छत्तीसगढ़ के कई गांवों के पेयजल में फ्लोराइड की मात्रा को जांचने-परखने के नाम पर बड़ा गड़बड़झाला सामने आया है : पानी जांचने के नाम पर बड़ा खेल .: राजकुमार सोनी ,पत्रिका

पानी जांचने के नाम पर बड़ा खेल

राजकुमार सोनी पत्रिका ( 98268 95207 ) छत्तीसगढ़ के कई गांवों के पेयजल में फ्लोराइड की मात्रा को जांचने-परखने के नाम पर बड़ा गड़बड़झाला सामने आया है। फिलहाल जल की गुणवत्ता जांचने-परखने के सरकारी खेल की पड़ताल के लिए सामान्य प्रशासन विभाग की प्रमुख सचिव ऋचा शर्मा को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया है। उन्हें अपनी रिपोर्ट 22 जून तक सौंपनी है।

यह है मामला

ग्रामीण इलाकों से हर साल अशुद्ध पेयजल को लेकर सैकड़ों शिकायतें मंत्रालय पहुंचती है। वर्ष 2014-2015 में भी जब 27 जिलों से शिकायतों का अंबार लगा, तब लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अफसरों ने जल नमूनों को एकत्र करने का काम नागपुर की डीसीसी इम्फो लिमिटेड को सौंप दिया। सामान्य तौर पर तीन करोड़ रुपए से अधिक के काम के लिए प्रशासकीय स्वीकृति अनिवार्य है, लेकिन विभाग ने इस कार्य के लिए महज तकनीकी (इंस्टीमेट) स्वीकृति हासिल की और यह दर्शाया कि पूरे 27 जिलों में पेयजल की गुणवत्ता को जांचने-परखने के काम में 19 करोड़ 16 लाख 72 हजार 950 रुपए खर्च किए जाने हैं। इस मामले में जैजेपुर के बसपा विधायक केशव चंद्रा ने विधानसभा के अलग-अलग सत्रों में कई सवाल उठाए, तो जवाब में उन्हें यह बताया गया कि नागपुर की कंपनी को महज तकनीकी स्वीकृति ही दी गई है। विधायक के सवाल के जवाब में विभाग ने यह भी माना कि जल नमूनों को एकत्र कर जांच करने की कार्ययोजना लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के मुख्य अभियंता को उचित माध्यम से नहीं मिली है। पूरी कार्ययोजना छत्तीसगढ़ राज्य, जल एवं स्वच्छता सहायक संगठन रायपुर ने तैयार की थी, जो लागू कर दी गई। ऐसा नहीं था कि मामले में टेंडर नहीं निकाला गया। टेंडर की पूरी प्रक्रिया संपन्न की गई और नागपुर की कंपनी को रायपुर मुख्यालय से काम दे दिया गया, जबकि जिलों में जल की गुणवत्ता जांचनी थी, तो प्रत्येक जिले के लोक स्वास्थ्य अभियंता कार्यालय से टेंडर निकाला जाना था। जब कंपनी को भुगतान की बारी आई, तो जिलों के कार्यपालन अभियंताओं को कहा गया कि वे भुगतान करें।

बंदरबांट का आरोप

जैजेपुर विधायक केशव चंद्रा का कहना है कि जल गुणवत्ता की जांच के लिए पहले जिलास्तर पर कार्ययोजना बननी थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कंपनी को जल नमूना एकत्र करने का काम सौंपा गया था, लेकिन यह सारा काम केवल कागजों पर किया गया है। अफसरों ने सरकारी पैसों की जमकर बंदरबांट की। अगर कंपनी जल नमूनों को एकत्र करती और विभाग पूरी गंभीरता से फ्लोराइड की मात्रा को कम करने का प्रयास करता था, तो आज रायगढ़ के मुड़ागांव, बस्तर के गांव बाकेल, कोरबा के ग्राम आमाटिकरा, कौआताल सहित आसपास के हजारों गांव प्रभावित नहीं होते। इन गांवों में अब भी विकलांगता मौजूद है।

चल रही है जांच

लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के सचिव पी. अनबलगन ने कहा कि ग्रामीण पेयजल की जांच-परख में शिकायतों के बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने वरिष्ठ अफसरों की देखरेख में टीम गठित की है। फिलहाल जांच रिपोर्ट नहीं मिली है। अफसरों की रिपोर्ट के बाद ही तय होगा कि किस अफसर ने नियम-कायदों से बाहर जाकर काम किया है।

ये हैं जांच के बिन्दु

1- क्या ग्रामीण पेयजल के साधनों की जल गुणवत्ता की जांच और सर्वेक्षण कार्य के लिए प्रशासकीय अनुमोदन प्राप्त किया गया था?
2- चूंकि कंपनी को सौंपा गया काम तीन करोड़ रुपए से अधिक का है। क्या इसके लिए वित्त विभाग से सहमति प्राप्त की गई थी?
3- जिस फर्म को काम सौंपा गया है, उसे सूचीबद्ध (इंपेनलमेंट) करने के लिए मापदंड क्या है? क्या फर्म को सूचीबद्ध करने के लिए राज्य शासन से अनुमति ली गई थी?
4- टेंडर प्रक्रिया क्या थी? कैसी थी?
5- सभी जिलों में जल नमूनों को एकत्र करने के बाद भुगतान के लिए कार्यपालन अभियंताओं को अधिकृत किया जाना कितना औचित्यपूर्ण था?
6- मामले में जो अफसर दोषी हैं, वे कौन हैं? और उनके उत्तरदायित्व का निर्धारण कैसे होगा?

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