संघी सेल्फ़ी विथ प्रणब दा … जो बात उनको बहुत नागवार गुजरी है !! : बादल सरोज 

संघी सेल्फ़ी विथ प्रणब दा … जो बात उनको बहुत नागवार गुजरी है !! : बादल सरोज 

संघी सेल्फ़ी विथ प्रणब दा … जो बात उनको बहुत नागवार गुजरी है !! : बादल सरोज 

(कल भोपाल से प्रकाशित #सुबह_सवेरे में आरएसएस सरकार्यवाह का एक लेख था जिसमे हस्बेमामूल उन्होने कम्युनिस्टों को कोसा था । सो भी अपनी सेल्फ़ी विथ प्रणब दा के लिए, जिससे वाम का न लेना एक था न देना दो । उनकी जानकारियों को दुरुस्त करने वाले दो आलेख (इनमे से एक इन पंक्तियों के लेखक तथा दूसरा कवि, लेखक, व्यंगकार #वीरेंद्र_जैन Virendra Jain साब का है ।)

संघी सेल्फ़ी विथ प्रणब दा … जो बात उनको बहुत नागवार गुजरी है !! : बादल सरोज 

प्रणव मुख़र्जी के आरएसएस मार्गदर्शन को लेकर संघ के सर कार्यवाह मनमोहन वैद्य का कल “सुबह सवेरे” में प्रकाशित आलेख दिलचस्प है । उन्होंने “इस अनुभवी परिपक्व राजनेता” के केशवकुंज तीर्थाटन का विरोध करने के लिए साम्यवादियों की पर्याप्त ओज के साथ लानत मलामत की है । यह बात अलग है कि इस मामले पर कोई टीकाटिप्पणी तो दूर रही, अभी तक साम्यवादियों ने इसका नोटिस तक नहीं लिया है । अब वैद्य जी प्रणब दा की बेटी शर्मिष्ठा को साम्यवादी मानते हों तो बात अलग है । मगर कम्युनिस्ट फोबिया हर तरह की तार्किकता की गुंजाइश समाप्त कर देता है।

इस तरह के उधार के चन्दन और सेल्फ़ी विथ सेलिब्रिटीज के मामले में संघ काफी दक्ष है । इतना आतुर भी कि इसी लेख में वैद्य जी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की “प्रशंसा” तक को वेदोक्त प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करते हैं । खैर उनकी सुनाई कहानियों और अफवाहों में जाने की बजाय उनकी मुख्य चिंता “भारत का बौद्दिक जगत साम्यवादी कुल के मूल पर आधारित है” पर आते हैं, जो बकौल वैद्य जी “पूर्णतः अभारतीय विचार है ।”

हालांकि कमाल की बात ये है कि यह सवाल वे उठा रहे है जिनके खुद के कुलगोत्रों का या तो अतापता नहीं है या लापता है या जो पता है उसको बताने में उन्हें संकोच होता है । मुसोलिनी से गणवेश, हिटलर से ध्वज प्रणाम और फासिस्टों से अफ़वाह पारंगतता, संगठन शैली और नाज़ियों से बर्बरता लेकर आये शुद्द अभारतीय संघी साम्यवाद को अभारतीय करार दे रहे हैं ।

वैद्य जी भारत का बौद्दिक जगत साम्यवादी कुल के मूल पर आज से नहीं अपने आविर्भाव के समय से ही आधारित है । यह संयोग था कि साम्यवाद के आधुनिक भाष्यकार मार्क्स यूरोप में जन्मे । उन्हें जो दार्शनिक परम्परा सहज उपलब्ध हुयी वह ग्रीक-रोमन, जर्मन, फ्रांसीसी और आंग्ल थी । यदि वे पृथ्वी के पूरब में जन्मे होते तो द्वंद्वात्मकता -डायलेक्टिक्स- के लिए उन्हें हीगेल के पास नहीं जाना पड़ता । भ्रूण रूप में वह उन्हें गौतम बुद्द के क्षणिकवाद और प्रतीत्य समुत्पाद और पुरानी वस्तु से नयी बनने तथा निरंतर अस्तित्व में आने की प्रक्रिया के सिद्दांत में मिल जाता। वर्धमान महावीर के संशयवाद में मिल जाता ।
भौतिकवाद तो पर्याप्त प्रचुरता में पूरब के दार्शनिकों में मिल जाता जो अध्यात्मवाद के आधुनिक थोक विक्रेता डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के शब्दों में ” भारत में भौतिकवाद उतना ही पुराना है, जितना भारतीय दर्शन । भारत का भौतिकवादी दर्शन विज्ञान की तात्कालिक सीमाओं से काफी आगे बढ़ा हुआ था ।”

