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19.06.2018

श्रीराम सेने के प्रमोद मुतालिक ने गौरी लंकेश पर कुत्ते की याद करते फब्ती कसी है। पहले भी एक हिन्दुत्वपरस्त ने उसे सीधे सीधे कुतिया कहकर सुर्खियां भी बटोरी थीं। चार गोलियां उसके घर में मारकर हत्या की गई। गौरी लंकेश को पता नहीं था कि वह कुतिया है। वह सोचती होगी जाहिलों, भ्रष्टों, अत्याचारियों और हिंसकों के खिलाफ न्याय और साहस की लड़ाई लड़ रही है। उसे इलहाम तो था उसे मार दिया जाएगा। लेखक, पत्रकार, बुद्धिजीवी, समाजसेवक और नामालूम लोग अपनी मौत को लेकर उलझन में नहीं रहते। यह अलग है उन्हें देशभक्त नहीं कहा जाए, जबकि वे होते हैं।

नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम.एम. कलबुर्गी और गौरी लंकेश की गालियों से सजी चौकड़ी बना दी गई है। कई नाम जुड़ेंगे। देश बेहद मासूम, उम्मीद भरा आश्वस्त होता रहता है। जघन्य हत्याएं होती हैं। नारे लगते हैं। सीबीआई जांच होनी चाहिए। एस.आई.टी. गठित करें। सीबीआई सुप्रीम कोर्ट के पिजड़े में कैद तोता है। तोता उतना ही बोलता है जितना सिखाया जाता है। उसकी वफादार मुद्रा देख मालिक को मालिक होने में गर्व महसूस होता है। उम्मीदें जिंदगी की अमावस्या के खिलाफ टिमटिमाते दीपों की तरह होती हैं।

गंगा-जमुनी संस्कृति में राजधानियों, व्यापारधानियों और हत्यारों के कारखानों के प्रदूषण को आर्ट आॅफ लाइफ कहा जाता है। भारत की संस्कृति, सभ्यता, प्रज्ञा और सोच की गंगा-यमुना-नर्मदा से बेखबर विदेशी ग्रांट लाकर ‘डिजिटल इंडिया‘, ‘मेक इन इंडिया‘, ‘स्मार्ट सिटी‘, ‘बीफ‘, ‘बुलेट ट्रेन‘, ‘स्टार्ट अप‘, ‘जुमला‘, ‘जीएसटी‘, ‘नोटबंदी‘ ‘न्यू इंडिया‘, वगैरह के जरिए इतिहास का चरित्रशोधन हो रहा है। इसी देश के बुद्ध, महावीर और गांधी तक ने दुनिया की सभ्यताओं के मुकाबले भारतीय मनुष्यता में सहनशीलता, विश्व बंधुत्व और भाईचारे की कौटुंबिकता के जींस इंजेक्ट किए। अंगरेजों को खदेड़ने हिंसा की तलवार ने नहीं अहिंसा की ढाल ने हथियार का काम किया। जनवादी क्रांति के बरक्स बगल की गली में एक विचारधारा कुंठाओं को शास्त्र की हैसियत देने परखनली का शिशु बनाई गई। बावड़ियां, कुएं, गुप्त सुरंगें, बोगदे वगैरह ऐतिहासिक भग्नावशेष कहे गए।

हम अपने मुंह मियांमिट्ठू देश हैं। अगले दस बीस बरस में भारत विश्व का सिरमौर बनेगा। माहौल बनाए रखिए। वोट देते रहिए। तटस्थ खबर छपती है। भारत एशिया का सबसे भ्रष्ट देश है। गरीबी में स्वर्ण पदक पाने की होड़ में है। हिंसा, झूठ और फरेब में नए विश्व रिकाॅर्ड बना रहा है। भारत में मनुष्य नहीं मजहब, जातियां, प्रदेश, अछूत, नेता, अफसर, पूंजीपति, वेश्याएं, मच्छर, शक्कर तथा एड्स की बीमारियां, गोदी मीडिया, कुछ सिरफिरे देशभक्त एक साथ रहते हैं। घुंधली किरण की तरह कुछ लोग बचाने की को​शिश कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद के साथ मुगालता भी है। गांधी और भगतसिंह तक को तो किसी ने नहीं सुना। वे नया जमाना रचने धरती की कोख से अपवाद या घटना की तरह फूटकर आए थे। वैश्य गांधी यदि दूधदेयक बकरी के बदले कुतिया पालते। धर्मराज कुत्ता के बदले कुतिया बनकर सत्य का स्वर्गारोहण कराते तो गौरी लंकेश को कुतिया नहीं कहा जाता।

गोरखपुर अस्पताल के बच्चों के परिवारों के साथ इंसाफ तो ईश्वर भी नहीं कर सकता। करोड़ों बच्चे हैं जिन्हें पालतू कुत्ते, बिल्लियों से भी कम प्यार मिलता है। निर्भया नाम का मीडिया जाप करने से लाखों बच्चियों की अस्मत कोई नहीं बचा रहा है। दाती महाराज, रामपाल, गुरमीत राम रहीम, आसाराम और भी कई शंकर, राम, महमूद, जाॅर्ज वगैरहों को गुमनामी की खंदकों में दफ्न क्यों नहीं किया जाता। चिंता है मेरा देश बदल रहा है। हिंसा को पराक्रम कहा जा रहा है। महान अंग्रेज लेखक थाॅमस ग्रे ने एक पागल कुत्ते की मौत पर अमर शोकगीत रचा है। यह कुतिया तो इन्सान है। मैं लेकिन थाॅमस ग्रे की हैसियत नहीं रखता।

साहस, साफगोई और पारदर्शी योद्धा बेटी को कुतिया कहा जा रहा है। उसे लाखों लोग पसंद भी कर रहे हैं। जो चुप हैं वही धृतराष्ट्र हैं। कभी कभी लगता है राजरानी सीता या महारानी द्रौपदी पर भद्दे आक्षेप लगने से ही जनक्रांति हुई। नागरिक समाज ने कुब्जा, मंथरा, अहिल्या, झलकारीबाई, सोनी सोरी, इरोम शर्मिला, आंग सान सू की जैसों को लेकर जिल्लतें कहां उठाई हैं। बुद्धिजीवी तबका श्रेष्ठि वर्ग की महिलाओं की प्रचारित वेदना से उन्मादित होकर इतिहास बदल देने अभिव्यक्त हो उठता है। गौरी लंकेश! तुम्हारी याद तो लोगों को धूमिल हो रही थी। वह तो एसआईटी ने राख पर फूंक मारकर हमारे दिलों में धधकती लौ फिर बाल दी है।

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