्रदर्शन का हक दिलाने, उन पर हो रहे दमन, सुविधाओं के लिए आंदोलन और परिवार नामक संस्था के टूटते हालातों पर मानवाधिकार को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। अपने ब्लॉग छत्तीसगढ़ बास्केट में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिस (पीयूसीएल) छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष डा. लाखनसिंह और महासचिव अधिवक्ता सुधा भारद्धाज ने कहा है कि छत्तीसगढ़ पुलिस को विरोध प्रदर्शन का हक है, पुलिस पर पुलिस का दमन बंद करें, यह राजद्रोह नहीं बल्कि जिने योग्य सुविधाओं के लिये किये गये आंदोलन है।

सिपाहियों का यह आंदोलन 1857 जैसा सिपाही विद्रोह तो नहीं लेकिन यह भी इतिहास में दर्ज होगा कि इसका नेतृत्व घरेलु महिलाओं ने उठा रखा है। सिविल क्षेत्र में सुरक्षागत कार्यों में लगे छत्तीसगढ़ सिपाहियों के आंदोलन से सरकार का नींद हराम है। छत्तीसगढ़ में तृतीय श्रेणी के पुलिस कर्मियों के परिजनों ने अपनी रोजमर्रा की जरूरतों और अन्य शासकीय सेवकों के समक्ष वेतन भत्ते और समान सुविधाओं के लिए आज का आंदोलन मायने रखता है। रायपुर में आज चप्पे चप्पे पर पुलिस की पहरेदारी है। धरनास्थल ईदगाहभाठा से दो-ढाई सौ की संख्या में आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। हां यह प्रदर्शन संवैधानिक और कानूनन है, परिजनों का विरोध पुलिस मैनुअल का भी उलंघन नहीं है।

पीयूसीएल ने प्रमुखता के साथ कहा है कि भारत का संविधान सभी को संगठन बनाने और विरोध का हक देता हैं जिसमें यूनियन बनाने का अधिकार भी निहित है। यह आंदोलन संवैधानिक और कानून सम्मत है, पुलिसकर्मियों के परिजनों को किसी भी प्रकार से प्रताड़ित करना उनके मौलिक अधिकारों के हनन के साथ साथ गैरकानूनी भी है, शासकीय कर्मचारी के परिजनों को परिवार नामक संस्था को बचाने के लिए सामने आना पड़ा है क्योंकि पुलिस की अनियमित ड्यूटी और कम वेतन उसके परिवार के ढांचे को तोड़ रहा है जिसे बचाने की जिम्मेदारी सरकार की है अत: सरकार परिजनों को यह आश्वासन दे कि उनका पारिवारिक ढांचा सुरक्षित रहेगा।

मानवाधिकार संघ ने कहा है कि छत्तीसगढ़ में पुलिस कर्मी हमेशा प्रशासन से प्रताड़ित रहते हैं, अभी भी परिजनों ने पत्र लिखकर यही मांग की हैं कि कामों में राजनीतिक हस्तक्षेप, सजा के तौर पर स्थानांतरण, समान वेतन भत्ते, रहने योग्य आवास की व्यवस्था, वर्तमान में मिलने वाला आवास भत्ता, पेट्रोल भत्ता हास्यास्पद रूपए से 13 रूपये हैं इसे बढ़ाने, पुलिस किट या उसका भत्ता, ड्यूटी के दौरान मरने पर शहीद का दर्जा और एक करोड़ का मुआवजा, अनुकंपा नियुक्ति,अन्य विभागों की तरह साप्ताहिक अवकाश और काम के लिये आठ घंटे तय किये जाये, अधिक समय काम लेने पर अतिरिक्त भुगतान, अन्य विभाग की तरह परिजनों को मुफ्त इलाज, नक्सली क्षेत्र में काम करने पर उच्च मानक के सुरक्षा उपकरण, बुलेटप्रूफ जाकेट और आधुनिकतम हथियार,10 साल में पदोन्नति, वर्दी भत्ता अभी मात्र पांच रूपये मिलता हैं इसे बाजार की कीमत के अनुसार बढ़ाया जाये,आदि आदि मांग के लिये बकायदा पत्र पुलिस डीजीपी और अन्य अधिकारियों को लिखा था।

इस आंदोलन पर दिल्ली से नजर रख रहे तथा स्वास्थ्य लाभ ले रहे अजीत जोगी ने कहा है कि किसी राज्य में अगर प्रशासन ही शासन से तंग आकर आंदोलन छेड़ दे तो यह समझ लेना चाहिए कि वो राज्य अपनी बर्बादी के चरम पर पहुंच चुका है और उस राज्य में कुछ भी ठीक नहीं हो रहा है। छत्तीसगढ़ के पुलिसकर्मियों द्वारा सरकार के विरूद्ध किया जा रहा यह आंदोलन इसका जीवंत उदाहरण है। छत्तीसगढ़ में उत्पन्न इस भयावह स्थिति के लिए मैं पूरी तरह से राज्य सरकार को दोषी मानता हूं। पब्लिक के साथ साथ अब पुलिस भी सरकार से त्रस्त हो चुकी है। छत्तीसगढ़ राज्य के प्रति भाजपा सरकार की नीति और नियत दोनों गंभीर नहीं है। राज्य में फैली इस अराजकता के लिए मुख्यमंत्री सीधे तौर पर दोषी हैं। मैं स्वयं एक आईपीएस अधिकारी रहा हूं। छत्तीसगढ़ के पुलिस कर्मियों की पीड़ा से भली भंति परिचित हूं। इस समय दिल्ली में स्वास्थ्य लाभ लेने के कारण पुलिसकर्मियों के आंदोलन में उपस्थित होने में असमर्थ हूं। हमने जनता के हित के लिए पुलिस की लाठियां खाई है और अब पुलिस हित के लिए सरकार की लाठी भी खाने को तैयार हैं।

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