जैसा कि कुछ धूर्त समझाते हैं और मूर्ख मानते हैं : भौतिकवाद का मतलब उपभोक्तावाद, देहसुख, भोगविलास या ‘ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत’नहीं होता। यह सब तो पतित पूँजीवाद में होता है । जिसे वह आध्यात्म के झीने पर्दे और आसारामों की अक्षौहिणी सैनाओं से ढांपने की कोशिश करता है । दर्शन की भाषा में भौतिकवाद का अर्थ है भौतिक जगत और पदार्थ को सत्य मानना । उसे किसी अज्ञात और अदृश्य, अबूझ और रहस्यमयी शक्ति द्वारा रचा गया नहीं मानना। यह मानना कि मूल में पदार्थ है बाकी सब उसके भिन्न भिन्न रूप । भारतीय दर्शन मुख्यतः इस तरह से सोचने वालों का ही है । लोकायत, वैशेषिक, न्याय, सांख्य, बुद्द, जैन सहित बहुमत इसी विचार का है ।

ई.पू. 6ठी शताब्दी के कपिल ऋषि कहते हैं “जीवन, शक्ति, विचार, चेतना की उपज पदार्थ से हुयी ।” ई.पू. 6 से 10वी सदी के बीच हुये कणाद ऋषि कहते हैं “संसार अस्तित्वमान है । यह छोटे छोटे कणों (अणु, परमाणुओ) से मिलकर बना है ।” यह डेमोक्रेटस से भी बहुत पहले की बात है । ऋषि गौतम अक्षपाद कहते हैं “तार्किक प्रमाणों के जरिये ही ज्ञान तक पहुंचा जा सकता है । ” ऋग्वेद के परमगुरु बृहस्पति कहते हैं कि “पदार्थ परमसत्य है । मृत्यु के बाद जीवन नहीं होता ।”
गीता में कृष्ण ने जिन्हें सबसे बड़ा ऋषि बताया है वे भृगु और भी बेबाक तरीके से कहते हैं : “पदार्थ परमसत्य है । सभी की उत्पत्ति पदार्थ से हुयी है । देवताओं को खुश करने के लिए कर्मकाण्ड और बलि मूर्खता है ।” श्वसनवेद उपनिषद कहता है : “पदार्थ सत्य है । संसार से परे कुछ भी नहीं है, न नर्क न स्वर्ग । प्रकृति ही नियन्ता है प्रकृति ही संहारक ।”

चाणक्य के मुताबिक़ लोकायत (और चार्वाक) भारत के सर्वप्रथम दर्शनों में से एक है । उनकी हिदायत थी कि राजा को लोकायत और सांख्य अवश्य पढ़ने चाहिए ।
आदि वैद्य चरक कहते हैं ; ” जीवन प्राथमिक तत्वों के विशिष्ट योग का परिणाम है । मनुष्य समय की उपज है और विभिन्न तत्वों के उचित सम्मिश्रण का परिणाम है ।” और यह भी कि “सत्य वही है जिसे सिध्द किया जा सके ।”
रामायण में जाबालि-राम संवाद, महाभारत में भीष्म-युधिष्ठिर और भीष्म-द्रौपदी संवाद इसी धारा के प्रवाह हैं ।
मार्क्स फायरबाख से पहले इन सब के पास आते । मार्क्स को (बिना जाने) ठुकराने का मतलब इन सब को ठुकराना और नकारना है । अपने दर्शन की गौरवशाली विरासत को धिक्कारना है ।
अलबत्ता पोलिटिकल इकॉनोमी (राजनीतिक अर्थशास्त्र) के लिए मार्क्स को लन्दन ही जाना पड़ता । आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था तब तक वहीँ थी । हालांकि वैसे नहीं जैसे इन दिनों “मुंह में स्वदेशी-बगल में अमेज़न : खाली पड़े एटीएम-खूब करो पेटीएम” वाले सिद्द स्वयंसेवक हर तीसरे दिन दौड़े जाते हैं।
वैद्य जी, प्रणब मुख़र्जी के चन्दन से अपने नन्दन वन को संवारने से साम्यवादियों को भला क्या उज्र होगा । मगर उसके चक्कर में “वो बात सारे फ़साने में जिसका जिक्र न था/वो बात उनको बहुत नागवार गुजरी है” गति को प्राप्त होने की जरूरत क्या है ? साम्यवाद को गरियाने के चक्कर में भारत की बेमिसाल समृद्ध दार्शनिक परम्परा को तो मत धिक्कारिये ।

मित्र संपादक गिरीश उपाध्याय सही कहते हैं कि “भारत में वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच एक स्‍वस्‍थ और सार्थक वैचारिक विमर्श हो तो इससे देश का ही भला होगा।” बहस का स्वागत है । मगर गेंद को वामपंथी पाले में बताने से पहले यह देख लेना जरूरी है कि गेंद है भी कि नहीं ? यदि है भी तो कहाँ ?

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बादल सरोज

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